बीआर चोपड़ा की 'महाभारत': न CGI था न VFX, फिर कैसे हवा में टकराते थे तीर और घूमता था सुदर्शन चक्र?
1988 में जब बीआर चोपड़ा की 'महाभारत' टीवी पर शुरू हुई, तो सड़कें सूनी हो जाती थीं। लोग नहा-धोकर, अगरबत्ती जलाकर टीवी के सामने बैठते थे। आज के दौर में हमारे पास 'बाहुबली' जैसे VFX और 'अवतार' जैसी CGI तकनीक है, लेकिन उस ज़माने में कुछ नहीं था। फिर भी, जब अर्जुन और कर्ण के तीर हवा में टकराते थे, तो वह बिल्कुल असली लगता था।
आइए जानते हैं बिना आधुनिक तकनीक के कैसे शूट किए गए थे 'महाभारत' के वो यादगार सीन।
1. हवा में कैसे उड़ते और गायब होते थे तीर?
बचपन में हम सभी ने सोचा था कि ये मंत्रों की शक्ति है, लेकिन पर्दे के पीछे की कहानी 'नायलॉन के धागों' में छिपी थी।
- नायलॉन का तार: पूरे युद्ध के मैदान में एक छोर से दूसरे छोर तक बहुत ही पतले और ना दिखने वाले नायलॉन के तार बांधे जाते थे।
- धक्का देने की तकनीक: तीर के पीछे एक छोटा गोल लूप (छल्ला) होता था। क्रू के दो सदस्य दो अलग-अलग छोरों पर खड़े होते थे और गिनती (1, 2, 3) के साथ तीर को तार पर धक्का देते थे।
- पटाखों का धमाका: तीर की नोक पर एक छोटा सा बैटरी वाला पटाखा लगाया जाता था। जैसे ही दोनों तीर बीच में टकराते, वे धमाका करते थे।
- ऑप्टिकल मास्किंग: पोस्ट-प्रोडक्शन के दौरान 'ऑप्टिकल मास्किंग' तकनीक का इस्तेमाल कर उसमें चमक और आग जोड़ी जाती थी ताकि तीर गायब होता दिखे।
2. श्रीकृष्ण की उंगली पर कैसे घूमता था सुदर्शन चक्र?
नीतीश भारद्वाज की मुस्कान और उनकी उंगली पर घूमता 'सुदर्शन चक्र' आज भी लोगों के जेहन में ताजा है। उस समय इसे ऐसे बनाया गया था:
- मेटल का चक्र: असल में वह एक धातु (मेटल) का चक्र था।
- ब्लू स्क्रीन का जादू: उस चक्र को एक नीले पर्दे (Blue Screen) के सामने बहुत तेज़ रफ़्तार पर घुमाया जाता था और उसकी शूटिंग अलग से की जाती थी।
- लेयरिंग: बाद में एडिटिंग की मेज पर कृष्ण के हाथ के पास उस चक्र वाले शॉट को 'लेयर' कर दिया जाता था, जिससे लगता था कि चक्र उंगली पर ही घूम रहा है।
3. कुरुक्षेत्र का मैदान: जयपुर का वह तपता रेगिस्तान
बीआर चोपड़ा मुंबई की 'फिल्म सिटी' में युद्ध शूट करना चाहते थे, लेकिन एक बड़ी समस्या थी—बिजली के खंभे और तार। द्वापर युग में बिजली के खंभे कैसे दिख सकते थे?
लोकेशन की खोज: काफी तलाश के बाद उन्हें जयपुर से 40 किलोमीटर दूर एक बंजर, रेगिस्तानी जमीन मिली।
जून की गर्मी: महाभारत के भीषण युद्ध के सीन असल में जून की चिलचिलाती धूप और गर्मी में शूट हुए थे, जिसने कलाकारों की मेहनत को और चुनौतीपूर्ण बना दिया था।
4. बिना डिजिटल क्लोनिंग के हजारों की भीड़
आजकल एक ही इंसान को कॉपी-पेस्ट करके हजारों की सेना बना दी जाती है (Digital Cloning), लेकिन तब ऐसा नहीं था।
गांववालों का प्यार: 'महाभारत' की लोकप्रियता इतनी थी कि जब गांव के लोगों को पता चला कि शूटिंग हो रही है, तो वे उमड़ पड़े।
फ्री में बने सैनिक: आसपास के गांवों के हजारों लोग बिना किसी फीस के सिर्फ 'महाभारत' का हिस्सा बनने के लिए घंटों धूप में खड़े होने को तैयार हो गए। उन्हीं लोगों ने पांडवों और कौरवों की सेना का किरदार निभाया।
तब और अब में फर्क
फीचर | बीआर चोपड़ा की महाभारत (1988) | आधुनिक पौराणिक शो (2020+) |
|---|---|---|
तकनीक | ऑप्टिकल मास्किंग, नायलॉन तार | CGI, VFX, ग्रीन स्क्रीन |
लोकेशन | असली रेगिस्तान और मैदान | इनडोर स्टूडियो और वर्चुअल सेट्स |
भीड़ | असली हजारों लोग (Extras) | डिजिटल क्लोनिंग (CGI) |
भाव | सादगी और मजबूत संवाद | भव्यता और चमक-धमक |
बीआर चोपड़ा की महाभारत हमें सिखाती है कि महान कृतियां केवल बजट या तकनीक से नहीं, बल्कि रचनात्मकता (Creativity) और अटूट लगन से बनती हैं।
निष्कर्ष: आधुनिक तकनीक के बिना भी 'महाभारत' का हर फ्रेम आज भी हमें रोमांचित कर देता है, जो इसकी असली सफलता है।
