स्वच्छ सर्वेक्षण 2025-26 का 'मास्टर प्लान'—अब पान की पीक और दीवार के 'दाग' तय करेंगे शहर की इज्जत, मौके पर जाकर टीम काटेगी नंबर
नई दिल्ली, दिनांक: 30 दिसंबर 2025 — क्या आपका शहर देश का सबसे साफ शहर बनने का सपना देख रहा है? अगर हां, तो अब नगर निगमों को कागजी घोड़े दौड़ाने के बजाय दीवारों के धब्बों और सड़कों के कोनों पर ध्यान देना होगा। केंद्रीय शहरी आवासन मंत्रालय (MoHUA) ने स्वच्छ सर्वेक्षण 2025-26 के लिए जो नया 'टूलकिट' जारी किया है, उसने सफाई के मानकों को पूरी तरह बदल दिया है।
इस बार का सर्वेक्षण केवल कचरा उठाने तक सीमित नहीं होगा, बल्कि यह नागरिकों की 'सिविक सेंस' (Civic Sense) की भी परीक्षा लेगा। नए नियमों के मुताबिक, दीवारों पर पान-गुटखा की पीक (रेड स्पॉट) और खुले में पेशाब (येलो स्पॉट) अब सीधे तौर पर आपके शहर की रैंकिंग को नीचे गिरा सकते हैं। कुल अंक बढ़ाकर 12,500 कर दिए गए हैं, जिनमें से बड़ा हिस्सा 'दृश्यमान स्वच्छता' (Visible Cleanliness) पर निर्भर करेगा।
'रेड' और 'येलो' स्पॉट का गणित: गंदगी दिखी तो गए नंबर
इस बार के सर्वेक्षण का सबसे चर्चित पहलू 'स्पॉट मार्किंग' है। पहले जहां गंदगी की शिकायत करने पर कार्रवाई होती थी, अब टीम खुद ढूंढ-ढूंढ कर नंबर काटेगी।
- रेड स्पॉट (Red Spot): दीवारों, डिवाइडर या सार्वजनिक स्थलों पर पान, गुटखा या तंबाकू खाकर थूकने से बने लाल दाग।
- येलो स्पॉट (Yellow Spot): खुले में पेशाब करने से गंदगी वाले स्थान।
जुर्माना तय: इन दोनों के लिए अलग-अलग 75 अंक तय किए गए हैं। यानी अगर टीम को निरीक्षण के दौरान शहर में कहीं भी ये दाग दिखते हैं, तो सीधे 150 अंकों तक की कटौती हो सकती है। यह कटौती कांटे की टक्कर वाली रैंकिंग में किसी भी शहर को टॉप-10 से बाहर फेंकने के लिए काफी है।
टीम का 'सरप्राइज विजिट': बिना सूचना के होगा मूल्यांकन
स्वच्छ सर्वेक्षण 2025-26 में नगर निगमों को संभलने का मौका नहीं मिलेगा। शासन का मानना है कि शिकायत-आधारित व्यवस्था में कई बार जमीनी हकीकत छिप जाती थी।
- अचानक निरीक्षण: मूल्यांकन टीमें बिना किसी पूर्व सूचना के शहरों में पहुंचेंगी।
- दायरा: वे केवल पॉश इलाकों में नहीं, बल्कि आवासीय कॉलोनियों, व्यावसायिक क्षेत्रों, सार्वजनिक स्थानों, परिवहन केंद्रों (बस स्टैंड/रेलवे स्टेशन), पर्यटन स्थलों और पार्कों का दौरा करेंगी।
- सबूत: टीम मौके की फोटो और वीडियो लेकर 'जियो-टैगिंग' के साथ वास्तविक स्थिति दर्ज करेगी। उन्हें रिपोर्ट में यह लिखना होगा कि दीवारें और सार्वजनिक स्थल लाल-पीले धब्बों से पूरी तरह मुक्त हैं या नहीं।
कागजों से नहीं, 'आंखों देखी' से मिलेगी रैंक
सर्वेक्षण का संदेश स्पष्ट है—सफाई अब फाइलों और पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन में नहीं, बल्कि सड़क पर दिखनी चाहिए। इस बार 10,500 अंक सीधे तौर पर 'स्थल आधारित मूल्यांकन' (Site Based Assessment) से जुड़े हैं।
अंकों का बंटवारा (Breakdown): सरकार ने विभिन्न कार्यों के लिए अंकों का निर्धारण कर दिया है:
- विजिबल क्लीनलीनेस (दृश्यमान स्वच्छता): 1500 अंक
- सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट: 1500 अंक
- स्वच्छता की वकालत (Advocacy): 1500 अंक
- सिटीजन फीडबैक: 1000 अंक
- कचरा पृथक्करण और परिवहन: 1000 अंक
- सेनिटेशन तक पहुंच: 1000 अंक
- इको-सिस्टम और संस्थागत ढांचा: 1000 अंक
- प्रयुक्त जल प्रबंधन (Used Water): 1000 अंक
- सफाई कर्मियों का कल्याण: 500 अंक
- मैकेनाइजेशन: 500 अंक
जनभागीदारी 2.0: साल भर रिपोर्टर बनेंगे नागरिक
नागरिकों की भूमिका में भी क्रांतिकारी बदलाव किया गया है। अब आपको साल के अंत में फीडबैक देने का इंतजार नहीं करना होगा।
- 24x7 निगरानी: जनभागीदारी अब साल भर चलने वाली प्रक्रिया होगी। नागरिक 'स्वच्छता ऐप', 'माईगव' (MyGov), 'वोट फॉर माय सिटी' पोर्टल और क्यूआर कोड के जरिए कभी भी अपनी राय दे सकेंगे।
- सत्यापन: सबसे अहम बात यह है कि इस बार नगर निगम जो दावे करेगा, उनकी पुष्टि (Validation) भी नागरिक ही करेंगे। अगर निगम कहता है कि कचरा रोज उठ रहा है और नागरिक ऐप पर 'ना' कहते हैं, तो निगम के दावे खारिज हो जाएंगे।
हमारी राय
स्वच्छ सर्वेक्षण 2025-26 का टूलकिट एक स्वागत योग्य कदम है जो 'स्वच्छ भारत' मिशन को अगले स्तर पर ले जाता है। अब तक की लड़ाई कचरे के ढेर हटाने की थी, अब लड़ाई 'आदतों' को बदलने की है। पान की पीक और खुले में पेशाब हमारी सिविक सेंस पर बदनुमा दाग हैं।
The Trending People का मानना है कि रेड और येलो स्पॉट पर नंबर काटने का डर प्रशासन को सख्त कार्रवाई करने पर मजबूर करेगा। लेकिन यह लड़ाई अकेले नगर निगम नहीं जीत सकता। जब तक नागरिक यह नहीं समझेंगे कि सड़क उनका 'डस्टबिन' या 'वॉशरूम' नहीं है, तब तक 12,500 में से पूरे अंक लाना नामुमकिन होगा। यह सर्वेक्षण शहरों के बीच प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि हमारे संस्कारों का रिपोर्ट कार्ड बनने जा रहा है।
