उस्ताद अब्दुल हलीम जाफर खां: सितार की वह तीसरी धुरी, जिसने सुरों को नई दिशा दी
जब भारतीय शास्त्रीय संगीत में सितार की चर्चा होती है, तो अक्सर दो नाम सबसे पहले उभरते हैं—पंडित रवि शंकर और उस्ताद विलायत खां। लेकिन 20वीं सदी के संगीत आकाश में एक तीसरी, बेहद अनोखी और प्रयोगधर्मी धुरी भी थी—उस्ताद अब्दुल हलीम जाफर खां।
वे सिर्फ सितार बजाते नहीं थे, वे उसके भीतर छिपी संभावनाओं को टटोलते थे। उनके लिए सितार एक परंपरा नहीं, एक प्रयोगशाला था।
जावरा से मुंबई तक: विरासत और महत्वाकांक्षा
18 फरवरी 1927 को मध्य प्रदेश के जावरा में जन्मे हलीम जाफर खां को संगीत विरासत में मिला। उनके पिता, उस्ताद जाफर खां, इंदौर बीनकर घराने के दिग्गज थे। रुद्रवीणा की गंभीरता और ध्रुपद की साधना उनके बचपन का हिस्सा थी।
लेकिन जब परिवार मुंबई आया, तो माहौल बदल गया। यहां रेडियो, फिल्म स्टूडियो और संगीत की नई दुनिया थी। किशोरावस्था में ही वे ऑल इंडिया रेडियो पर पहचान बनाने लगे। 1940 के दशक में संगीत जगत में फुसफुसाहट शुरू हो गई—“एक लड़का आया है, जो सितार को रुद्रवीणा की तरह बजाता है।”
‘चपका अंग’ और पॉलीफोनी: सितार में नई क्रांति
यहीं से शुरू हुआ उनका सबसे बड़ा प्रयोग। पारंपरिक तौर पर सितार को मोनोफोनिक वाद्य माना जाता था—एक समय में एक ही सुर। लेकिन हलीम जाफर खां को यह सीमित लगा।
उन्होंने ‘चपका अंग’ और ‘पॉलीफोनी’ जैसी तकनीकों का विकास किया, जहां वे एक साथ दो अलग-अलग तारों को झंकृत करते थे। नतीजा—सुनने वाले को लगता, जैसे दो सितार एक साथ बज रहे हों।
यह पश्चिमी हारमोनिक सोच और भारतीय रागदारी का दुर्लभ संगम था। वे परंपरा को तोड़ते नहीं थे, बल्कि उसे भीतर से विस्तार देते थे।
सिनेमा से संवाद, दूरी नहीं
जहां कई शास्त्रीय कलाकार फिल्मों से दूरी बनाए रखते थे, हलीम जाफर खां का नजरिया अलग था। उनके लिए सुर की कोई सीमा नहीं थी।
1959 की फिल्म गूंज उठी शहनाई में उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की शहनाई के साथ जो सितार जुगलबंदी सुनाई देती है, वह हलीम जाफर खां की ही थी। शहनाई में सांस का निरंतर प्रवाह होता है, जबकि सितार की ध्वनि छेड़ते ही धीमी होने लगती है। यह मेल असंभव माना जाता था।
लेकिन उनकी ‘मींड’ ने सितार को गाने जैसा बना दिया। शहनाई और सितार का वह संवाद आज भी संगीत प्रेमियों के लिए एक मिसाल है।
इसी तरह फिल्म कोहिनूर का अमर गीत मधुबन में राधिका नाचे रे आज भी संगीत विद्यार्थियों के लिए चुनौती है। उस गीत में सितार की जटिलता और सौंदर्य उनके ही स्पर्श का परिणाम था।
जैज से मुलाकात: संगीत की वैश्विक भाषा
1958 में मशहूर अमेरिकी जैज पियानोवादक Dave Brubeck भारत आए। मुंबई के एक होटल में उनकी मुलाकात हलीम जाफर खां से हुई। भाषा अलग, संस्कृति अलग—लेकिन संगीत साझा था।
यह मुलाकात दिखाती है कि हलीम जाफर खां का दृष्टिकोण सीमित नहीं था। वे भारतीय शास्त्रीयता के भीतर रहकर भी वैश्विक संवाद के लिए तैयार थे।
संत-कलाकार की सादगी
उन्हें पद्म श्री, पद्म भूषण और संगीत नाटक अकादमी जैसे प्रतिष्ठित सम्मान मिले। लेकिन वे कभी ग्लोबल स्टारडम के पीछे नहीं भागे। न प्रतिस्पर्धा, न प्रचार—सिर्फ साधना।
मुंबई के बांद्रा स्थित उनके घर में संगीत, शायरी और सादगी का माहौल रहता था। वे अपनी धुन में मगन रहने वाले संत-कलाकार थे।
आज जब हम भारतीय संगीत की विरासत को देखते हैं, तो यह याद रखना जरूरी है कि सितार की त्रयी में एक नाम और भी था—जो प्रयोग का पर्याय था, जिसने सुरों को एक साथ गवाया और रुलाया, और जिसने यह साबित किया कि परंपरा का सम्मान करते हुए भी उसे नई दिशा दी जा सकती है।
उस्ताद अब्दुल हलीम जाफर खां—सच में, सुरों के वैज्ञानिक और आत्मा के फकीर।
हमरी राय
उस्ताद अब्दुल हलीम जाफर खां की विरासत यह सिखाती है कि परंपरा का सम्मान करते हुए भी नवाचार संभव है। उन्होंने सितार को सीमाओं से बाहर निकालकर नई ध्वन्यात्मक संभावनाएं दीं।
आज जब भारतीय संगीत वैश्विक मंच पर नए रूपों में प्रस्तुत हो रहा है, तब उनके प्रयोग और दृष्टिकोण को फिर से समझने की आवश्यकता है। वे लोकप्रियता की दौड़ से दूर रहे, लेकिन उनकी कला समय के साथ और अधिक प्रासंगिक होती जा रही है।
TheTrendingPeople मानता है कि भारतीय संगीत इतिहास में उनका नाम एक ऐसे कलाकार के रूप में दर्ज है, जिसने चुपचाप लेकिन गहराई से संगीत की दिशा बदली।
