'तुम पहली महिला हो जिससे मैंने प्यार किया...'—लौह पुरुष नेताजी का वो 'कोमल' पहलू, जब एक टाइपिस्ट बन गई उनकी अर्धांगिनी; पढ़ें वियना से जुड़ी वो अमर प्रेम कथा
नई दिल्ली/वियना, दिनांक: 23 जनवरी 2026 — भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में जब भी 'आजाद हिंद फौज' की हुंकार और "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा" का नारा गूंजता है, तो जेहन में एक सख्त, अनुशासित और फौलादी इरादों वाले महानायक की छवि उभरती है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस का व्यक्तित्व क्रांति की आग से तपकर बना था, लेकिन उस सख्त वर्दी और गोल चश्मे के पीछे एक बेहद भावुक और प्रेमी हृदय भी धड़कता था, जिससे दुनिया लंबे समय तक अनजान रही। नेताजी का जीवन जितना रहस्यमयी और रोमांचक रहा, उनकी प्रेम कहानी भी उतनी ही दिलचस्प, त्यागपूर्ण और मर्मस्पर्शी थी। यह कहानी सात समंदर पार ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना की गलियों से शुरू होती है, जहां एक टाइपिस्ट की नौकरी करने आईं एमिली शेंकल ने भारत के सबसे बड़े क्रांतिकारी का दिल जीत लिया था।
इस प्रेम कथा की परतें तब खुलीं जब नेताजी दुनिया से ओझल हो चुके थे। 1930 के दशक में शुरू हुई यह दास्तां केवल रोमांस की नहीं, बल्कि दो ऐसे व्यक्तियों के बीच के गहरे आत्मिक जुड़ाव की है, जिन्होंने अपने व्यक्तिगत सुखों को देश की आजादी के हवन कुंड में आहुति दे दी। आज हम आपको उसी अनकही और अद्भुत प्रेम कहानी से रूबरू कराने जा रहे हैं, जो युद्ध के साये में पनपी और इतिहास के पन्नों में अमर हो गई।
वियना का वह दौर और पहली मुलाकात
इस कहानी की पटकथा वर्ष 1934 में लिखी गई थी। ब्रिटिश हुकूमत ने भारत में सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान सुभाष चंद्र बोस को जेल में डाल दिया था, जिससे उनका स्वास्थ्य बुरी तरह बिगड़ गया था। अंततः ब्रिटिश सरकार ने उन्हें रिहा तो किया, लेकिन देश से निर्वासित करते हुए यूरोप भेज दिया। डॉक्टरों की सलाह पर स्वास्थ्य लाभ के लिए सुभाष चंद्र बोस ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना पहुंचे। यह वह दौर था जब यूरोप में राजनीतिक उथल-पुथल मची हुई थी, लेकिन वियना अपनी शांत फिजाओं के लिए जाना जाता था।
सुभाष भले ही देश से दूर थे, लेकिन उनका मन भारत की आजादी के लिए ही धड़कता था। वे वियना से लगातार भारतीय साथियों और कांग्रेस के नेताओं को पत्र लिखते थे। वे एक ऐसी पुस्तक (द इंडियन स्ट्रगल) लिखने की योजना बना रहे थे, जिसके लिए उन्हें एक ऐसे सहायक की सख्त जरूरत थी जो अंग्रेजी भाषा में निपुण हो और उनके दस्तावेजों को टाइप कर सके। इसी तलाश के दौरान वियना में सुभाष के एक मित्र मिस्टर माथुर ने उनकी मुलाकात 23 वर्षीय एमिली शेंकल से करवाई। एमिली एक खूबसूरत और पढ़ी-लिखी ऑस्ट्रियन युवती थीं, जिन्हें अंग्रेजी और टाइपिंग में महारत हासिल थी। उन्हें नौकरी की जरूरत थी और सुभाष को एक भरोसेमंद टाइपिस्ट की। जून 1934 में एमिली ने नेताजी के लिए काम करना शुरू किया, और यहीं से इतिहास ने एक नया मोड़ लिया।
जब काम का रिश्ता 'दिल' के रिश्ते में बदल गया
