पानी की जंग पर पिघली बर्फ? पंजाब और हरियाणा के मुख्यमंत्रियों की ऐतिहासिक बैठक, "दुश्मन नहीं, भाई हैं हम
चंडीगढ़, दिनांक: 27 जनवरी 2026 — पंजाब और हरियाणा के बीच दशकों से चला आ रहा सतलुज-यमुना लिंक (SYL) नहर का विवाद अब सुलह की दिशा में एक कदम आगे बढ़ता दिख रहा है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर मंगलवार को चंडीगढ़ के ताज होटल में दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों—नायब सिंह सैनी (हरियाणा) और भगवंत मान (पंजाब)—के बीच एक महत्वपूर्ण और सौहार्दपूर्ण बैठक संपन्न हुई। 1981 के समझौते के लागू न होने और पानी के बंटवारे को लेकर चली आ रही तल्खी के बीच यह संवाद एक नई उम्मीद लेकर आया है। बैठक के बाद दोनों नेताओं ने संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि हम दुश्मन नहीं, भाई हैं और मिल-बैठकर इस मसले का हल निकालेंगे।
बैठक का लब्बोलुआब यह रहा कि अब अगली चर्चा दोनों राज्यों के सिंचाई विभाग के अधिकारियों के बीच होगी, जो तकनीकी और व्यावहारिक पहलुओं पर बात करेंगे। इसके बाद दोनों मुख्यमंत्री अंतिम दौर की वार्ता कर विवाद का स्थायी समाधान निकालेंगे। हरियाणा के सीएम नायब सिंह सैनी ने पंजाब को गुरुओं की धरती बताते हुए कहा कि गुरु नानक देव जी की वाणी—'पवन गुरु, पानी पिता'—आज भी हमारा मार्गदर्शन कर रही है। वहीं, पंजाब के सीएम भगवंत मान ने पानी की कमी का हवाला देते हुए कहा कि नहर बनाने से पहले जल बंटवारे पर समझौता जरूरी है, क्योंकि जब पानी ही नहीं है तो नहर का क्या फायदा?
हालांकि, इस सकारात्मक पहल के बीच विपक्ष ने सवाल खड़े किए हैं। इनेलो अध्यक्ष अभय चौटाला ने इसे केवल 'टाइम पास' और मामले को लटकाने की कोशिश बताया है। उनका आरोप है कि पंजाब सुप्रीम कोर्ट के आदेश को मानने को तैयार नहीं है और हरियाणा सरकार केंद्र के इशारे पर चल रही है। एसवाईएल विवाद की जड़ें 1955 के जल बंटवारे और 1966 में पंजाब के विभाजन में हैं। हरियाणा ने अपने हिस्से की नहर बना ली है, लेकिन पंजाब ने पानी की कमी का तर्क देकर अपने हिस्से का काम रोक दिया है।
हमारी राय (The Trending People Analysis)
यह बैठक एक सकारात्मक शुरुआत है, लेकिन एसवाईएल विवाद का हल केवल 'चाय पर चर्चा' से नहीं निकलेगा। 7 दशकों से लटका यह मसला अब राजनीतिक कम और मानवीय ज्यादा हो गया है। दोनों राज्यों के किसानों को पानी की जरूरत है।
The Trending People का विश्लेषण है कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेशों के बावजूद पंजाब का अड़ियल रवैया संवैधानिक संकट पैदा करता रहा है। अगर अब दोनों राज्य 'अधिकारी स्तर' की वार्ता के लिए सहमत हुए हैं, तो इसे केवल टालने की रणनीति नहीं होनी चाहिए। केंद्र सरकार को भी मध्यस्थता की भूमिका सक्रियता से निभानी होगी। पानी का मसला भावनाओं से नहीं, बल्कि आंकड़ों और न्यायसंगत बंटवारे से ही सुलझ सकता है। उम्मीद है कि 'भाईचारे' की यह बात सिर्फ बयानों तक सीमित नहीं रहेगी।
