Jaishankar on Pakistan: आतंकवाद पर भारत का रुख साफ, ‘हम तय करेंगे कैसे जवाब देना है
नेशनल डेस्क | नई दिल्ली विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने पाकिस्तान पर आतंकवाद को “राज्य नीति” के रूप में इस्तेमाल करने का आरोप लगाते हुए कड़ा प्रहार किया है। आईआईटी मद्रास में छात्रों और बुद्धिजीवियों को संबोधित करते हुए जयशंकर ने कहा कि भारत को अपनी रक्षा करने का पूरा अधिकार है और आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई कैसे होगी, इसका फैसला सिर्फ भारत करेगा।
जयशंकर ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर किसी भी तरह का बाहरी दबाव स्वीकार नहीं करेगा। उनके मुताबिक, कोई भी देश यह तय नहीं कर सकता कि भारत अपनी सुरक्षा के अधिकारों का इस्तेमाल कैसे करे।
‘खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते’
सिंधु जल समझौते का जिक्र करते हुए विदेश मंत्री ने कहा कि अच्छे पड़ोसी संबंध आपसी विश्वास और समझौतों पर टिके होते हैं। लेकिन दशकों तक आतंकवाद चलने की स्थिति में ऐसे समझौतों के फायदे भी नहीं मिल सकते। उन्होंने कहा कि यह उम्मीद करना गलत है कि भारत पानी साझा करता रहे और दूसरी तरफ आतंकवाद को बढ़ावा दिया जाए।
सुरक्षा पर भारत का संप्रभु अधिकार
जयशंकर ने दोहराया कि भारत अपनी सुरक्षा और हितों की रक्षा के लिए जरूरी हर कदम उठाने में सक्षम है। उन्होंने कहा कि आतंकवाद के खिलाफ भारत की नीति और प्रतिक्रिया पूरी तरह संप्रभु निर्णय है।
पहलगाम हमले का संदर्भ
गौरतलब है कि अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 पर्यटकों की मौत हुई थी। इसके बाद भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के तहत आतंकी ठिकानों पर कार्रवाई की थी और पाकिस्तान के खिलाफ कड़े राजनयिक कदम उठाए थे।
हमारी राय
विदेश मंत्री एस. जयशंकर का बयान भारत की बदली हुई रणनीतिक सोच को साफ तौर पर दर्शाता है। आतंकवाद को लेकर अब भारत का रुख केवल कूटनीतिक अपीलों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि स्पष्ट जवाबदेही और संप्रभु कार्रवाई की दिशा में बढ़ चुका है। “खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते” जैसी टिप्पणी यह संकेत देती है कि भारत अब पुराने समझौतों को भी व्यवहार और परिस्थितियों के संदर्भ में देख रहा है।
पाकिस्तान के साथ संबंधों में आतंकवाद सबसे बड़ा रोड़ा रहा है और जब तक इस मुद्दे पर ठोस बदलाव नहीं होता, तब तक भरोसे की बहाली मुश्किल दिखती है। हमारी राय में, भारत का यह रुख अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी एक स्पष्ट संदेश देता है कि सुरक्षा के सवाल पर कोई समझौता नहीं किया जाएगा। हालांकि, क्षेत्रीय स्थिरता के लिए दीर्घकालिक समाधान संवाद और जिम्मेदार व्यवहार से ही संभव है, लेकिन उसकी पहली शर्त आतंकवाद का अंत है।
