पीएम मोदी का 'पोंगल संदेश'—तमिल संस्कृति है विश्व की धरोहर, प्रकृति और किसान के बिना अधूरा है जीवन, अब ग्लोबल हुआ ये पर्व
नई दिल्ली, दिनांक: 14 जनवरी 2026 — मकर संक्रांति और पोंगल (Pongal) के पावन अवसर पर देश की राजधानी दिल्ली में दक्षिण भारतीय संस्कृति की एक अनोखी छटा देखने को मिली। प्रधानमंत्री नरेन्द मोदी (Narendra Modi) ने बुधवार को केंद्रीय सूचना और प्रसारण राज्य मंत्री एल. मुरुगन के आवास पर आयोजित भव्य पोंगल उत्सव में शिरकत की। पारंपरिक वेशभूषा और उल्लास के बीच पीएम मोदी ने न केवल तमिल समुदाय के साथ त्योहार की खुशियां बांटीं, बल्कि एक बड़ा संदेश भी दिया।
उन्होंने कहा कि प्रकृति के साथ सौहार्दपूर्ण संतुलन का संदेश देने वाला पोंगल अब किसी एक राज्य तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह एक 'वैश्विक पर्व' (Global Festival) बन गया है। दुनिया भर में फैले तमिल समुदाय ने इसे अपनी जड़ों से जोड़े रखा है। समारोह में कई केंद्रीय मंत्री, वरिष्ठ नौकरशाह और समाज के विभिन्न वर्गों के लोग शामिल हुए, जिससे यह आयोजन 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' की मिसाल बन गया।
"आभार शब्दों से नहीं, आचरण से जताना चाहिए"
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में पोंगल के मूल मर्म को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि यह त्योहार हमें याद दिलाता है कि प्रकृति और किसानों के प्रति आभार केवल शब्दों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि यह हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा होना चाहिए।
पीएम मोदी ने कहा:
"जब धरती हमें इतना कुछ देती है, तो यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम इसे संजोएं और इसकी रक्षा करें। पोंगल का पर्व प्रकृति, परिवार और समाज के बीच सौहार्दपूर्ण संतुलन बनाकर रखने के महत्व पर जोर देता है।"
उन्होंने इस बात पर खुशी जताई कि दुनिया भर में तमिल समुदाय के लोग अपनी संस्कृति को पूरे उत्साह से संजोए हुए हैं और उनके बीच आकर उन्हें गौरव की अनुभूति हो रही है।
तमिल संस्कृति: दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक
प्रधानमंत्री ने तमिल भाषा और संस्कृति की प्राचीनता पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि तमिल संस्कृति दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक है।
विरासत: "इसमें सदियों की बुद्धिमत्ता और परंपरा समाहित है, जो इतिहास से सबक लेकर भविष्य का रास्ता दिखाती है। आज का भारत आगे बढ़ने में इसी सांस्कृतिक जड़ से मजबूती लेता है," पीएम ने कहा।
एकता का सूत्र: उन्होंने कहा कि पोंगल के अवसर पर हम महसूस कर रहे हैं कि भारत को आगे बढ़ाने वाली विश्वास और एकता की भावना इसकी संस्कृति से गहराई से जुड़ी है। हमें गर्व है कि विश्व की सबसे प्राचीन भाषा, तमिल, का जन्म हमारे देश में हुआ।प्रकृति संरक्षण और 'मिशन लाइफ'
पीएम मोदी ने पोंगल के संदेश को सरकार की पर्यावरण नीतियों से भी जोड़ा। उन्होंने कहा कि मिट्टी की सेहत को बनाए रखना, जल संरक्षण और संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग आज की सबसे बड़ी जरूरत है।
पहल: उन्होंने 'मिशन लाइफ' (Mission LiFE), 'एक पेड़ मां के नाम' और 'अमृत सरोवर' जैसी योजनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि ये सभी पहल पोंगल की भावना पर ही आधारित हैं। ये हमें उन मूल्यों को कायम रखने के लिए प्रोत्साहित करती हैं जो प्रकृति के साथ तालमेल सिखाते हैं।
किसान: जीवन का आधार
पोंगल मूल रूप से किसानों और फसल का उत्सव है। प्रधानमंत्री ने तमिल साहित्य का हवाला देते हुए अन्नदाताओं के परिश्रम को नमन किया।
तिरुक्कुरल का जिक्र: उन्होंने कहा, "तमिल संस्कृति में किसान को जीवन का आधार माना जाता है। महान तमिल ग्रंथ तिरुक्कुरल (Thirukkural) में कृषि और किसानों के महत्व के बारे में विस्तार से बताया गया है। यह त्योहार मानव श्रम और प्रकृति के बीच घनिष्ठ संबंध की याद दिलाता है।"
चुनावी संदर्भ और राजनीतिक मायने
भले ही यह एक सांस्कृतिक आयोजन था, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक इसे तमिलनाडु में आगामी विधानसभा चुनावों से भी जोड़कर देख रहे हैं। तमिलनाडु में भाजपा अपनी पैठ बनाने की कोशिश कर रही है और पीएम मोदी का तमिल समुदाय के बीच लगातार जाना और उनकी संस्कृति का सम्मान करना एक महत्वपूर्ण संकेत है। इससे पहले, पीएम ने तमिल और अंग्रेजी भाषा में एक पत्र लिखकर तमिलनाडु के लोगों को बधाई भी दी थी, जिसमें उन्होंने 'वणक्कम' (नमस्कार) के साथ अपनी बात शुरू की थी।
हमारी राय (The Trending People Analysis)
प्रधानमंत्री का पोंगल उत्सव में शामिल होना 'सांस्कृतिक कूटनीति' (Cultural Diplomacy) का एक बेहतरीन उदाहरण है। तमिल संस्कृति को 'वैश्विक धरोहर' बताकर उन्होंने दक्षिण भारत के लोगों के दिलों को छूने की कोशिश की है।
The Trending People का विश्लेषण है कि पोंगल जैसे त्योहार हमें आधुनिकता की दौड़ में अपनी जड़ों की याद दिलाते हैं। पीएम द्वारा प्रकृति संरक्षण को त्योहार से जोड़ना एक व्यावहारिक संदेश है। जिस तरह पोंगल में पुराने को त्यागकर नए का स्वागत किया जाता है (भोगी पोंगल), उसी तरह हमें भी पर्यावरण के प्रति अपनी पुरानी लापरवाही को त्यागकर नई और जिम्मेदार जीवनशैली अपनानी चाहिए। यह आयोजन उत्तर और दक्षिण भारत के बीच सांस्कृतिक सेतु को और मजबूत करेगा।
