उज्जैन में अनूठी परंपरा का आगाज—देश में मनाते हैं शिवरात्रि, पर महाकाल के दरबार में मनेगी 'शिव नवरात्रि'; 10 दिनों तक 9 रूपों में दर्शन देंगे बाबा
उज्जैन/नई दिल्ली, दिनांक: 2 फरवरी 2026 — भारतवर्ष में त्योहारों की अपनी एक अलग ही छटा होती है, लेकिन जब बात कालों के काल महाकाल की नगरी उज्जैन (Ujjain) की हो, तो वहां परंपराएं और भी अद्भुत हो जाती हैं। हिंदू धर्म में आमतौर पर साल में चार नवरात्रि (चैत्र, आश्विन और दो गुप्त नवरात्रि) मनाने की परंपरा है, जो मुख्य रूप से शक्ति की देवी मां दुर्गा को समर्पित होती हैं। लेकिन 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक, श्री महाकालेश्वर मंदिर (Mahakaleshwar Jyotirlinga) में एक ऐसी दुर्लभ परंपरा निभाई जाती है जो इसे देश के बाकी सभी मंदिरों से अलग बनाती है। यहां महाशिवरात्रि (Maha Shivaratri) केवल एक रात का पर्व नहीं, बल्कि पूरे नौ दिनों का उत्सव होता है, जिसे 'शिव नवरात्रि' (Shiv Navratri) के नाम से जाना जाता है।
इस वर्ष यह दिव्य महोत्सव 6 फरवरी से शुरू होकर 15 फरवरी तक चलेगा। विशेष बात यह है कि तिथियों के संयोग के कारण इस बार बाबा महाकाल का यह विवाह उत्सव नौ नहीं, बल्कि पूरे दस दिनों तक मनाया जाएगा। इन दस दिनों में भगवान महाकाल दूल्हे के रूप में सजेंगे और अपने भक्तों को अलग-अलग नौ दिव्य स्वरूपों में दर्शन देंगे। उज्जैन का कोना-कोना इस समय 'जय महाकाल' के उद्घोष से गूंजने को तैयार है।
शिव नवरात्रि का शुभारंभ 6 फरवरी को एक विशेष अनुष्ठान के साथ होगा। परंपरा के अनुसार, उत्सव के पहले दिन मंदिर परिसर में कोटितीर्थ कुंड के पास स्थित श्री कोटेश्वर महादेव का पूजन किया जाएगा। मुख्य पुजारी पंडित घनश्याम शर्मा के मार्गदर्शन में 11 वैदिक ब्राह्मण देश और प्रदेश की सुख-समृद्धि की कामना करते हुए गर्भगृह में विशेष रूद्राभिषेक संपन्न करेंगे। यह दिन भगवान की आराधना और तपस्या की शुरुआत का प्रतीक होगा। इसके अगले दिन, यानी 7 फरवरी को, भगवान महाकाल को सोला (रेशमी वस्त्र) और दुपट्टा धारण कराया जाएगा। इस दिन बाबा का स्वरूप सौम्य और शांत होगा, जिसे 'नवीन वस्त्र श्रृंगार' कहा जाता है। भक्तजन इस दिन से भगवान के विवाह उत्सव की तैयारियों में शामिल हो जाएंगे।
उत्सव के तीसरे दिन, 8 फरवरी को भगवान का श्रृंगार और भी भव्य हो जाएगा। इस दिन बाबा महाकाल 'शेषनाग' (Sheshnag) स्वरूप धारण करेंगे। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान विष्णु के साथ-साथ शिव जी का भी नागों से गहरा संबंध है। इस अवसर पर मंदिर में एकादश-एकादशनी रूद्रपाठ का अभिषेक होगा और शाम को भगवान को नए वस्त्र व आभूषण पहनाए जाएंगे। चौथे दिन, 9 फरवरी को 'घटाटोप श्रृंगार' किया जाएगा। इस रूप में भगवान को कटरा, मेखला, दुपट्टा, मुकुट, मुण्डमाल और फलों की माला से सजाया जाता है। घटाटोप स्वरूप भगवान के विराट और सर्वव्यापी होने का प्रतीक माना जाता है, जो भक्तों को भयमुक्त करता है।
जैसे-जैसे दिन आगे बढ़ेंगे, श्रृंगार की भव्यता और बढ़ती जाएगी। 10 फरवरी को पांचवें दिन भगवान महाकाल 'छबीना' स्वरूप धारण करेंगे। यह रूप उनकी सुंदरता और आकर्षण का प्रतीक है। प्रातः काल नैवैद्य कक्ष में श्री चंद्रमौलेश्वर का पूजन होगा और उसके बाद बाबा को नवीन पीले वस्त्र पहनाए जाएंगे। 11 फरवरी, यानी छठे दिन, बाबा का 'होलकर श्रृंगार' (Holkar Shringar) किया जाएगा। यह श्रृंगार ऐतिहासिक महत्व रखता है क्योंकि यह होल्कर राजवंश की परंपराओं से जुड़ा है। इस दिन भी सुबह श्री चंद्रमौलेश्वर पूजन के बाद शाम को भगवान को शाही अंदाज में मुकुट और मुण्डमाल के साथ सजाया जाएगा।
उत्सव के अंतिम चरणों में, 12 फरवरी को सातवें दिन 'मनमहेश' श्रृंगार होगा। इसमें बाबा महाकाल अपने भक्तों को उमा-महेश के संयुक्त स्वरूप की झलक देंगे। कत्थई रंग के वस्त्रों में सजे बाबा का यह रूप भक्तों के मन को मोहने वाला होता है। 13 फरवरी को आठवें दिन भगवान 'उमा-महेश' (Uma-Mahesh) श्रृंगार में दर्शन देंगे। इस दिन उन्हें लाल रंग के वस्त्र पहनाए जाएंगे, जो शक्ति और प्रेम का प्रतीक है। शिव और शक्ति के इस मिलन को देखना भक्तों के लिए परम सौभाग्य की बात मानी जाती है। अंत में, महाशिवरात्रि के दिन बाबा का 'सेहरा' सजेगा और वे दूल्हे के रूप में माता पार्वती को ब्याहने निकलेंगे।
हमारी राय (The Trending People Analysis)
उज्जैन की शिव नवरात्रि केवल एक कर्मकांड नहीं, बल्कि शिव और शक्ति के मिलन का एक सांस्कृतिक दस्तावेज है। जहां पूरी दुनिया एक रात के लिए शिव की पूजा करती है, वहां उज्जैनवासी अपने राजा (महाकाल) का विवाह दस दिनों तक मनाते हैं। यह परंपरा बताती है कि ईश्वर के साथ भक्त का रिश्ता कितना आत्मीय हो सकता है।
The Trending People का विश्लेषण है कि 'शिव नवरात्रि' के दौरान महाकाल के अलग-अलग रूप जीवन के विभिन्न पहलुओं को दर्शाते हैं—कभी वे शेषनाग धारण कर रक्षक बनते हैं, तो कभी मनमहेश बनकर मन को शांति देते हैं। 6 फरवरी से शुरू होने वाले इस उत्सव में शामिल होना किसी आध्यात्मिक यात्रा से कम नहीं है। प्रशासन द्वारा 10 दिनों के लिए की गई विशेष व्यवस्था और दर्शन की सुगमता श्रद्धालुओं के अनुभव को और दिव्य बनाएगी।

