चीन का नया कदम: शिनजियांग में ‘सेनलिंग’ प्रांत का गठन
पश्चिम एशिया में ईरान-अमेरिका तनाव के बीच चीन ने अपने संवेदनशील क्षेत्र शिनजियांग उइगर ऑटोनॉमस क्षेत्र में एक नया प्रांत ‘सेनलिंग’ बनाने का ऐलान किया है। यह इलाका पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) और अफगानिस्तान सीमा के करीब स्थित है, जिससे इसकी रणनीतिक अहमियत और बढ़ जाती है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह नया प्रांत काशगर क्षेत्र के प्रशासन के अंतर्गत रहेगा, जो चीन को दक्षिण और मध्य एशिया से जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण केंद्र है।
योजना की रूपरेखा: रणनीतिक विस्तार और CPEC कनेक्शन
सेनलिंग प्रांत का निर्माण चीन की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। यह क्षेत्र काराकोरम रेंज के पास स्थित है और काशगर के जरिए चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) से जुड़ा है।
CPEC, चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का अहम हिस्सा है, जिसमें करीब 62 बिलियन डॉलर का निवेश शामिल है। भारत पहले ही इस परियोजना का विरोध करता रहा है, क्योंकि यह पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से होकर गुजरती है।
भारत की प्रतिक्रिया: विदेश मंत्रालय का कड़ा रुख
भारत ने चीन के इस कदम पर चिंता जताई है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि चीन द्वारा विवादित क्षेत्रों में इस तरह के प्रशासनिक बदलाव और नामकरण की कोशिशें स्वीकार्य नहीं हैं।
उन्होंने साफ कहा कि अरुणाचल प्रदेश और अन्य विवादित क्षेत्र भारत का अभिन्न हिस्सा हैं और चीन के दावे वास्तविकता को नहीं बदल सकते। भारत ने यह भी चेतावनी दी कि इस तरह की गतिविधियां दोनों देशों के संबंधों को सामान्य बनाने की कोशिशों को नुकसान पहुंचा सकती हैं।
यह पहला मौका नहीं है जब चीन ने शिनजियांग में प्रशासनिक बदलाव किए हों। इससे पहले ‘हीन’ और ‘हेकांग’ नाम के दो नए प्रांत बनाए गए थे, जिनमें से एक में अक्साई चिन का हिस्सा भी शामिल बताया जाता है।
अक्साई चिन, जिसे भारत लद्दाख का हिस्सा मानता है, 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद से विवाद का प्रमुख कारण बना हुआ है।
प्रभाव: क्षेत्रीय और वैश्विक असर
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन का यह कदम केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि एक बड़ा भू-राजनीतिक संकेत है। इससे भारत-चीन संबंधों में तनाव बढ़ सकता है।
इसके अलावा, यह कदम दक्षिण एशिया और मध्य एशिया में चीन के प्रभाव को और मजबूत करने की दिशा में भी देखा जा रहा है।
शिनजियांग में नए प्रांत का गठन चीन की रणनीतिक नीति का हिस्सा है, लेकिन इससे भारत-चीन संबंधों में नई चुनौतियां सामने आ सकती हैं।
चीन का यह कदम केवल आंतरिक प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि एक स्पष्ट भू-राजनीतिक संदेश है। भारत के लिए यह जरूरी है कि वह कूटनीतिक और रणनीतिक स्तर पर सतर्क रहे। ऐसे समय में संवाद और संतुलन बनाए रखना अहम है, ताकि क्षेत्रीय स्थिरता बनी रहे।