शुरुआत में यह एक पूरी तरह से पेशेवर रिश्ता था। एमिली, सुभाष बाबू के अनुशासन और उनकी मेधा से बेहद प्रभावित थीं। वहीं, सुभाष को एमिली की कार्यकुशलता और समर्पण ने मोह लिया। काम के दौरान वे घंटों साथ बिताते, विचारों का आदान-प्रदान करते और धीरे-धीरे एक-दूसरे के व्यक्तित्व की गहराइयों को समझने लगे। सुभाष अपने कॉलेज के दिनों से ही एक ऐसे शख्सियत रहे थे, जिन पर महिलाएं जान छिड़कती थीं, लेकिन उन्होंने हमेशा खुद को ब्रह्मचर्य और देशसेवा के व्रत में बांधे रखा था। लेकिन एमिली की सादगी ने उस दीवार को गिरा दिया।
धीरे-धीरे दोनों के बीच आकर्षण बढ़ने लगा। उन्होंने यूरोप के कई खूबसूरत शहरों की यात्राएं साथ कीं। चेकोस्लोवाकिया और पोलैंड की वादियों में घूमते हुए दोनों ने महसूस किया कि वे एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं। यह प्यार एक तरफा नहीं था। एमिली भी उस भारतीय क्रांतिकारी के व्यक्तित्व में खो चुकी थीं, जिसका एकमात्र सपना अपने देश को आजाद कराना था।
पत्रों में छिपा प्यार: "तुम मेरे हृदय की रानी हो"
सुभाष चंद्र बोस और एमिली के प्रेम की गहराई का अंदाजा उन पत्रों से लगाया जा सकता है जो उन्होंने एक-दूसरे को लिखे थे। 1934 से लेकर 1945 तक लिखे गए सैकड़ों पत्रों में एक प्रेमी का वह रूप दिखता है जो दुनिया के लिए अकल्पनातीत था। जब सुभाष 1936 में भारत लौटे, तो वे एमिली की यादों को साथ ले आए। उन्होंने भारत से एमिली को एक बेहद भावुक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने अपने दिल की बात कही।
सुभाष ने लिखा, "तुम पहली महिला हो, जिससे मैंने प्यार किया। भगवान से यही चाहूंगा कि तुम मेरे जीवन की आखिरी स्त्री भी रहो।" उन्होंने एमिली को संबोधित करते हुए लिखा, "तुम मेरे हृदय की रानी (The Queen of My Heart) हो। यह तुम्हीं हो जिसकी वजह से मैं अपने देश से दूरी के दर्द को भूल पाया।" 1937 में लिखे एक अन्य पत्र में उनका अकेलापन साफ झलकता है, जब उन्होंने लिखा, "ऐसा एक भी दिन नहीं गुजरता, जब तुम्हारी याद नहीं आती। मैं बता नहीं सकता कि तुम्हारे अलावा मुझे और कोई याद नहीं आता... मैं इन दिनों कितना अकेला और उदास महसूस कर रहा हूं।" ये शब्द उस महान योद्धा के थे जो ब्रिटिश साम्राज्य से लोहा ले रहा था, लेकिन अंदर से एक कोमल प्रेमी भी था।
बादलों के बीच 'गुपचुप' शादी
प्रेम जब परवान चढ़ा तो उसे एक नाम देने की कसक भी उठी। 1937 के अंत में जब सुभाष दोबारा यूरोप गए, तो उन्होंने एमिली के साथ अपने रिश्ते को पवित्र बंधन में बांधने का फैसला किया। 26 दिसंबर 1937 को ऑस्ट्रिया के खूबसूरत हिल स्टेशन 'बडगस्टीन' में दोनों ने एक बेहद निजी और गुप्त समारोह में विवाह कर लिया। यह कोई पारंपरिक भारतीय शादी नहीं थी, न ही इसमें कोई पंडित था और न ही कोई धूमधाम। बस दो आत्माओं ने एक-दूसरे को पति-पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया।
इस शादी को गुप्त रखने का फैसला पूरी तरह से राजनीतिक था। उस समय सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस के अध्यक्ष बनने की दौड़ में थे और भारत के स्वतंत्रता संग्राम का एक प्रमुख चेहरा थे। उन्हें आशंका थी कि एक विदेशी महिला से विवाह की खबर उनके राजनीतिक करियर और आजादी की लड़ाई में बाधा बन सकती है। एमिली ने भी एक आदर्श भारतीय पत्नी की तरह इस त्याग को स्वीकार किया और अपनी पहचान को दुनिया से छिपाए रखा।
