इंदौर भागीरथपुरा जल संकट: ऑडिट रिपोर्ट में 21 मौतों का संकेत, दूषित पानी से डायरिया की आशंका
नई दिल्ली: मध्य प्रदेश के इंदौर शहर का भागीरथपुरा इलाका बीते कुछ हफ्तों से एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का सामना कर रहा है। अब इस मामले में एक सरकारी मेडिकल कॉलेज की ऑडिट रिपोर्ट सामने आई है, जिसमें 21 मौतों का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, इनमें से कम से कम 15 मौतें उल्टी और दस्त यानी डायरिया से जुड़ी हो सकती हैं, जिसकी मुख्य वजह दूषित पेयजल मानी जा रही है।
यह रिपोर्ट इंदौर प्रशासन को सौंपी गई है और इसके बाद स्थानीय स्वास्थ्य व्यवस्था और नगर निगम की कार्यप्रणाली पर नए सवाल खड़े हो गए हैं।
कैसे सामने आया मामला
भागीरथपुरा इलाके में 24 दिसंबर से 6 जनवरी के बीच अचानक उल्टी और दस्त के गंभीर मामले सामने आने लगे थे। देखते ही देखते कई लोगों की तबीयत बिगड़ गई और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। इस दौरान कुछ मरीजों की मौत भी हुई, जिसके बाद प्रशासन ने जांच के आदेश दिए।
जिला प्रशासन ने महात्मा गांधी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज के वरिष्ठ डॉक्टरों की एक कमेटी गठित की, ताकि मौतों और बीमारी के वास्तविक कारणों का वैज्ञानिक विश्लेषण किया जा सके। इसी कमेटी ने अपनी ऑडिट रिपोर्ट अब सौंप दी है।
दूषित पानी से फैला संक्रमण
जांच में यह बात सामने आई है कि भागीरथपुरा में नर्मदा नदी से आने वाली पानी की पाइपलाइन में ड्रेनेज लाइन का गंदा पानी मिल गया था। इससे पूरे इलाके में सप्लाई किया जा रहा पानी गंभीर रूप से दूषित हो गया।
इंदौर नगर निगम द्वारा 3 जनवरी को इलाके से लिए गए पानी के नमूनों की जांच में यह स्थिति और भी चिंताजनक पाई गई। कुल 51 नमूनों में से 35 में मल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया मौजूद था। यह बैक्टीरिया सीधे तौर पर सीवेज प्रदूषण का संकेत देता है और स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक माना जाता है।
जांच रिपोर्ट के अनुसार, कुछ नमूनों में यह बैक्टीरिया 13 से लेकर 360 प्रति मिलीलीटर तक पाया गया, जबकि भारतीय मानकों के अनुसार सुरक्षित पानी में इसकी मात्रा शून्य होनी चाहिए।
मौतों के आंकड़ों पर मतभेद
प्रशासन ने अब तक आधिकारिक तौर पर दूषित पानी पीने से जुड़ी छह मौतों की पुष्टि की है। वहीं, स्थानीय लोगों का दावा इससे कहीं अधिक है। क्षेत्र के निवासियों का कहना है कि बीमारी फैलने के बाद अब तक 23 लोगों की जान जा चुकी है, जिनमें एक छह महीने का बच्चा भी शामिल है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि कई मौतों को अन्य कारणों से दर्ज किया गया, जबकि लक्षण स्पष्ट रूप से डायरिया और संक्रमण से जुड़े थे। यही वजह है कि प्रशासन और नागरिकों के आंकड़ों में बड़ा अंतर दिखाई दे रहा है।
अस्पतालों में हालात
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, 29 दिसंबर से अब तक 436 मरीजों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है। इनमें से 403 मरीज इलाज के बाद ठीक होकर घर लौट चुके हैं।
हालांकि, 33 मरीज अब भी अस्पताल में भर्ती हैं, जिनमें से आठ की हालत गंभीर बताई जा रही है और उन्हें आईसीयू में रखा गया है। डॉक्टरों का कहना है कि गंभीर मरीजों पर लगातार निगरानी रखी जा रही है।
नए मामलों ने बढ़ाई चिंता
ऑडिट रिपोर्ट सौंपे जाने के दिन ही, यानी 13 जनवरी को, भागीरथपुरा में डायरिया के पांच नए मामले सामने आए। इससे साफ है कि स्थिति अभी पूरी तरह नियंत्रण में नहीं आई है।
स्वास्थ्य विभाग ने इलाके में अस्थायी रूप से साफ पानी की आपूर्ति, टैंकरों के जरिए जल वितरण और क्लोरीनेशन जैसे कदम उठाने का दावा किया है। साथ ही लोगों को उबला हुआ पानी पीने की सलाह दी गई है।
प्रशासन की प्रतिक्रिया
इंदौर के जिला मजिस्ट्रेट शिवम वर्मा ने बताया कि मौतों के कारणों की गहन जांच के लिए मेडिकल कमेटी बनाई गई थी और उसकी रिपोर्ट प्राप्त हो चुकी है। प्रशासन अब रिपोर्ट के निष्कर्षों का अध्ययन कर रहा है और उसके आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी
नगर निगम की ओर से भी कहा गया है कि पाइपलाइन में गंदा पानी मिलने की वजहों की जांच चल रही है और दोषियों की पहचान की जाएगी।
जल आपूर्ति व्यवस्था पर सवाल
यह घटना इंदौर जैसे बड़े और विकसित शहर की जल आपूर्ति और निगरानी प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है। नर्मदा जल परियोजना को शहर की जीवनरेखा माना जाता है, ऐसे में उसमें ड्रेनेज का पानी मिलना भारी लापरवाही की ओर इशारा करता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि मल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया की मौजूदगी बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों के लिए जानलेवा साबित हो सकती है। ऐसे मामलों में समय पर कार्रवाई न होने से हालात तेजी से बिगड़ सकते हैं।
Final Thoughts from Hindi.TheTrendingPeople.com
भागीरथपुरा की घटना केवल एक स्थानीय स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि शहरी बुनियादी ढांचे की कमजोरियों का आईना है। ऑडिट रिपोर्ट ने बीमारी और मौतों के बीच संबंध की ओर इशारा कर दिया है, लेकिन असली चुनौती जवाबदेही तय करने की है। सुरक्षित पेयजल हर नागरिक का मूल अधिकार है। जब तक जल आपूर्ति व्यवस्था की नियमित जांच, पारदर्शिता और जिम्मेदारी तय नहीं की जाती, तब तक ऐसे हादसे दोहराए जाने का खतरा बना रहेगा।
