यूजीसी के नए फरमान पर मचा घमासान—भेदभाव रोकने के नियमों में हुई वो 3 'बड़ी गलतियां', जिसने सवर्ण छात्रों को सड़क पर उतरने को कर दिया मजबूर
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नई दिल्ली, दिनांक: 27 जनवरी 2026 — देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकने के नेक इरादे से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने हाल ही में जो कदम उठाया है, वह अब एक बड़े विवाद का रूप ले चुका है। यूजीसी द्वारा लागू किए गए 'प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस रेगुलेशंस, 2026' (Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026) के खिलाफ देश भर में विरोध के स्वर फूट पड़े हैं। जहां एक तरफ आयोग का तर्क है कि ये नियम सुप्रीम कोर्ट के आदेश और बढ़ती शिकायतों के मद्देनजर जरूरी थे, वहीं दूसरी तरफ सवर्ण समाज के युवाओं और कई शिक्षाविदों का मानना है कि जल्दबाजी में बनाए गए इन नियमों में कुछ ऐसी बुनियादी खामियां हैं जो भेदभाव को मिटाने के बजाय 'उल्टा भेदभाव' (Reverse Discrimination) पैदा करेंगी।
सोशल मीडिया से लेकर यूनिवर्सिटी कैंपस तक, इस मुद्दे पर बहस छिड़ गई है और मामला सुप्रीम कोर्ट की दहलीज तक पहुंच चुका है। विरोध करने वालों का आरोप है कि यूजीसी ने नियम बनाते समय संतुलन खो दिया है और तीन ऐसी बड़ी गलतियां की हैं, जो भविष्य में कैंपसों को पढ़ाई के बजाय मुकदमों का अखाड़ा बना सकती हैं। आइए, गहराई से समझते हैं कि वे तीन बिंदु कौन से हैं, जिन्होंने इस बवंडर को जन्म दिया है।
सबसे पहली और बड़ी गलती 'जातीय भेदभाव' की परिभाषा को लेकर बताई जा रही है। नए नियमों में भेदभाव की परिभाषा का दायरा इतना विस्तृत और व्यापक कर दिया गया है कि इसका दुरुपयोग बेहद आसान हो गया है। ड्राफ्ट नियमों में जहां परिभाषा स्पष्ट और सीमित थी, वहीं फाइनल रेगुलेशन में कहा गया है कि जाति, धर्म, नस्ल, लिंग, जन्म स्थान या विकलांगता के आधार पर कोई भी अनुचित या पक्षपाती व्यवहार, जो पढ़ाई में बराबरी में बाधा बने या मानव गरिमा के खिलाफ हो, उसे जातिगत भेदभाव माना जाएगा। आलोचकों का तर्क है कि 'अनुचित व्यवहार' या 'मानव गरिमा' जैसे शब्द बेहद व्यक्तिपरक (Subjective) हैं। अब क्लासरूम में हुई किसी छोटी-मोटी बहस, पढ़ाई को लेकर की गई टिप्पणी या सामान्य असहमति को भी भेदभाव का रंग देकर शिकायत दर्ज कराई जा सकती है। इससे शिक्षकों और सवर्ण छात्रों के सिर पर हर वक्त शिकायत की तलवार लटकी रहेगी, जो स्वस्थ शैक्षणिक माहौल के लिए खतरनाक है।
दूसरी बड़ी गलती, जिस पर सबसे ज्यादा हंगामा है, वह है परिभाषा में ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) को शामिल करना। पहले के ड्राफ्ट में विशेष रूप से एससी/एसटी छात्रों के खिलाफ भेदभाव को रोकने की बात थी, जो ऐतिहासिक रूप से शोषण का शिकार रहे हैं। लेकिन फाइनल नियमों में ओबीसी को भी इस दायरे में लाया गया है। अब ओबीसी छात्रों के खिलाफ किसी भी कथित अनुचित व्यवहार को जाति-आधारित भेदभाव माना जाएगा। विरोध करने वालों का कहना है कि ओबीसी समुदाय पहले से ही सशक्त है और आरक्षण का लाभ ले रहा है। उन्हें इस विशेष सुरक्षा कवच (Protection Shield) की आवश्यकता नहीं थी। सवर्ण छात्रों का तर्क है कि यह नियम एकतरफा लग रहे हैं। अगर ओबीसी छात्र किसी सवर्ण के साथ दुर्व्यवहार करता है, तो उसके लिए सामान्य नियम हैं, लेकिन अगर सवर्ण छात्र से कोई गलती होती है, तो उसे सीधे 'जातिगत भेदभाव' के गंभीर अपराध के तहत देखा जाएगा। यह असंतुलन छात्रों के बीच वैमनस्य बढ़ा रहा है।
