बिहार में महागठबंधन की 'सांसें' अटकीं—कांग्रेस बोली "अब अकेले चलेंगे", राजद की नसीहत "शीशे में शक्ल देखो"; क्या 2026 में होगा तलाक?
पटना/नई दिल्ली, दिनांक: 31 दिसंबर 2025 — बिहार की राजनीति के लिए साल 2025 एक बुरे सपने की तरह गुजरा है, खासकर विपक्षी खेमे के लिए। विधानसभा चुनावों में मिली ऐतिहासिक और शर्मनाक हार ने महागठबंधन (Mahagathbandhan) की नींव हिला दी है। परिणाम आने के बाद जहां एनडीए (NDA) 200 से ज्यादा सीटों के साथ जश्न मना रहा है, वहीं महज 35 सीटों पर सिमटा विपक्ष अब अंतर्कलह (Internal Conflict) की आग में जल रहा है।
हार का ठीकरा फोड़ने का खेल शुरू हो चुका है। गठबंधन के दो प्रमुख स्तंभ—राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और कांग्रेस (Congress)—अब एक-दूसरे के खिलाफ ही मोर्चा खोले बैठे हैं। स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अब 'एकला चलो' की राग अलाप रहे हैं। ऐसे में 2026 के आगमन पर सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या बिहार में महागठबंधन अपना वजूद बचा पाएगा?
कांग्रेस का विस्फोट: "साथ रहने का कोई औचित्य नहीं"
महागठबंधन में दरार तब और चौड़ी हो गई जब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शकील अहमद खान ने एक विस्फोटक बयान दिया। उन्होंने सीधे तौर पर राजद के साथ गठबंधन को खारिज कर दिया।
शकील अहमद ने कहा:
"बिहार में अब महागठबंधन जैसी कोई चीज नहीं बची है। राजद के साथ गठबंधन करने से कांग्रेस को कोई लाभ नहीं मिल रहा है, बल्कि नुकसान ही हो रहा है। विधानसभा चुनाव का रिजल्ट सबने देख लिया है। अब साथ रहने का कोई औचित्य नहीं है, कांग्रेस को बिहार में अकेले ही अपनी जमीन तलाशनी चाहिए।"
यह बयान दर्शाता है कि कांग्रेस का एक धड़ा अब लालू-तेजस्वी की छाया से बाहर निकलना चाहता है, क्योंकि उन्हें लगता है कि राजद का 'माय' (MY) समीकरण अब कमजोर पड़ चुका है।
राजद का पलटवार: "बैसाखी हम हैं, आत्मचिंतन आप करें"
कांग्रेस के हमले पर राजद ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी है। राजद प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने कांग्रेस को उसकी जमीनी हकीकत का आईना दिखाया। तिवारी ने कहा, "बिहार में कांग्रेस को जो भी ऑक्सीजन मिलती है, वह राजद की वजह से है। राजद ही कांग्रेस की असली ताकत है। जनता ने जो भी वोट दिया है, वह तेजस्वी यादव के चेहरे और काम को देखकर दिया है। कांग्रेस के नेताओं को बयानबाजी छोड़कर आत्मचिंतन करना चाहिए कि उनकी पार्टी क्यों सिमटती जा रही है।"
भाजपा और जदयू का तंज: "जनता ने उखाड़ फेंका"
विपक्ष की इस लड़ाई में सत्ताधारी एनडीए ने भी चुटकी ली है।
- भाजपा: प्रवक्ता अरविंद कुमार सिंह ने कहा कि यह गठबंधन जेल यात्रा के डर से और पारिवारिक लाभ के लिए बनाया गया था। "जब जनता ने इन्हें उखाड़ फेंका और एनडीए को 200 पार पहुंचाया, तो अब भगदड़ मच गई है। इनके नेता विदेश भाग गए हैं और कार्यकर्ता आपस में लड़ रहे हैं," सिंह ने कहा।
