वो सितारा जिसे छूने के लिए बेताब था जमाना—राजेश खन्ना की जयंती पर विशेष, जब 'बाबू मोशाय' ने सफेद बालों में भी मनवाया अपनी एक्टिंग का लोहा
मुंबई/नई दिल्ली, दिनांक: 29 दिसंबर 2025 — भारतीय सिनेमा के इतिहास में सितारे तो बहुत हुए, लेकिन 'सुपरस्टार' का खिताब सबसे पहले जिस शख्सियत के हिस्से आया, वह थे राजेश खन्ना (Rajesh Khanna)। आज यानी 29 दिसंबर को उस करिश्माई अभिनेता की जयंती है, जिसने एक दौर में बॉक्स ऑफिस पर ऐसा राज किया कि उनकी महज मौजूदगी ही फिल्म को हिट कराने के लिए काफी थी। उन्हें प्यार से इंडस्ट्री और फैंस 'काका' कहकर बुलाते थे।
अमृतसर की गलियों में 1942 में जन्मे जतिन खन्ना का मुंबई के गिरगांव चौपाटी तक का सफर और वहां से हिंदी सिनेमा के शिखर तक पहुंचने की दास्तां किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। आज उनकी जयंती पर हम उनकी उन ब्लॉकबस्टर हिट्स की बात नहीं करेंगे जिन्हें दुनिया जानती है, बल्कि उनके करियर के उस 'दूसरे अध्याय' (Second Innings) पर रोशनी डालेंगे जब उन्होंने अपनी उम्र को स्वीकार करते हुए चरित्र भूमिकाओं में जान फूंकी थी।
जतिन से 'राजेश' बनने का सफर और दीवानगी का आलम
बहुत कम लोग जानते हैं कि राजेश खन्ना का असली नाम जतिन खन्ना था। फिल्मों में आने से पहले उनके अंकल के.के. तलवार ने उन्हें 'राजेश' नाम दिया था। 1966 में चेतन आनंद की फिल्म 'आखिरी खत' से शुरू हुआ उनका सफर 'राज' (1967) से आगे बढ़ा। दिलचस्प बात यह है कि ये दोनों फिल्में उन्हें एक 'टैलेंट हंट' (अखिल भारतीय संयुक्त निर्माता प्रतिभा प्रतियोगिता) जीतने के इनाम के रूप में मिली थीं।
वह पागलपन: 'आराधना', 'कटी पतंग', 'अमर प्रेम' और 'आनंद' जैसी फिल्मों ने उन्हें भगवान बना दिया। लड़कियों के बीच उनकी दीवानगी का आलम यह था कि वे उन्हें अपने खून से खत लिखती थीं। एक किस्सा मशहूर है कि एक बार कॉलेज की लड़कियों ने राजेश खन्ना की सफेद कार को किस (Kiss) कर-करके लाल और गुलाबी कर दिया था। लड़कियां उनकी एक झलक पाकर बेहोश हो जाती थीं। ऐसा स्टारडम शायद ही किसी और ने देखा हो।
90 का दशक: जब सुपरस्टार ने खुद को नए सिरे से गढ़ा
बतौर रोमांटिक हीरो तो राजेश खन्ना ने इतिहास रचा, लेकिन 1990 से 2000 के बीच उन्होंने सपोर्टिंग और मैच्योर रोल्स के जरिए यह साबित किया कि एक कलाकार कभी बूढ़ा नहीं होता। आइए जानते हैं उनकी इस दौर की कुछ यादगार फिल्मों के बारे में:
1. स्वर्ग (1990): बड़े भाई का दर्द
डेविड धवन की फिल्म 'स्वर्ग' में राजेश खन्ना ने एक अमीर बिजनेसमैन और बड़े भाई का किरदार निभाया था। गोविंदा और जूही चावला के साथ इस फिल्म में उनका अभिनय दिल को छू लेने वाला था।
- किरदार: वह भाई जिसने अपने सौतेले भाई-बहनों के लिए अपना परिवार नहीं बसाया, लेकिन वक्त बदलने पर उन्हीं भाइयों ने उसे घर से निकाल दिया।
