जर्मनी की 'कैद' में भारत की बेटी—यौन शोषण के आरोप झूठे निकले, फिर भी 5 साल की अरिहा को मां-बाप से दूर रखने की जिद क्यों? PM मोदी ने खुद संभाला मोर्चाPTI
नई दिल्ली/बर्लिन, दिनांक: 13 जनवरी 2026 — कल्पना कीजिए एक ऐसी मां की, जिसकी गोद से उसकी सात महीने की दूधमुंही बच्ची को छीन लिया जाए और वजह सिर्फ इतनी हो कि बच्ची को गलती से चोट लग गई थी। विदेशी धरती, विदेशी कानून और विदेशी भाषा के बीच फंसी एक भारतीय मां पिछले कई सालों से अपनी बेटी की एक झलक पाने को तरस रही है। यह कोई फिल्म की कहानी नहीं, बल्कि 'बेबी अरिहा' (Baby Ariha) की दर्दनाक हकीकत है, जो अपने माता-पिता से हजारों मील दूर जर्मनी के एक फोस्टर केयर (Foster Care) में बड़ी हो रही है।
यह मामला अब सिर्फ एक परिवार की कानूनी लड़ाई नहीं रहा, बल्कि भारत और जर्मनी के बीच एक बड़ा भावनात्मक और कूटनीतिक मुद्दा बन गया है। स्थिति की संवेदनशीलता को देखते हुए अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) ने खुद मोर्चा संभाल लिया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पीएम मोदी ने जर्मन चांसलर ओलाफ शोल्ज़ (Olaf Scholz) से इस मुद्दे पर सीधी और सख्त बात की है। आखिर क्यों यौन शोषण के आरोप खारिज होने के बाद भी एक भारतीय बच्ची को वतन लौटने नहीं दिया जा रहा? आइए समझते हैं इस मामले के हर पेंच को।
खुशियों को लगी नजर: क्या हुआ था सितंबर 2021 में?
कहानी की शुरुआत 2018 में हुई जब गुजरात के रहने वाले सॉफ्टवेयर इंजीनियर भावेश शाह और उनकी पत्नी धरा शाह एक बेहतर भविष्य की तलाश में जर्मनी शिफ्ट हुए। 2021 में बर्लिन में उनके घर एक नन्ही परी 'अरिहा' का जन्म हुआ।
- हादसा: सितंबर 2021 में, जब अरिहा महज 7 महीने की थी, उसे खेलते समय थोड़ी चोट लग गई (कथित तौर पर नानी की गोद में)। इसके बाद मां धरा ने डायपर में खून देखा।
- अस्पताल और शक: घबराए माता-पिता उसे अस्पताल ले गए। डॉक्टरों ने इलाज तो किया, लेकिन उन्हें शक हुआ कि बच्ची के साथ 'यौन शोषण' (Sexual Abuse) हुआ है। उन्होंने तुरंत जर्मनी की बाल संरक्षण एजेंसी 'यूगेंडम्ट' (Jugendamt) को सूचित कर दिया। एजेंसी ने बिना देर किए बच्ची को अपनी कस्टडी में ले लिया। यहीं से एक परिवार की बर्बादी शुरू हुई।
विडंबना: माँ-बाप निर्दोष, फिर भी बेटी नहीं मिली
इस केस का सबसे चौंकाने वाला पहलू जर्मन जांच एजेंसियों की रिपोर्ट है।
- क्लीन चिट: बच्ची को कस्टडी में लेने के बाद पुलिस ने डीएनए टेस्ट और मेडिकल जांच की। 2022 की शुरुआत में पुलिस ने माना कि बच्ची के साथ कोई यौन शोषण नहीं हुआ था। माता-पिता के खिलाफ क्रिमिनल केस बंद कर दिया गया।
- पैंतरा बदला: लेकिन यूगेंडम्ट ने बच्ची नहीं लौटाई। उन्होंने कोर्ट में नया सिविल केस दायर किया और तर्क बदला— "भले ही यौन शोषण नहीं हुआ, लेकिन माता-पिता ने 'हिंसक व्यवहार' किया या लापरवाही बरती, जिससे चोट लगी।"
- फैसला: इस आधार पर जर्मन कोर्ट ने माता-पिता के 'पैरेंटिंग राइट्स' खत्म कर दिए और बच्ची को बालिग होने तक जर्मनी में ही रखने का फरमान सुना दिया।
संस्कृति और पहचान का संकट: 'जैन' बच्ची को मांसाहार?
