पीयूष गोयल ने भारत-दक्षिण कोरिया मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस शासन के दौरान 2010 में लागू हुआ यह समझौता “खराब बातचीत” का परिणाम था, जिससे भारत के व्यापार घाटे में बढ़ोतरी हुई।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर दिए गए बयान में गोयल ने कहा कि 2009 में हुए इस समझौते को 2010 में लागू किया गया था और इसमें व्यापार संतुलन भारत के खिलाफ झुका हुआ था। उनके मुताबिक, इस समझौते के बाद दोनों देशों के बीच व्यापार में 92.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई, लेकिन भारत के आयात में 103.7 प्रतिशत का इजाफा हुआ, जिससे असंतुलन और बढ़ा।
यह समझौता भारत-दक्षिण कोरिया मुक्त व्यापार समझौता के रूप में जाना जाता है, जिसे बाद में व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (CEPA) के तहत आगे बढ़ाया गया। गोयल ने बताया कि 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति के बीच बैठक में इस समझौते की समीक्षा पर सहमति बनी थी।
इसके बाद भारत-कोरिया व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (IKCEPA) के तहत पुनर्विचार वार्ता शुरू हुई, जिसमें अब तक 11 दौर की बातचीत हो चुकी है। दोनों देशों ने एक “अर्ली हार्वेस्ट पैकेज” पर भी सहमति जताई है, जिसका उद्देश्य व्यापार को अधिक संतुलित और लाभकारी बनाना है।
सरकार का कहना है कि अब दोनों देश पहले से तय ढांचे से आगे बढ़कर अधिक पारस्परिक लाभ पर आधारित साझेदारी की दिशा में काम कर रहे हैं। इसमें गैर-टैरिफ बाधाओं को कम करना और मूल नियमों (Rules of Origin) को स्पष्ट करना भी शामिल है। उम्मीद है कि यह पुनर्विचार प्रक्रिया 2026 के अंत या 2027 के मध्य तक पूरी हो सकती है।
गोयल ने यह भी कहा कि भारत में काम कर रही कोरियाई कंपनियों के स्थानीयकरण को बढ़ावा देने के प्रयासों के सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं। इससे आयात पर निर्भरता कम होगी और घरेलू उद्योग को मजबूती मिलेगी।
हमारी राय में
भारत-दक्षिण कोरिया व्यापार समझौते पर उठे सवाल यह दिखाते हैं कि वैश्विक व्यापार में संतुलन बनाए रखना कितना जरूरी है। पुराने समझौतों की समीक्षा और सुधार समय की मांग है, ताकि देश के हितों की बेहतर रक्षा हो सके।