तीसरी और शायद सबसे खतरनाक गलती 'झूठी शिकायत' (False Complaint) पर सजा के प्रावधान को हटाना है। जब इस कानून का ड्राफ्ट तैयार हुआ था, तो उसमें एक बहुत महत्वपूर्ण और संतुलित प्रावधान था। उसके अनुसार, यदि कोई छात्र जानबूझकर या दुर्भावना से किसी शिक्षक या साथी छात्र के खिलाफ झूठी शिकायत करता है, तो उसे आर्थिक दंड दिया जा सकता था या कॉलेज से सस्पेंड किया जा सकता था। यह प्रावधान 'चेक एंड बैलेंस' के लिए जरूरी था। लेकिन फाइनल नियमों से इसे पूरी तरह हटा दिया गया है। अब अगर कोई छात्र रंजिश निकालने के लिए झूठी शिकायत भी करता है और जांच में वह झूठी पाई जाती है, तो भी शिकायतकर्ता पर कोई कार्रवाई नहीं होगी। विरोधियों का कहना है कि यह 'ब्लैंक चेक' देने जैसा है। इससे शिक्षकों और छात्रों को ब्लैकमेल करने या फंसाने के मामलों में बाढ़ आ सकती है, क्योंकि शिकायतकर्ता को कोई डर नहीं होगा।
यूजीसी ने इन नियमों को बनाने के पीछे सुप्रीम कोर्ट के आदेश और आंकड़ों का हवाला दिया है। आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, 2017-18 में भेदभाव की 173 शिकायतें थीं, जो 2023-24 में बढ़कर 378 हो गईं, यानी लगभग 118 प्रतिशत की वृद्धि। ऐसे में सख्त नियमों की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता। नए नियमों के तहत हर कॉलेज में 24x7 हेल्पलाइन और 'इक्वल अपॉर्चुनिटी सेंटर' (Equal Opportunity Centre) बनाना अनिवार्य कर दिया गया है। लेकिन सवाल मंशा पर नहीं, बल्कि प्रक्रिया (Process) पर है। बिना सुरक्षा उपायों के इतना सख्त कानून लाना कैंपस के माहौल को विषाक्त बना सकता है।
हमारी राय (The Trending People Analysis)
किसी भी सभ्य समाज में भेदभाव के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए और शिक्षण संस्थान तो समानता के मंदिर होते हैं। यूजीसी का उद्देश्य सराहनीय है, लेकिन जिस तरह से इन नियमों को लागू किया गया है, वह 'इलाज' से ज्यादा 'बीमारी' पैदा करता दिख रहा है।
The Trending People का विश्लेषण है कि 'झूठी शिकायत' पर सजा का प्रावधान हटाना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के खिलाफ है। कानून अंधा होता है, लेकिन उसे इतना भी अंधा नहीं होना चाहिए कि वह सच और झूठ का फर्क न देख सके। ओबीसी को शामिल करना और परिभाषा को अस्पष्ट रखना इसे हथियार (Weaponization) बनाने का मौका दे सकता है। सरकार और यूजीसी को चाहिए कि वे विरोध के इन स्वरों को सुनें और नियमों में जरूरी संशोधन करें। भेदभाव रुकना चाहिए, लेकिन डर के माहौल में शिक्षा नहीं पनप सकती। एक संतुलित दृष्टिकोण ही कैंपस में असली सौहार्द ला सकता है।
