मानवाधिकार एवं प्रशासनिक उत्तरदायित्व का विश्लेषण
अंतरराष्ट्रीय डेस्क | बांग्लादेश में अवामी लीग से संबद्ध वरिष्ठ नेताओं की न्यायिक हिरासत में मृत्यु की निरंतरता वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और मानवाधिकार चर्चा का एक अत्यंत गंभीर विषय बनी हुई है। अगस्त 2024 में हुए व्यापक राजनीतिक सत्ता परिवर्तन के पश्चात, देश एक संक्रमणकालीन दौर से गुजर रहा है, जहाँ विधिक शासन की स्थापना और प्रतिशोधात्मक राजनीति के बीच एक सूक्ष्म संतुलन बनाने की आवश्यकता है। इसी पृष्ठभूमि में, नवीनतम प्रकरण गैबांधा जिला कारागार से प्रकाश में आया है, जहाँ पलाशबाड़ी क्षेत्र के अवामी लीग अध्यक्ष, 60 वर्षीय शमीकुल इस्लाम के स्वास्थ्य में आकस्मिक गिरावट के उपरांत चिकित्सालय ले जाते समय उनकी मृत्यु हो गई। यह घटना देश की जेल प्रणालियों के भीतर कैदियों की सुरक्षा और उनके मौलिक स्वास्थ्य अधिकारों पर पुनः प्रश्नचिह्न अंकित करती है।
प्रशासनिक एवं जेल प्रबंधन का आधिकारिक स्पष्टीकरण और विधिक स्थिति
गैबांधा कारागार के प्रमुख एमडी अतिकुर रहमान द्वारा प्रदत्त आधिकारिक सूचना के अनुसार, शमीकुल इस्लाम की स्थिति अचानक गंभीर हो गई थी, जिसके पश्चात उन्हें प्राथमिक उपचार प्रदान कर तत्काल रंगपुर मेडिकल कॉलेज के लिए संदर्भित किया गया। कारागार प्रशासन का दावा है कि उन्हें समय रहते चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने के हर संभव प्रयास किए गए थे, किंतु अस्पताल पहुँचने से पूर्व ही उन्होंने दम तोड़ दिया। 'द डेली स्टार' की विस्तृत रिपोर्ट इंगित करती है कि अगस्त 2024 में अवामी लीग शासन के पतन के पश्चात, राजनीतिक अशांति के दौरान उन पर विभिन्न आपराधिक अभियोग पंजीकृत किए गए थे। उल्लेखनीय है कि उन्हें दिसंबर 2024 में ढाका से गिरफ्तार किया गया था और हालांकि उन्हें एक मामले में जमानत मिल गई थी, किंतु अन्य लंबित अभियोगों के कारण वे निरंतर न्यायिक अभिरक्षा में ही थे। यह स्थिति विचाराधीन कैदियों के लंबे समय तक कारावास और उनके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले मनोवैज्ञानिक व शारीरिक प्रभाव को उजागर करती है।
अंतरिम प्रशासन की वैश्विक छवि और संक्रमणकालीन न्याय की चुनौतियां
हिरासत में मृत्यु के इन निरंतर प्रकरणों ने मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाले अंतरिम प्रशासन की वैश्विक साख और विधिक निष्पक्षता के दावों को कड़ी परीक्षा के घेरे में ला दिया है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय, विशेषकर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद, इन घटनाओं को बड़ी सूक्ष्मता से देख रहा है। ज्ञात हो कि इसी माह के प्रारंभ में, 7 फरवरी को, पूर्व मंत्री और वरिष्ठ राजनेता रमेश चंद्र सेन की भी दिनाजपुर जिला जेल में अभिरक्षा के दौरान संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु हुई थी। रमेश चंद्र सेन जैसे उच्च कद के नेताओं की मृत्यु प्रशासन की 'ड्यूटी ऑफ केयर' (देखभाल के कर्तव्य) पर गंभीर सवाल उठाती है। इन घटनाओं के संचयी प्रभाव से वर्तमान शासन पर न केवल घरेलू स्तर पर बल्कि वैश्विक मंचों पर भी मानवाधिकारों के संरक्षण हेतु दबाव निरंतर बढ़ता जा रहा है, जिससे संक्रमणकालीन न्याय (Transitional Justice) की प्रक्रिया बाधित होने की आशंका है।
राजनीतिक प्रतिक्रिया: मानवाधिकारों का कथित उल्लंघन और अंतरराष्ट्रीय निहितार्थ
अवामी लीग के आधिकारिक प्रवक्ताओं ने कारागार प्रणालियों के इस प्रकार के उपयोग को राजनीतिक विरोधियों के क्रमिक दमन का एक सुव्यवस्थित साधन करार दिया है। संगठन का यह तर्क है कि वृद्ध, रुग्ण और विशेष चिकित्सा सहायता की आवश्यकता वाले नेताओं को जानबूझकर पर्याप्त उपचार से वंचित रखा जा रहा है, जो कि 'अंतरराष्ट्रीय नागरिक और राजनीतिक अधिकार प्रतिज्ञापत्र' (ICCPR) के अनुच्छेदों का खुला उल्लंघन है। राजनीतिक दल ने यह भी स्पष्ट किया है कि वे इन प्रकरणों के विस्तृत साक्ष्यों को अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं जैसे 'एमनेस्टी इंटरनेशनल' और 'ह्यूमन राइट्स वॉच' के समक्ष प्रस्तुत करेंगे। उनका आरोप है कि न्यायिक अभिरक्षा में होने वाली ये मृत्यु प्राकृतिक नहीं, बल्कि प्रशासनिक उपेक्षा और राजनीतिक पूर्वाग्रह का परिणाम हैं, जिसकी निष्पक्ष अंतरराष्ट्रीय जांच अनिवार्य है।
संपादकीय विश्लेषण
न्यायिक अभिरक्षा में निरंतर होती मृत्यु की ये घटनाएं किसी भी सभ्य समाज की विधिक और नैतिक संरचना के लिए गंभीर खतरे का संकेत हैं। लोकतंत्र की पुनस्थापना का मार्ग प्रतिशोध की राजनीति से होकर नहीं गुजर सकता। यदि इन प्रकरणों में प्रशासनिक शिथिलता या चिकित्सकीय उपेक्षा के प्रमाण पुष्ट होते हैं, तो यह न केवल विधिक शासन (Rule of Law) की मर्यादा को खंडित करेगा, बल्कि भविष्य में राजनीतिक सुलह की संभावनाओं को भी क्षीण कर देगा। वर्तमान परिस्थितियों में, अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों की उपस्थिति में एक उच्च-स्तरीय, पारदर्शी और निष्पक्ष न्यायिक जांच की नितांत आवश्यकता है, ताकि प्रशासनिक जवाबदेही तय की जा सके और मानवाधिकारों की रक्षा की वैश्विक प्रतिबद्धता को दोहराया जा सके।