जवाहरलाल नेहरू और वो राज
इतिहासकारों और जीवनी लेखकों के अनुसार, सुभाष की इस सीक्रेट शादी की भनक बहुत कम लोगों को थी, लेकिन जवाहरलाल नेहरू संभवतः उन गिने-चुने लोगों में से थे जो इस रिश्ते से वाकिफ थे। उस दौर में सुभाष और नेहरू के बीच घनिष्ठता थी। जब फरवरी 1936 में कमला नेहरू का स्विट्जरलैंड में निधन हुआ, तो सुभाष वियना से वहां पहुंचने वाले पहले व्यक्ति थे और उन्होंने नेहरू को सांत्वना दी थी। माना जाता है कि नेहरू ने बाद में आजाद भारत में सुभाष की विधवा एमिली के लिए आर्थिक सहायता का प्रावधान भी किया था, जो उनके आपसी सम्मान को दर्शाता है।
आखिरी मुलाकात और एक नन्ही जान
सुभाष और एमिली का वैवाहिक जीवन बहुत संक्षिप्त रहा। कुल मिलाकर वे मुश्किल से तीन साल ही साथ रह पाए होंगे। 29 नवंबर 1942 को उनके प्रेम की निशानी के रूप में एक बेटी का जन्म हुआ, जिसका नाम 'अनिता' रखा गया। तब सुभाष ने पहली बार अपने बड़े भाई शरत चंद्र बोस को पत्र लिखकर अपनी शादी और बेटी की जानकारी दी थी, लेकिन दुर्भाग्यवश वह पत्र युद्ध के हालात के कारण कोलकाता पहुंच ही नहीं पाया।
बेटी के जन्म के कुछ ही हफ्तों बाद, जनवरी 1943 में, नियति ने उन्हें फिर अलग कर दिया। देश की आजादी का आह्वान उन्हें पुकार रहा था। सुभाष जर्मनी से पनडुब्बी के जरिए जापान के लिए रवाना हो गए। एमिली और नन्ही अनिता को अलविदा कहते हुए शायद उन्हें भी नहीं पता था कि यह उनकी आखिरी मुलाकात है। इसके बाद 1945 में ताइहोकु विमान दुर्घटना में उनके निधन की खबर ने सब कुछ खत्म कर दिया।
बोस परिवार से मिलन और एमिली का तप
सुभाष के जाने के बाद एमिली ने जिस धैर्य और स्वाभिमान के साथ जीवन जिया, वह मिसाल है। उन्होंने अकेले दम पर, एक मामूली टेलीफोन ऑपरेटर की नौकरी करके अपनी बेटी अनिता को पाला। 1948 में जब सुभाष के भाई शरत चंद्र बोस वियना गए, तो उन्होंने पहली बार अपनी भाभी और भतीजी को देखा। वह एक भावुक पल था। शरत बाबू ने एमिली से भारत चलने का आग्रह किया, लेकिन एमिली ने अपनी बूढ़ी मां की सेवा और अपनी आत्मनिर्भरता को चुनते हुए वहीं रहने का फैसला किया।
हमारी राय (The Trending People Analysis)
नेताजी सुभाष चंद्र बोस और एमिली शेंकल की प्रेम कहानी यह साबित करती है कि सच्चा प्यार मिलन में नहीं, बल्कि त्याग में होता है। एमिली जानती थीं कि सुभाष का पहला प्यार उनका देश 'भारत' है, और उन्होंने कभी खुद को उस रास्ते का कांटा नहीं बनने दिया। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी नेताजी की यादों और उनकी बेटी को एक योग्य इंसान बनाने में समर्पित कर दी।
The Trending People का विश्लेषण है कि यह कहानी इतिहास के पन्नों में दबी एक ऐसी दास्तां है जो नेताजी के मानवीय पक्ष को उजागर करती है। एक तरफ वे ब्रिटिश साम्राज्य के लिए सबसे खतरनाक दुश्मन थे, तो दूसरी तरफ वे एक ऐसे प्रेमी थे जो अपनी पत्नी को 'हृदय की रानी' मानता था। उनकी बेटी अनिता बोस फाफ, जो आज जर्मनी की एक सम्मानित अर्थशास्त्री हैं, इस प्रेम की जीवित विरासत हैं। यह प्रेम कहानी हमें सिखाती है कि बड़े लक्ष्यों के लिए व्यक्तिगत खुशियों का बलिदान देना ही महापुरुषों की पहचान होती है।