- अभिनय: हवेली से निकलकर चॉल में रहने की मजबूरी और अपने वफादार नौकर (गोविंदा) के प्रति उनका स्नेह देखकर दर्शकों की आंखों में आंसू आ गए थे। यह फिल्म साबित करती है कि इमोशन के मामले में काका का कोई सानी नहीं था।
2. खुदाई (1994): गंभीरता और ठहराव
राज आनंद द्वारा निर्देशित 'खुदाई' में राजेश खन्ना एक बिजनेसमैन और पिता की भूमिका में नजर आए। दीपिका चिखलिया और गुलशन ग्रोवर के साथ इस फिल्म में उनका किरदार बेहद शांत और गंभीर था। भले ही फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर तहलका नहीं मचाया, लेकिन काका ने अपनी स्क्रीन प्रेजेंस से इसे देखने लायक बना दिया।
3. आ अब लौट चलें (1999): ग्रे शेड और 'घमंड'
ऋषि कपूर द्वारा निर्देशित 'आ अब लौट चलें' में राजेश खन्ना ने एक अलग ही रंग दिखाया।
- भूमिका: एक ऐसा आदमी जो कामयाबी के लिए विदेश जाता है और पीछे अपने परिवार (पत्नी और बच्चे) को छोड़ देता है। वहां वह एक अमीर की बेटी से शादी कर घमंड में चूर हो जाता है।
- क्लाइमेक्स: फिल्म के अंत में जब उन्हें अपनी गलती का एहसास होता है, तो वह दृश्य काका की बेहतरीन अदाकारी का नमूना पेश करता है। अक्षय खन्ना के साथ उनकी जुगलबंदी शानदार थी।
4. वफा (2009): विवाद और साहस
अपने करियर के अंतिम पड़ाव में, 2009 में उन्होंने 'वफा: अ डेडली लव स्टोरी' में काम किया। इसमें उन्होंने एक उम्रदराज व्यक्ति का किरदार निभाया जो भावनात्मक उथल-पुथल में फंसा है।
चर्चा: यह एक बोल्ड फिल्म थी, जिसके लिए उनकी आलोचना भी हुई। आलोचकों का कहना था कि एक सुपरस्टार को ऐसी फिल्म नहीं करनी चाहिए थी। लेकिन कुछ ने इसे उनकी हिम्मत माना कि उन्होंने उम्रदराज मर्दानगी की खामियों और असुरक्षाओं को पर्दे पर लाने का जोखिम उठाया।
5. रियासत (2014): आखिरी सलाम
काका की आखिरी फिल्म 'रियासत' थी, जो उनके निधन (18 जुलाई 2012) के दो साल बाद उनकी 71वीं जयंती पर रिलीज हुई। अशोक त्यागी निर्देशित इस फिल्म में वे 'गॉडफादर' जैसे अंदाज में नजर आए। शूटिंग के दौरान वे काफी बीमार थे, लेकिन उन्होंने अपना काम पूरा किया। यह फिल्म उनके फैंस के लिए एक भावुक विदाई थी।
हमारी राय
राजेश खन्ना का करियर हमें सिखाता है कि शोहरत सूरज की तरह होती है—उगती है, चमकती है और ढलती है। लेकिन एक सच्चा कलाकार कभी अस्त नहीं होता। 90 के दशक और उसके बाद की उनकी फिल्में भले ही 'सुपर-डुपर हिट' न रही हों, लेकिन उन्होंने यह संदेश दिया कि अभिनय केवल जवानी का मोहताज नहीं है।
The Trending People का मानना है कि 'आनंद' का वह संवाद— "बाबू मोशाय, जिंदगी बड़ी होनी चाहिए, लंबी नहीं" —राजेश खन्ना ने सच कर दिखाया। उन्होंने अपनी शर्तों पर जिंदगी जी और अपनी शर्तों पर ही काम किया। आज उनकी जयंती पर हम उस कलाकार को नमन करते हैं जिसने हमें मुस्कुराना और रोना, दोनों सिखाया।
