संसद की बात | भैया, संसद में आजकल जो चल रहा है ना, उसने तो हद ही कर दी है! 2026 के बजट सत्र में सरकार और विपक्ष के बीच की लड़ाई अब और भी तगड़ी हो गई है। हमारे संसदीय कार्य मंत्री किरेन रीजीजू ने तो सीधे-सीधे राहुल गांधी पर निशाना साध दिया है। रीजीजू भाई का कहना है कि राहुल गांधी को न तो संसद की गरिमा की फ़िक्र है और न ही वो चाहते हैं कि सदन शांति से चले। उन्होंने तो यहाँ तक कह दिया कि राहुल जी कुछ बाहर के लोगों और NGOs के कहने पर चल रहे हैं, जिनका काम बस काम रोकना है!
रीजीजू जी जब अपने घर यानी अरुणाचल पश्चिम के दौरे पर थे, तब उन्होंने 'पीटीआई' से बात करते हुए सरकार का पक्ष एकदम साफ़ कर दिया। उन्होंने साफ़-साफ़ कह दिया कि अब सरकार कांग्रेस को मनाने के लिए और मेहनत नहीं करेगी, क्योंकि बहुत बार कोशिश कर ली और सब बेकार रहा!
क्या राहुल गांधी वाकई NGO के कहने पर चल रहे हैं?
रीजीजू जी ने एक बड़ी बात कही है। उन्होंने दावा किया कि राहुल गांधी को कुछ NGOs ने ये पट्टी पढ़ा दी है कि अगर वो संसद में शोर मचाएंगे और काम रोकेंगे, तो कांग्रेस के "अच्छे दिन" आ जाएंगे। रीजीजू बोले:
"राहुल गांधी को चर्चा करने में कोई मज़ा नहीं आता, उन्हें तो बस हेडलाइंस बनानी है और मुद्दे खड़े करने हैं! उन्हें लग रहा है कि संसद रोकने से लोग उन्हें पसंद करेंगे, पर देख लेना, अगले चुनाव में कांग्रेस की सीटें और भी कम हो जाएंगी। वो ऐसी सलाह मान रहे हैं जिसका हकीकत से कोई लेना-देना ही नहीं है!"
बहुत मना लिया, अब और नहीं!
संसदीय कार्य मंत्री ने बताया कि उन्होंने संसद चलाने के लिए बहुत हाथ-पैर मारे। उन्होंने खुद कांग्रेस के बड़े नेता के.सी. वेणुगोपाल और बाकी लोगों से बात की थी ताकि बजट जैसे ज़रूरी मुद्दे पर बात हो सके, पर बात बनी ही नहीं।
- सरकार का रुख: रीजीजू जी बोले, "मनाने की भी एक लिमिट होती है! हमने कितनी बार कोशिश की, पर कांग्रेस को तो बस लड़ना है। वो बार-बार चुनाव हारने की वजह से इतने परेशान हैं कि अब संसद में अपनी भड़ास निकाल रहे हैं!"
- नुकसान किसका? सरकार का कहना है कि इस ज़िद की वजह से देश के विकास के ज़रूरी काम और बजट पर चर्चा नहीं हो पा रही है, और इसमें घाटा तो आम जनता का ही है ना!
विपक्ष में भी सब ठीक नहीं है!
साक्षात्कार में एक और मज़ेदार बात सामने आई—विपक्ष के अंदर की खटपट! रीजीजू बोले कि कांग्रेस के 'इंडिया' गठबंधन में भी सब एकमत नहीं हैं।
- छोटी पार्टियों का दर्द: मंत्री जी के मुताबिक, टीएमसी और समाजवादी पार्टी जैसे दलों के कई सांसद अंदरखाने कहते हैं कि वो तो चाहते हैं कि संसद चले। जब हंगामा होता है, तो बेचारी छोटी पार्टियों के सांसदों का बोलने का मौका छिन जाता है और उनके राज्यों के मुद्दे धरे के धरे रह जाते हैं।
- राहुल से नाराज़गी: रीजीजू बोले, "ये छोटी पार्टियाँ राहुल गांधी के मनमाने फैसलों से परेशान हैं। उन्हें लगता है कि कांग्रेस अपनी राजनीति के चक्कर में उनका हक मार रही है।" तभी तो कई दलों ने स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव पर साइन ही नहीं किए!
स्पीकर का मामला: अब अविश्वास प्रस्ताव की बारी!
संसद में ये पहली बार जैसा ही है कि विपक्ष ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ला दिया है। उनका कहना है कि स्पीकर साहब भेदभाव कर रहे हैं और विपक्ष को बोलने नहीं दे रहे।
- स्पीकर साहब का फैसला: प्रस्ताव आते ही ओम बिरला जी ने एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने कहा कि जब तक उनके खिलाफ इस मामले का फैसला नहीं हो जाता, वो खुद सदन की कुर्सी पर नहीं बैठेंगे। ये उनकी महानता ही है कि वो संसदीय परंपरा का मान रख रहे हैं।
- निलंबन का तड़का: आपको याद ही होगा कि पिछले दिनों सदन में जो पेपर स्प्रे और हंगामा हुआ था, उसके बाद विपक्ष के 8 सांसदों को पूरे सत्र के लिए बाहर कर दिया गया था। इस बात ने आग में घी डालने का काम किया!
आखिर ये पूरा झगड़ा शुरू कहाँ से हुआ?
इस पूरी लड़ाई के पीछे है पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की एक किताब की कुछ बातें, जो अभी छपी भी नहीं हैं। राहुल गांधी इसी के दम पर सरकार को सीमा सुरक्षा और अग्निपथ योजना पर घेरना चाहते थे। पर स्पीकर साहब ने टोक दिया कि जो चीज़ अभी आधिकारिक नहीं है, उस पर सदन में बात नहीं हो सकती। बस, इसी "टोका-टोकी" ने एक बड़ी लड़ाई का रूप ले लिया!
बजट सत्र 2026 की कुछ ख़ास तारीखें:
- 28 जनवरी: राष्ट्रपति जी के भाषण के साथ शुरुआत।
- 1 फरवरी: बजट पेश किया गया।
- 12 फरवरी: हंगामे के बीच पहला भाग खत्म।
- 9 मार्च: अब दूसरा भाग शुरू होगा, देखते हैं क्या होता है!
- 2 अप्रैल: सत्र खत्म होने की तारीख।
अंत में मेरी बात
किरेन रीजीजू की ये बातें दिखाती हैं कि सरकार और कांग्रेस के बीच अब बातचीत लगभग खत्म ही हो गई है। 'NGO' वाली बात बोलकर उन्होंने सीधे राहुल गांधी की टीम पर हमला बोला है। अब ये तो सिर्फ राजनीति नहीं, बल्कि हमारी संसद कैसे चलेगी, इस पर भी बड़ा सवाल है। अगर 9 मार्च के बाद भी यही ड्रामा चलता रहा, तो बजट का क्या होगा? अब देखना ये है कि विपक्ष मिलकर चलता है या अपनी-अपनी राह पकड़ता है।