अरिहा अब लगभग 5 साल की हो चुकी है। वह पिछले कई सालों से जर्मन पालक माता-पिता के पास रह रही है।
- सांस्कृतिक अलगाव: रिपोर्ट्स बताती हैं कि अरिहा अब केवल जर्मन भाषा सीख रही है। वह अपनी मातृभाषा (गुजराती/हिंदी) और भारतीय संस्कारों से पूरी तरह कट चुकी है।
- धार्मिक आस्था: धरा शाह का सबसे बड़ा दर्द यह है कि उनकी बेटी एक जैन परिवार से है, जहां अहिंसा परम धर्म है। लेकिन फोस्टर केयर में उसे मांसाहारी भोजन (Meat/Eggs) दिया जा रहा है। एक मां के लिए यह देखना कि उसकी बेटी अपनी जड़ों और पहचान को खो रही है, किसी सजा से कम नहीं है।
संसद में गूंजी चीख: "मुझे सिर्फ मेरी बेटी चाहिए"
हताश होकर धरा और भावेश भारत लौट आए और सरकार से गुहार लगाई। धरा शाह ने भारतीय संसद भवन पहुंचकर अपनी व्यथा सुनाई, जिसे सुनकर जया बच्चन समेत कई सांसद भावुक हो गए। धरा का कहना है:
"किसी देश का कानून किसी मां को उसकी बच्ची से कैसे अलग कर सकता है? अगर मेरी बेटी मुझे मिल गई, तो मैं वादा करती हूं कि वह कभी जर्मनी वापस नहीं जाएगी। मुझे बस मेरी बेटी चाहिए।"
कूटनीतिक प्रयास और 3 बड़े पेंच
भारत सरकार, विदेश मंत्रालय और अब प्रधानमंत्री मोदी इस मामले को सुलझाने के लिए पूरा जोर लगा रहे हैं। भारत ने जर्मनी को विकल्प दिया है कि अगर उन्हें माता-पिता पर भरोसा नहीं है, तो वे बच्ची को भारत भेज दें, जहां उसे किसी जैन फोस्टर फैमिली में रखा जाएगा।
लेकिन पेंच कहां फंसा है?
- जर्मन कानून: वहां 'बच्चे के अधिकार' (Child Rights) माता-पिता के अधिकारों से ऊपर हैं। कोर्ट का तर्क है कि अरिहा अब जर्मन माहौल में ढल चुकी है, उसे वहां से निकालना उसके मानसिक विकास के लिए ठीक नहीं होगा (Continuity of Care)।
- नागरिकता की अनदेखी: भारत का तर्क है कि अरिहा एक भारतीय नागरिक है। उसे अपनी संस्कृति और देश में बड़े होने का जन्मसिद्ध अधिकार है। जर्मनी एक भारतीय बच्चे को उसकी जड़ों से नहीं काट सकता।
- लंबी अवधि: कोर्ट ने बालिग होने तक उसे वहीं रखने का फैसला दिया है, जो भारत वापसी के रास्ते बंद करता है।
हमारी राय (The Trending People Analysis)
बेबी अरिहा का मामला नॉर्वे के 'अभिज्ञान और ऐश्वर्या' केस (जिस पर 'मिसेज चटर्जी वर्सेज नॉर्वे' फिल्म बनी थी) की याद दिलाता है। यह लड़ाई अब एक बच्चे की कस्टडी से आगे बढ़कर राष्ट्रीय संप्रभुता (Sovereignty) और सांस्कृतिक अस्मिता की लड़ाई बन गई है।
The Trending People का विश्लेषण है कि पीएम मोदी का हस्तक्षेप उम्मीद की आखिरी किरण है। जर्मनी के साथ भारत के अच्छे संबंध हैं, लेकिन मित्रता का मतलब यह नहीं कि हम अपने नागरिक के अधिकारों से समझौता कर लें। एक 5 साल की बच्ची को उसकी भाषा, धर्म और माता-पिता से वंचित रखना 'बाल संरक्षण' नहीं, बल्कि 'मानवाधिकार हनन' है। भारत को कूटनीतिक दबाव तब तक बनाए रखना चाहिए जब तक अरिहा अपने वतन वापस नहीं आ जाती।
