राजस्थान में 'वोटर लिस्ट' पर आर-पार—कांग्रेस बोली "लोकतंत्र की हत्या हो रही है", 1.40 लाख फॉर्म और अमित शाह के दौरे पर उठे गंभीर सवाल
जयपुर/नई दिल्ली, दिनांक: 19 जनवरी 2026 — राजस्थान की शांत दिख रही राजनीति में एक बार फिर बड़ा भूचाल आ गया है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision - SIR) अभियान को लेकर कांग्रेस ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) और निर्वाचन आयोग (Election Commission) पर अब तक का सबसे संगीन आरोप लगाया है। प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने दावा किया है कि राज्य में एक सोची-समझी साजिश के तहत कांग्रेस समर्थक मतदाताओं के नाम थोक के भाव में काटे जा रहे हैं और फर्जी नाम जोड़े जा रहे हैं।
सोमवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में पीसीसी चीफ गोविंद सिंह डोटासरा (Govind Singh Dotasra) और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली (Tikaram Julie) ने इस पूरे प्रकरण को सीधे तौर पर "लोकतंत्र की हत्या" करार दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा के शीर्ष नेताओं—संगठन महामंत्री बी.एल. संतोष और गृह मंत्री अमित शाह—के हालिया राजस्थान दौरों के बाद ही इस 'खेल' की शुरुआत हुई है।
"3 जनवरी तक सब ठीक था, फिर शुरू हुआ खेल"
गोविंद सिंह डोटासरा ने आंकड़ों और तारीखों के साथ अपनी बात रखी। उन्होंने बताया कि एसआईआर की प्रक्रिया के बाद जो मसौदा सूची जारी हुई थी, उसमें 45 लाख लोग अनुपस्थित (Absent), स्थानांतरित (Shifted) और मृत (Dead) की श्रेणी में पाए गए थे।
समयसीमा: इसके बाद 15 जनवरी तक आपत्तियां मांगी गई थीं। डोटासरा ने दावा किया, "3 जनवरी तक कोई अफरा-तफरी नहीं थी और सिस्टम सही चल रहा था। लेकिन जैसे ही 3 जनवरी को भाजपा के संगठन महामंत्री बी.एल. संतोष जयपुर आए और बैठक की, उसके बाद फर्जी तरीके से वोट जोड़ने और काटने का काम युद्ध स्तर पर शुरू हो गया।"
आंकड़ों का विस्फोट: एक दिन में हजारों फॉर्म-7
कांग्रेस नेताओं ने निर्वाचन आयोग की वेबसाइट से लिए गए डेटा का हवाला देते हुए चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए।
- तुलना: डोटासरा ने बताया कि 17 दिसंबर से 14 जनवरी के बीच भाजपा ने 937 बीएलए (Booth Level Agents) के माध्यम से 211 नाम जोड़ने और 5,694 वोट काटने का आवेदन दिया। जबकि कांग्रेस ने केवल 110 बीएलए के जरिए 185 नाम जोड़ने और 2 नाम हटाने का आवेदन दिया।
- अचानक बाढ़: उन्होंने दावा किया कि झुंझुनू में एक ही दिन में नाम काटने के 13,882 फॉर्म-7 जमा किए गए। इसी तरह मंडावा में 16,276, उदयपुरवाटी में 1,241 और खेतड़ी में 1,478 फॉर्म जमा हुए। कुल मिलाकर 1,40,000 फॉर्म तो पंजीकृत भी करवा दिए गए।
"हस्ताक्षर फर्जी, फॉर्म प्रिंटेड—यह साजिश नहीं तो क्या है?"
नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने मामले की गंभीरता को और बढ़ा दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि जमा किए गए फॉर्म्स में बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा हुआ है।
- प्रिंटेड फॉर्म: जूली ने कहा, "ये सारे फॉर्म हाथ से भरे हुए नहीं हैं, बल्कि प्रिंटेड हैं। नाम टाइप किए हुए हैं और हस्ताक्षर भी फर्जी तरीके से एक ही व्यक्ति या गिरोह द्वारा किए गए लगते हैं।"
- अमित शाह का दौरा: उन्होंने सवाल उठाया, "16 जनवरी को अचानक भाजपा के 2,133 लोगों ने 18,896 नाम काटने का आवेदन दिया। सवाल यह है कि गृह मंत्री अमित शाह जी के दौरे के बाद ऐसा क्या हुआ कि अचानक नाम काटने में इतनी तेजी आ गई?"
मंत्रियों की भूमिका: जूली ने दावा किया कि सारे फॉर्म एक जगह छापे गए और वहां से जयपुर पहुंचाए गए। आरोप है कि भाजपा विधायकों, प्रत्याशियों और 5-6 मंत्रियों को जिम्मा दिया गया था कि वे इन फॉर्म्स को एआरओ (ARO) ऑफिस तक पहुंचाएं।
फॉरेंसिक जांच की मांग: "दूध का दूध, पानी का पानी हो"
कांग्रेस ने इस मामले में केवल जुबानी जमाखर्च नहीं किया, बल्कि ठोस कार्रवाई की मांग की है।
- फॉरेंसिक जांच: जूली ने निर्वाचन आयोग और उच्चतम न्यायालय से मांग की है कि राजस्थान में जमा हुए सभी आपत्ति फॉर्म्स की फॉरेंसिक जांच (Forensic Investigation) कराई जाए।
- दबाव: उन्होंने आरोप लगाया कि अधिकारियों और बीएलओ (BLO) पर दबाव डालकर यह खेल खेला गया है। यह पता लगाया जाना चाहिए कि ये फॉर्म कहां छपे और कौन इन्हें लाया।
हमारी राय (The Trending People Analysis)
मतदाता सूची किसी भी चुनाव की आत्मा होती है। अगर कांग्रेस के आरोप सही हैं और एक ही दिन में हजारों नाम काटने के फॉर्म जमा हुए हैं, तो यह एक गंभीर प्रशासनिक चूक या साजिश की ओर इशारा करता है। लोकतंत्र में हर नागरिक का वोट सुरक्षित होना चाहिए।
The Trending People का विश्लेषण है कि चुनाव आयोग को अपनी साख बचाने के लिए तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए। इतने बड़े पैमाने पर फॉर्म-7 का जमा होना असामान्य है। इसकी रैंडम सैंपलिंग और भौतिक सत्यापन (Physical Verification) अनिवार्य है। अगर यह साबित होता है कि जीवित और निवासी लोगों के नाम काटे जा रहे हैं, तो दोषियों पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। विपक्ष के आरोपों को केवल राजनीति मानकर खारिज करना लोकतंत्र के हित में नहीं होगा।