- जदयू: मुख्य प्रवक्ता नीरज कुमार ने चुनौती देते हुए कहा कि अगर कांग्रेस को इतनी ही दिक्कत है, तो उनके बड़े नेता लिखित में विधानसभा अध्यक्ष को दें कि तेजस्वी यादव उनके नेता नहीं हैं। "मौखिक आपत्ति का कोई मतलब नहीं, महागठबंधन का अब कोई औचित्य नहीं बचा है," उन्होंने जोड़ा।
एक्सपर्ट व्यू: "मजबूरी का नाम महागठबंधन"
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक आशुतोष कुमार का मानना है कि यह लड़ाई 'नूरा-कुश्ती' ज्यादा और 'हकीकत' कम लगती है।
- परस्पर निर्भरता: उनका कहना है, "बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को राजद के वोट बैंक की जरूरत होती है और लोकसभा में राजद को कांग्रेस के राष्ट्रीय चेहरे की। दोनों जानते हैं कि अलग होकर वे एनडीए के विजय रथ को नहीं रोक सकते।"
- आलाकमान की चुप्पी: स्थानीय नेता भले ही लड़ रहे हों, लेकिन राहुल गांधी और तेजस्वी यादव के सुर अभी भी एक हैं। आशुतोष कुमार के अनुसार, "नया साल दोनों के लिए चुनौतीपूर्ण होगा। राजद 143 लड़कर 25 पर सिमट गई और कांग्रेस 61 लड़कर 6 पर। अस्तित्व बचाने के लिए उन्हें अंततः साथ आना ही पड़ेगा।"
आंकड़ों की जुबानी: 15 साल में कैसे गिरा ग्राफ?
महागठबंधन की स्थिति को समझने के लिए पिछले चार विधानसभा चुनावों के आंकड़े आंखें खोलने वाले हैं:
- 2010 (अलग-अलग लड़े): राजद ने 168 सीटों पर लड़ा और 22 जीतीं। कांग्रेस 243 पर लड़ी और सिर्फ 4 जीत सकी। (परिणाम: अलग लड़ना घातक रहा)।
- 2015 (स्वर्ण काल): महागठबंधन बना। राजद 101 पर लड़कर 80 जीती, कांग्रेस 41 पर लड़कर 27 जीती।
- 2020 (गिरावट शुरू): राजद 144 पर लड़कर 75 जीती, कांग्रेस 70 पर लड़कर 19 जीती।
- 2025 (पतन): राजद 143 पर लड़कर मात्र 25 जीती और कांग्रेस 61 पर लड़कर सिर्फ 6 सीटें ला पाई।
2025 का हाल: इस बार वीआईपी (0 सीट) और वामदलों (3 सीट) का प्रदर्शन भी निराशाजनक रहा, जिससे पूरा कुनबा 35 पर ढेर हो गया।
हमारी राय
राजनीति में हार अनाथ होती है, और बिहार में यही हो रहा है। कांग्रेस का 'अकेले चलने' का दम भरना एक दबाव की राजनीति (Pressure Politics) हो सकता है, क्योंकि धरातल पर उसका संगठन बेहद कमजोर है। वहीं, राजद के लिए भी यह आत्ममंथन का समय है कि उसका कोर वोट बैंक क्यों खिसक रहा है।
The Trending People का विश्लेषण है कि 2026 में महागठबंधन पूरी तरह टूटेगा नहीं, लेकिन उसका स्वरूप बदल सकता है। कांग्रेस अब 'छोटे भाई' की भूमिका में रहने को तैयार नहीं होगी, और राजद अपनी 'बड़े भाई' की कुर्सी छोड़ना नहीं चाहेगा। अगर ये दोनों दल जनता के बीच अपना विश्वास दोबारा नहीं जगा पाए, तो बिहार की राजनीति में वे लंबे समय के लिए अप्रासंगिक (Irrelevant) हो सकते हैं।
