जब 'आनंद' संसद में गूंजा—राजेश खन्ना की सियासी दास्तां, आडवाणी से 1500 वोटों की हार और शत्रुघ्न सिन्हा पर ऐतिहासिक जीत
नई दिल्ली — भारतीय सिनेमा के इतिहास में अगर किसी को 'सुपरस्टार' शब्द का पर्याय माना जाता है, तो वह नाम है राजेश खन्ना (Rajesh Khanna)। जिन्हें दुनिया प्यार से 'काका' कहती थी, उन्होंने 70 के दशक में बॉक्स ऑफिस पर जो राज किया, वह किसी से छिपा नहीं है। लेकिन 1980 के दशक के अंत में, जब रूपहले पर्दे पर उनकी चमक थोड़ी फीकी पड़ने लगी, तो उन्होंने जीवन का एक नया और कठिन रास्ता चुना— राजनीति (Politics)।
यह कहानी केवल एक अभिनेता के नेता बनने की नहीं है, बल्कि ग्लैमर की चकाचौंध से निकलकर संसद की गंभीर और धूल भरी दुनिया में कदम रखने की एक जद्दोजहद है। 1991 से 1996 तक नई दिल्ली के सांसद के रूप में उनकी पांच साल की यात्रा ड्रामा, इमोशन और उतार-चढ़ाव से भरी रही, ठीक उनकी फिल्मों की तरह।
1984 से शुरुआत: राजीव गांधी का बुलावा और 'बदले' की आहट
राजेश खन्ना का राजनीति में प्रवेश अचानक नहीं हुआ था। इसकी नींव 1984 में ही पड़ गई थी, जब उन्होंने कांग्रेस पार्टी के लिए प्रचार करना शुरू किया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कहने पर वे चुनावी मैदान में सक्रिय हुए।
राजनीतिक गलियारों में दबी जुबान में यह भी कहा जाता है कि उनका प्रवेश कुछ व्यक्तिगत कारणों से प्रेरित था। अमिताभ बच्चन, जो कभी उनके गहरे दोस्त हुआ करते थे, उस समय राजनीति से दूर हो रहे थे और राजीव गांधी से उनके रिश्तों में खटास आ चुकी थी। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि राजेश खन्ना का नामांकन बच्चन के खिलाफ एक तरह का मनोवैज्ञानिक 'बदला' या विकल्प था।
1991 का महामुकाबला: आडवाणी बनाम काका
राजेश खन्ना के लिए असली परीक्षा 1991 के लोकसभा चुनाव में आई। कांग्रेस ने उन्हें देश की सबसे प्रतिष्ठित सीटों में से एक—नई दिल्ली (New Delhi)—से टिकट दिया। उनके सामने कोई मामूली नेता नहीं, बल्कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) के दिग्गज लाल कृष्ण आडवाणी (L.K. Advani) थे।- माहौल: दिल्ली की सड़कों पर जब राजेश खन्ना की रैलियां निकलती थीं, तो नजारा देखने लायक होता था। लोग उनके गानों पर झूमते और 'बाबू मोशाय' के नारे लगाते।
- परिणाम: मतगणना के दिन सांसें थमी हुई थीं। परिणाम आया तो आडवाणी जीत गए, लेकिन जीत का अंतर बेहद मामूली था—महज 1,589 वोट।
- प्रतिक्रिया: राजेश खन्ना इस हार से स्तब्ध थे। उन्होंने मतगणना में धांधली का आरोप लगाया और कहा, "मैं हार नहीं माना, लेकिन हार हुई है।"
1992 उपचुनाव: 'शॉटगन' खामोश, 'काका' की वापसी
किस्मत को शायद कुछ और मंजूर था। हवाला कांड के चलते या अन्य राजनीतिक कारणों से आडवाणी ने नई दिल्ली सीट छोड़ दी, और 1992 में उपचुनाव (By-election) की घोषणा हुई। कांग्रेस ने फिर से राजेश खन्ना पर दांव खेला।
इस बार मुकाबला और भी दिलचस्प था। बीजेपी ने राजेश खन्ना के खिलाफ एक और फिल्म स्टार—शत्रुघ्न सिन्हा (Shatrughan Sinha)—को मैदान में उतारा। यह लड़ाई 'कांग्रेस बनाम बीजेपी' से ज्यादा 'काका बनाम शॉटगन' बन गई।
- प्रचार युद्ध: शत्रुघ्न सिन्हा ने कहा, "मैं राजनीति में हूं, फिल्में छोड़ चुका हूं," ताकि वे खुद को गंभीर नेता साबित कर सकें। लेकिन राजेश खन्ना की लोकप्रियता चरम पर थी। वे घर-घर जाकर लोगों से मिले। उनकी रैलियों में "मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू" बजता था और जनता मंत्रमुग्ध हो जाती थी।
