होर्मुज जलडमरूमध्य पर संकट, वैश्विक ऊर्जा सप्लाई पर मंडराया खतरा
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर चिंता तेज हो गई है। ताजा घटनाक्रम सोमवार देर रात सामने आया, जब क्षेत्र में सैन्य गतिविधियों और जहाजों की आवाजाही पर खतरे की आशंका जताई गई।
स्थानीय सूत्रों के मुताबिक, कुछ तेल टैंकरों ने सुरक्षा कारणों से अपनी गति धीमी कर दी है, जबकि कुछ ने वैकल्पिक मार्गों की तलाश शुरू कर दी है। हालांकि, अभी तक किसी बड़े हमले की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
क्यों अहम है होर्मुज जलडमरूमध्य?
यह संकरा समुद्री मार्ग पर्शियन गल्फ और गल्प ऑफ ओमान को जोड़ता है। दुनिया के करीब 20% कच्चे तेल और 25% समुद्री तेल व्यापार का परिवहन इसी रास्ते से होता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यहां किसी भी तरह की रुकावट वैश्विक ऊर्जा बाजार को सीधे प्रभावित कर सकती है।
प्रशासन और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों ने क्षेत्र में सुरक्षा बढ़ाने के संकेत दिए हैं। कई देशों ने अपने जहाजों को सतर्क रहने की सलाह जारी की है। भारत समेत एशियाई देशों ने भी स्थिति पर नजर बनाए रखी है।
अगर यह मार्ग बाधित होता है, तो कच्चे तेल की कीमतों में 30-50% तक उछाल संभव है। इसका सीधा असर पेट्रोल, डीजल और गैस की कीमतों पर पड़ेगा।
ऊर्जा महंगी होने से ट्रांसपोर्ट, बिजली और खाद्य वस्तुओं की लागत बढ़ेगी, जिससे वैश्विक महंगाई तेज हो सकती है। भारत, चीन, जापान और कोरिया जैसे देश इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं।
सप्लाई चेन और बाजारों पर असर
तेल के साथ LNG और अन्य जरूरी सामान की सप्लाई भी प्रभावित हो सकती है। शिपिंग में देरी से उद्योगों पर असर पड़ेगा और शेयर बाजारों में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।
इससे पहले भी पश्चिम एशिया में तनाव के दौरान होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर कई बार खतरे की स्थिति बनी है। हर बार इसका असर वैश्विक बाजारों पर देखा गया है।
फिलहाल स्थिति संवेदनशील बनी हुई है और पूरी दुनिया की नजर इस अहम समुद्री मार्ग पर टिकी है।
होर्मुज जलडमरूमध्य पर बढ़ता तनाव केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक चिंता का विषय है। यह स्पष्ट करता है कि ऊर्जा आपूर्ति कितनी हद तक कुछ अहम मार्गों पर निर्भर है। ऐसे में देशों को वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों और सप्लाई रूट्स पर तेजी से काम करने की जरूरत है। अगर स्थिति और बिगड़ती है, तो इसका असर सीधे आम लोगों की जेब पर पड़ेगा और वैश्विक अर्थव्यवस्था को झटका लग सकता है।
