नए साल पर गडकरी का 'जादू'—अब टोल नाकों पर नहीं लगेंगी ब्रेक, 80 की स्पीड में कैमरा करेगा स्कैन, बिना रुके कटेगा पैसाPhotograph by Jaison G. via Bussinesstoday
नई दिल्ली, दिनांक: 29 दिसंबर 2025 — नए साल 2026 के आगमन के साथ ही देश के करोड़ों वाहन चालकों को सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की ओर से एक ऐसी सौगात मिलने जा रही है, जो हाईवे के सफर की तस्वीर पूरी तरह बदल देगी। अगर आप भी टोल प्लाजा पर लगने वाली लंबी-लंबी कतारों, फास्टैग स्कैनिंग में होने वाली देरी और ईंधन की बर्बादी से परेशान हैं, तो खुश हो जाइए। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी (Nitin Gadkari) के नेतृत्व में मंत्रालय ने देश को 'टोल बैरियर मुक्त' बनाने के लिए एक अत्याधुनिक 'कैमरा बेस्ड टोलिंग सिस्टम' (ANPR - Automatic Number Plate Recognition) का पूरा रोडमैप तैयार कर लिया है।
इस क्रांतिकारी तकनीक के लागू होने के बाद, यात्रियों को टोल भुगतान के लिए अपनी गाड़ी को न तो रोकने की जरूरत होगी और न ही धीमा करने की। आप फर्राटे भरते हुए निकल जाएंगे और टोल अपने आप कट जाएगा।
क्या है मंत्रालय का 'जीरो वेटिंग' प्लान?
केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का लक्ष्य राष्ट्रीय राजमार्गों और एक्सप्रेसवे पर वेटिंग टाइम (Waiting Time) को घटाकर शून्य मिनट पर लाना है। मौजूदा फास्टैग व्यवस्था ने काफी राहत दी है, लेकिन बैरियर खुलने में लगने वाला समय अब भी जाम का कारण बनता है।
एमएलएफएफ तकनीक (MLFF): इसके लिए सरकार मल्टी लेन फ्री फ्लो (Multi Lane Free Flow) तकनीक का इस्तेमाल करने जा रही है।
- बैरियर हटेंगे: इस तकनीक के तहत एक्सप्रेसवे और हाईवे से धीरे-धीरे फिजिकल टोल बैरियर (डंडे/बूम बैरियर) हटा दिए जाएंगे।
- हाई-टेक कैमरे: इनकी जगह हाईवे पर हाई-रेजोल्यूशन ANPR कैमरे लगाए जाएंगे। ये कैमरे इतने उन्नत हैं कि 80 किलोमीटर प्रति घंटे या उससे भी अधिक रफ्तार से दौड़ती गाड़ियों की नंबर प्लेट को आसानी से और सटीक रूप से स्कैन कर सकेंगे।
कैसे काम करेगा 'जादुई' सिस्टम?
यह सिस्टम पूरी तरह से डिजिटल और स्वचालित होगा।
- लिंकिंग: ऑटोमैटिक भुगतान के लिए गाड़ी की नंबर प्लेट को सीधे आपके FASTag वॉलेट और बैंक खाते से लिंक किया जाएगा।
- ट्रैकिंग: जैसे ही आपकी गाड़ी हाईवे पर एंट्री करेगी, वहां लगा कैमरा उसे रिकॉर्ड कर लेगा। जब आप हाईवे से एग्जिट (बाहर) करेंगे, तो दूसरा कैमरा फिर से स्कैन करेगा।
- भुगतान: एंट्री और एग्जिट पॉइंट के बीच तय की गई सटीक दूरी के आधार पर सिस्टम गणना करेगा और टोल राशि आपके खाते से अपने आप कट जाएगी। इसका फायदा यह होगा कि आप जितने किलोमीटर चलेंगे, सिर्फ उतना ही पैसा देंगे।
दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे पर ट्रायल सफल: अब यहां होगी शुरुआत
सरकार ने इस तकनीक को सीधे लागू करने से पहले इसकी विश्वसनीयता परखी है। दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे (DME) पर इस नए सिस्टम का पायलट प्रोजेक्ट और ट्रायल सफलतापूर्वक पूरा हो चुका है, जहां कैमरे नंबर प्लेट पढ़ने में सफल रहे हैं।
रोल-आउट प्लान: नए साल से इसकी औपचारिक शुरुआत उन एक्सप्रेसवे और हाईवे से की जाएगी जहां वाहनों का दबाव (Traffic Volume) सबसे अधिक रहता है।
- फोकस एरिया: दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, पुणे और बेंगलुरु जैसे व्यस्त शहरों को जोड़ने वाले कॉरिडोर प्राथमिकता पर हैं।
- दूरी का नियम: जिन हाईवे पर टोल प्लाजा बहुत पास-पास हैं (60 किलोमीटर के नियम का उल्लंघन), वहां एक प्लाजा को हटाकर उसकी जगह यह कैमरा आधारित सिस्टम लगाया जाएगा।
देश को होंगे अरबों के फायदे: एक तीर से दो निशाने
यह बदलाव केवल सुविधा के लिए नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी मील का पत्थर साबित होगा। सरकार के आंतरिक अनुमान बताते हैं:
- ईंधन की बचत: टोल प्लाजा पर गाड़ियां रुकती हैं या रेंगती हैं, जिससे इंजन चालू रहता है और ईंधन बर्बाद होता है। इस निर्बाध सिस्टम से सालाना लगभग 1,500 करोड़ रुपये के ईंधन की बचत होने का अनुमान है।
- राजस्व में बढ़ोतरी: टोल चोरी एक बड़ी समस्या रही है। ANPR सिस्टम से हर गाड़ी ट्रैक होगी, जिससे लीकेज बंद होगा। इससे सरकारी खजाने में सालाना करीब 6,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त बढ़ोतरी होने की उम्मीद है, जिसका उपयोग सड़कों के रखरखाव में किया जाएगा।
हमारी राय
'कैमरा बेस्ड टोलिंग' भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर को विकसित देशों की कतार में खड़ा करने वाला कदम है। समय और ईंधन की बचत आज की सबसे बड़ी जरूरत है। हालांकि, इस सिस्टम की सफलता के लिए कुछ चुनौतियां भी हैं। सबसे बड़ी चुनौती नंबर प्लेट्स का मानकीकरण (Standardization) है। भारत में आज भी कई गाड़ियों पर फैंसी या टूटी हुई नंबर प्लेट्स लगी हैं जिन्हें कैमरे पढ़ नहीं पाएंगे।
The Trending People का मानना है कि सरकार को इस सिस्टम को लागू करने के साथ-साथ नंबर प्लेट के नियमों को सख्ती से लागू करना होगा। इसके अलावा, निजता (Privacy) और डेटा सुरक्षा को लेकर भी स्थिति स्पष्ट करनी होगी। अगर तकनीकी खामियों (जैसे गलत चालान या टोल कटना) को दूर कर लिया जाए, तो यह सिस्टम भारतीय सड़कों के लिए किसी वरदान से कम नहीं होगा। अब वह दिन दूर नहीं जब 'टोल नाका' शब्द इतिहास बन जाएगा।