- जीत: परिणाम ऐतिहासिक रहा। राजेश खन्ना ने शत्रुघ्न सिन्हा को 28,256 वोटों के भारी अंतर से हराया। दिल्ली ने अपने सुपरस्टार को अपना सांसद चुन लिया था। बाद में शत्रुघ्न ने स्वीकार किया कि खन्ना के खिलाफ चुनाव लड़ना उनकी राजनीतिक जिंदगी की सबसे बड़ी गलती थी।
सांसद बनते ही बदली जिंदगी: बंगले से संसद तक
चुनाव जीतते ही राजेश खन्ना का जीवन पूरी तरह बदल गया। वे मायानगरी मुंबई छोड़कर दिल्ली शिफ्ट हो गए।
- निवास: पहले वे सोम विहार में रहे, फिर अपने दोस्त नरेश जुनेजा के वसंत कुंज अपार्टमेंट में। अंततः, उन्हें 81, लोधी एस्टेट में सरकारी बंगला मिला, जो जनता दरबार का केंद्र बन गया।
- फिल्में छोड़ीं: उन्होंने संसद के लिए फिल्मों की कुर्बानी दे दी। इस दौरान उनकी सिर्फ एक फिल्म 'खुदाई' (1994) रिलीज हुई। उन्होंने कसम खाई—'अब मैं सांसद हूं, जनता की सेवा करूंगा।'
संसद में प्रदर्शन: 'रील' से 'रियल' मुद्दों तक
संसद भवन अब उनका नया स्टेज था, लेकिन यहां स्क्रिप्ट राइटर नहीं थे। यहां जनता के असली मुद्दे थे।
- बहस: राजेश खन्ना ने संसद की बहसों में हिस्सा लिया। वे शिक्षा, स्वास्थ्य और दिल्ली की ट्रैफिक समस्याओं पर अक्सर बोलते थे। उनका विजन बड़ा था। एक बार उन्होंने सदन में कहा, "मैं दिल्ली को विश्व स्तरीय शहर बनाना चाहता हूं, ठीक वैसे ही जैसे मेरी फिल्में विश्व स्तरीय हैं।"
- विकास कार्य: वे कांग्रेस के वफादार सिपाही रहे और राजीव गांधी की नीतियों का समर्थन किया। दिल्ली में झुग्गी-झोपड़ी वालों और गरीबों के लिए योजनाओं पर उन्होंने विशेष जोर दिया।
1993 की बाढ़ और आलोचना: 1993 में जब दिल्ली में बाढ़ आई, तो राजेश खन्ना खुद प्रभावित इलाकों में घुटनों तक पानी में उतर गए और राहत सामग्री बांटी। उनके चाहने वाले इसे 'सेवा' कहते थे, जबकि आलोचक इसे 'शोमैनशिप' या नाटक करार देते थे।
कैसा था उनका व्यवहार? अहंकारी या जनसेवक?
राजेश खन्ना के व्यक्तित्व को लेकर विरोधाभासी बातें कही जाती हैं।
आलोचक: कुछ पत्रकारों का कहना था कि वे संसद में भी स्टार की तरह व्यवहार करते थे और उनमें अहंकार था। उनकी 'फिल्मी स्टाइल' गंभीर राजनीति में कई बार बेमेल लगती थी।
समर्थक: उनके करीबी और ज्योतिषी दोस्त जय प्रकाश लालधागे वाले कहते हैं, "वे दिल के साफ थे और जनता से जुड़े थे। लोधी एस्टेट के बंगले में वे सबसे मिलते थे और वहां आने वाले हर शख्स को नाश्ता और चाय मिलती थी।"
1996: पर्दा गिरता है
राजनीति में 5 साल एक लंबा समय होता है। 1996 में जब अगला चुनाव आया, तो हवा का रुख बदल चुका था। राजेश खन्ना चुनाव हार गए। हार के बाद उन्होंने दिल्ली छोड़ दी और मुंबई लौट गए, लेकिन वे अंत तक कांग्रेस से जुड़े रहे और पार्टी के लिए प्रचार करते रहे। अमिताभ बच्चन से उनकी खामोश दुश्मनी ताउम्र बनी रही।
हमारी राय
राजेश खन्ना की राजनीतिक पारी को विश्लेषक अक्सर 'औसत' या 'उदासीन' करार देते हैं, लेकिन यह पूरा सच नहीं है। उन्होंने सेलिब्रिटी राजनीति (Celebrity Politics) का एक ऐसा दौर शुरू किया जहां स्टार्स केवल भीड़ जुटाने के लिए नहीं, बल्कि चुनाव जीतने के लिए आने लगे।
The Trending People का मानना है कि राजेश खन्ना की नई दिल्ली यात्रा किसी ब्लॉकबस्टर फिल्म की तरह थी—जिसमें ड्रामा था, इमोशन था, और एक ऐसा अंत था जो याद रह गया। फिल्मों में वे 'रोमांटिक हीरो' थे, लेकिन राजनीति में उन्होंने एक 'जनसेवक' बनने की ईमानदार कोशिश की। हालांकि, स्टारडम का बोझ उनके कंधों पर हमेशा रहा, और लोग उन्हें 'सांसद' कम, 'काका' ज्यादा मानते रहे। 2012 में उनकी मृत्यु के बाद भी, उनकी यह राजनीतिक विरासत एक दिलचस्प अध्याय के रूप में जीवित है।

