क्या यूजीसी ने लांघी अपनी 'लक्ष्मण रेखा'? संसद के अधिकार पर डाका या सुधार की कोशिश? सुप्रीम कोर्ट तय करेगा नए नियमों की तकदीर
नई दिल्ली, दिनांक: 27 जनवरी 2026 — देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा लागू किए गए नए नियमों ने एक गंभीर संवैधानिक बहस को जन्म दे दिया है। 15 जनवरी को अधिसूचित किए गए इन नियमों को लेकर देशभर में विरोध के स्वर तो उठ ही रहे हैं, लेकिन अब सवाल इसकी कानूनी वैधता (Legal Validity) पर भी खड़े हो गए हैं। बहुत से लोगों को लग रहा है कि यह संसद से पारित कोई कानून है, लेकिन हकीकत यह है कि इसे संसद में बिल के तौर पर पेश ही नहीं किया गया।
अब यह मामला जनहित याचिका (PIL) के जरिए सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर पहुंच गया है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यूजीसी ने अपनी संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन किया है और एक ऐसा 'समानांतर कानून' बना दिया है, जिसका अधिकार केवल संसद को है। आइए समझते हैं कि आखिर क्यों इन गाइडलाइंस को 'असंवैधानिक' (Unconstitutional) कहा जा रहा है और कानून की नजर में नियम और एक्ट में क्या अंतर होता है।
कानून और नियम में अंतर: संसद बनाम यूजीसी
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि देश में कानून कैसे बनता है।
कानून (Act): संसद से पारित कानून लोकसभा और राज्यसभा में लंबी बहस, वोटिंग और राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद बनता है। इसे संविधान के तहत विधायी शक्ति (Legislative Power) प्राप्त होती है और यह देश के हर नागरिक पर लागू होता है।
नियमन (Regulation): वहीं, यूजीसी गाइडलाइंस एक वैधानिक निकाय (Statutory Body) द्वारा बनाया गया नियम है। इसमें न संसद में बहस होती है, न वोटिंग। यह केवल मंत्रालय की सहमति से नोटिफिकेशन के जरिए लागू हो जाता है।
यूजीसी को 'यूजीसी एक्ट 1956' के तहत उच्च शिक्षा के मानकों को तय करने का अधिकार है, लेकिन क्या वह मौलिक अधिकारों की नई व्याख्या कर सकता है? यही विवाद की जड़ है। विशेषज्ञों का कहना है कि गाइडलाइंस हमेशा कानून से नीचे होती हैं, उसके बराबर नहीं।
दंड की शक्ति: यूजीसी की सीमाएं
संसद का कानून अपराध तय कर सकता है और सजा, जुर्माना या जेल का प्रावधान कर सकता है। लेकिन यूजीसी की गाइडलाइंस आपराधिक सजा नहीं दे सकतीं।
सीमित शक्ति: यूजीसी केवल संस्थागत कार्रवाई कर सकता है, जैसे कॉलेजों की मान्यता रद्द करना या अनुदान रोकना।
आरोप: आलोचकों का कहना है कि यूजीसी ने नए नियमों के जरिए एक दंडात्मक ढांचा (Penal Framework) खड़ा कर दिया है, जो 'कानून जैसा' दिखता है, लेकिन वास्तव में उसके पास ऐसा करने का अधिकार नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट में PIL: संविधान के उल्लंघन का आरोप
सुप्रीम कोर्ट में दायर पीआईएल में मुख्य रूप से तीन अनुच्छेदों के उल्लंघन का हवाला दिया गया है:
- अनुच्छेद 245-246 (विधायी शक्ति): याचिका में कहा गया है कि कानून बनाने का अधिकार केवल संसद या विधानसभाओं को है। यूजीसी ने नए अधिकार और परिभाषाएं तय करके विधायी शक्ति का अतिक्रमण (Encroachment) किया है। यूजीसी केवल अधीनस्थ नियमन (Subordinate Legislation) कर सकता है, मौलिक अधिकारों की नई व्याख्या नहीं।
- अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार): आरोप है कि ये नियम समानता के सिद्धांत के खिलाफ हैं। भेदभाव का कानून जाति-निरपेक्ष (Caste Neutral) होना चाहिए, न कि जाति-विशेष। केवल कुछ वर्गों को संरक्षित कैटेगरी बनाकर और दूसरों को इससे बाहर रखकर आर्टिकल 14 का उल्लंघन किया गया है।
- अनुच्छेद 15 (आरक्षण): संविधान का अनुच्छेद 15(4) और 15(5) राज्य को सकारात्मक कार्रवाई (Affirmative Action) की शक्ति देता है, न कि दंडात्मक नियम बनाने की। आरोप है कि यूजीसी ने इन्हें गलत तरीके से विस्तारित कर दिया है।
क्या करेगा सुप्रीम कोर्ट?
सुप्रीम कोर्ट के पास संसद के कानून को रद्द करने की शक्ति है, लेकिन यूजीसी गाइडलाइंस के मामले में कोर्ट का हस्तक्षेप और भी त्वरित हो सकता है।
- स्टे का विकल्प: अगर कोर्ट को जरा भी लगेगा कि ये गाइडलाइंस एकतरफा, मनमानीपूर्ण या संवैधानिक ढांचे के विपरीत हैं, तो वह तुरंत इन पर रोक (Stay) लगा सकता है या इन्हें रद्द (Quash) कर सकता है।
- मांग: याचिका में मांग की गई है कि नए नियमन को अस्थायी रूप से स्थगित किया जाए और यह घोषित किया जाए कि यूजीसी ने अपनी वैधानिक सीमा लांघी है।
हमारी राय (The Trending People Analysis)
यूजीसी का उद्देश्य जातिगत भेदभाव को रोकना है, जो स्वागत योग्य है। लेकिन लोकतंत्र में 'साध्य' (End) के साथ-साथ 'साधन' (Means) भी पवित्र होने चाहिए। अगर एक रेगुलेटरी बॉडी संसद का काम करने लगेगी, तो यह खतरनाक नजीर पेश करेगी।
The Trending People का विश्लेषण है कि इतना संवेदनशील विषय, जो मौलिक अधिकारों से जुड़ा है, उसे संसद में बहस और विधेयक के जरिए आना चाहिए था, न कि एक नोटिफिकेशन से। सुप्रीम कोर्ट का फैसला यह तय करेगा कि भारत में 'रेगुलेटरी स्टेट' की सीमा क्या होगी। फिलहाल, गेंद न्यायपालिका के पाले में है और लाखों छात्रों की नजरें कोर्ट पर टिकी हैं।