अनुच्छेद 15(5) के पूर्ण क्रियान्वयन की मांग, कांग्रेस ने निगरानी के लिए नियामक नियुक्त करने पर दिया जोर
कांग्रेस ने उच्च शिक्षण संस्थानों में वंचित वर्गों के लिए आरक्षण से जुड़े संविधान के अनुच्छेद 15(5) के प्रभावी क्रियान्वयन की मांग तेज कर दी है। पार्टी ने संसद की एक समिति की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा है कि इस संवैधानिक प्रावधान के अमल की निगरानी के लिए किसी नियामक संस्था को जिम्मेदारी सौंपी जानी चाहिए।
जयराम रमेश का बयान
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने मंगलवार को सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर कहा कि प्रस्तावित विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक, 2025 के तहत उच्च शिक्षा के लिए एकल नियामक बनाए जाने की बात हो रही है। ऐसे में इस नियामक को अनुच्छेद 15(5) के क्रियान्वयन की निगरानी का दायित्व दिया जाना चाहिए।
अनुच्छेद 15(5) का महत्व
अनुच्छेद 15(5) निजी और सरकारी सहायता प्राप्त उच्च शिक्षण संस्थानों में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण का प्रावधान करता है। यह प्रावधान वर्ष 2005 में 93वें संविधान संशोधन के जरिए तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार के दौरान जोड़ा गया था। इसके तहत आईआईटी, आईआईएम, केंद्रीय विश्वविद्यालयों और एनआईटी जैसे संस्थानों में ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू हुआ।
सुप्रीम कोर्ट की मुहर
जयराम रमेश ने याद दिलाया कि 6 मई 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने प्रमति एजुकेशनल एंड कल्चरल ट्रस्ट मामले में अनुच्छेद 15(5) की वैधता को बरकरार रखा था। इसके बावजूद निजी उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षण लागू कराने वाला कोई कानून अब तक पारित नहीं हुआ है।
संसदीय समिति की सिफारिश
उन्होंने कहा कि अगस्त 2025 में शिक्षा पर संसदीय स्थायी समिति ने निजी संस्थानों में एससी, एसटी और ओबीसी के लिए आरक्षण अनिवार्य करने का कानून लाने की सिफारिश की थी।
हमारी राय
अनुच्छेद 15(5) सामाजिक न्याय का एक मजबूत संवैधानिक आधार है। इसके प्रभावी और समान क्रियान्वयन से ही उच्च शिक्षा में समावेशन और अवसरों की वास्तविक समानता सुनिश्चित हो सकती है।
