यूजीसी विवाद में कूदे मंत्री संजय निषाद—कहा "सवर्ण आरक्षण पर तो नहीं हुआ था विरोध, अब गुमराह न हों छात्र", सरकार की मंशा पर दी सफाई
अंबेडकरनगर/लखनऊ, दिनांक: 27 जनवरी 2026 — विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के 'इक्विटी रेगुलेशंस 2026' को लेकर देश भर में मचे बवाल के बीच उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पहली बड़ी राजनीतिक प्रतिक्रिया सामने आई है। अंबेडकरनगर में गणतंत्र दिवस समारोह में बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुए यूपी सरकार के कैबिनेट मंत्री और निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद (Sanjay Nishad) ने यूजीसी के नए नियमों का पुरजोर समर्थन किया है। उन्होंने विरोध कर रहे छात्रों और संगठनों को नसीहत देते हुए कहा कि देश में कोई भी नियम रातों-रात नहीं बनता, बल्कि इसके पीछे एक पूरी संवैधानिक प्रक्रिया होती है।
संजय निषाद ने एक तार्किक सवाल उठाते हुए विरोधियों को घेरने की कोशिश की। उन्होंने कहा, "जब सामान्य वर्ग (General Category) को 10 प्रतिशत ईडब्ल्यूएस (EWS) आरक्षण मिला था, तब तो कोई विरोध नहीं हुआ था। आज जब सरकार शिक्षा में समानता और पारदर्शिता लाने के लिए नियम बना रही है, तो भ्रम क्यों फैलाया जा रहा है?" उनका कहना था कि यूजीसी के नए नियम किसी वर्ग विशेष को नुकसान पहुंचाने के लिए नहीं, बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था में एकरूपता लाने के लिए हैं। 'सबका साथ, सबका विकास' की नीति के तहत केंद्र और राज्य सरकारें काम कर रही हैं ताकि हर छात्र को समान अवसर मिल सकें।
इसके अलावा, मंत्री ने शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और प्रशासन के बीच चल रहे विवाद पर भी सधी हुई प्रतिक्रिया दी। डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के बाद संजय निषाद ने भी मामले को शांत करने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि संत-महात्मा कभी नाराज नहीं होते, अक्सर लोगों की गलतफहमियों या व्यवहार के कारण ऐसी असहज स्थिति बन जाती है। महात्माओं के विचारों से ही समाज को दिशा मिलती है और जल्द ही यह पूरा मामला शांत हो जाएगा।
हमारी राय (The Trending People Analysis)
संजय निषाद का यह बयान सरकार की उस रणनीति का हिस्सा लगता है, जिसके तहत वह यूजीसी नियमों को 'सामाजिक न्याय' के ढांचे में पेश करना चाहती है। सवर्ण आरक्षण का उदाहरण देकर उन्होंने विरोध की धार कुंद करने की कोशिश की है।
The Trending People का विश्लेषण है कि मंत्री का बयान यह दर्शाता है कि सरकार इस मुद्दे पर पीछे हटने के मूड में नहीं है। हालांकि, छात्रों के गुस्से को शांत करने के लिए केवल बयानों से काम नहीं चलेगा, सरकार को नियमों के उन प्रावधानों पर स्पष्टता देनी होगी जिन्हें लेकर डर का माहौल है। शंकराचार्य विवाद पर उनकी नरम टिप्पणी भी डैमेज कंट्रोल की एक कोशिश है।