Jan Suraaj Poor Performance Explained: बिहार चुनाव 2025 में प्रशांत किशोर की पार्टी क्यों बुरी तरह फेल हुई?
बिहार विधानसभा चुनाव 2025: जन सुराज क्यों नहीं चला? पूरा विश्लेषण
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के परिणाम अब लगभग साफ हो चुके हैं। छह घंटे से अधिक की काउंटिंग के बाद भी प्रशांत किशोर (PK) की पार्टी जन सुराज किसी भी सीट पर लीड नहीं बना पाई है। यहां तक कि अधिकांश सीटों पर पार्टी टॉप 3 से भी बाहर है—जबकि जन सुराज ने 200 से अधिक सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इलेक्शन कमीशन की वेबसाइट NOTA (1.83%) का वोट प्रतिशत दिखा रही है, लेकिन जन सुराज का वोट शेयर गायब है। इससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या जन सुराज को NOTA से भी कम वोट मिले?
मतों का गणित: किसे कितना वोट मिला?
दोपहर 1:30 बजे तक उपलब्ध वोट शेयर के अनुसार स्थिति इस प्रकार है:
| पार्टी | वोट प्रतिशत (%) |
|---|---|
| RJD | 22.99% |
| BJP | 21.19% |
| JDU | 18.87% |
| INC | 8.17% |
| LJPRV | 5.37% |
| CPI (ML)L | 3.16% |
| AIMIM | 1.89% |
| BSP | 1.48% |
| NOTA | 1.83% |
| अन्य (OTH) | 13.35% |
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि OTH (13.35%) में कितनी हिस्सेदारी जन सुराज की है।
चूंकि बहुतेरी छोटी पार्टियों का वोट शेयर—जैसे AAP (0.30%), NCP (0.02%), CPI (0.61%)—साफ दिखाया गया है, लेकिन जन सुराज का प्रतिशत नहीं दिखना यह बताता है कि वोट बेहद कम हैं या डेटा अभी अपडेट नहीं हुआ है।
दो प्रमुख पार्टियां जिनका वोट शेयर गायब है
ECI ने दो बड़ी पार्टियों—
- HAM (हिंदुस्तानी आवामी मोर्चा)
- जन सुराज
—का वोट प्रतिशत अलग से प्रदर्शित नहीं किया है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि इनका वोट शेयर “Others” में जोड़ा जा रहा है, लेकिन इतना कम है कि ECI ने अलग से प्रदर्शित नहीं किया।
कई राजनीतिक जानकारों का दावा है:
“जन सुराज को NOTA से भी कम वोट मिले हो सकते हैं।”
यदि ऐसा है, तो यह प्रशांत किशोर के लिए बहुत बड़ा झटका है—क्योंकि लाखों किलोमीटर पदयात्रा, महीनों की रणनीति और आक्रामक कैंपेन के बावजूद नतीजा उम्मीदों के बिल्कुल उलट है।
जन सुराज की हार की 5 सबसे बड़ी वजहें
नीचे वे वजहें हैं जिनकी वजह से विश्लेषकों के अनुसार जन सुराज 2025 में बुरी तरह धराशायी हो गई:
1. प्रशांत किशोर का खुद चुनाव नहीं लड़ना
PK इस चुनाव का सबसे बड़ा चेहरा थे।
उनसे जनता उम्मीद कर रही थी कि:
- वह खुद मैदान में उतरेंगे
- किसी सुरक्षित सीट से चुनाव लड़ेंगे
- पार्टी को दिशा देंगे
लेकिन PK ने सिर्फ “संचालक” की भूमिका निभाई। यह बात आम लोगों को समझ नहीं आई और पार्टी को नुकसान हुआ।
एक राजनीतिक विशेषज्ञ ने टिप्पणी की:
“PK अगर खुद चुनाव लड़ते, तो कम से कम 3–5 सीटों पर प्रभाव दिखता।”
2. समय के साथ कैंपेन का जोश ठंडा पड़ जाना
जब जन सुराज अभियान शुरू हुआ, उसे सोशल मीडिया और जमीन दोनों पर अच्छी पकड़ मिली।
लेकिन:
- जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आए
- बड़े दलों की रैलियाँ बढ़ीं
- एजेंडा बदलता गया
वैसे-वैसे जन सुराज का अभियान कमजोर होता गया।
अंतिम दो महीनों में अभियान का टेम्पो इतना गिर गया कि कई क्षेत्रों में मतदाताओं ने कहा:
“चुनाव आने से पहले PK दिखे, पर आख़िरी दिनों में पार्टी गायब थी।”
3. कमजोर संगठन: कोई मजबूत ग्राउंड स्ट्रक्चर नहीं
पार्टी के पास:
- बूथ लेवल टीम नहीं
- पंचायत स्तर पर मजबूत नेतृत्व नहीं
- बड़े स्तर पर पहचान नहीं
पार्टी ने अधिकतर जगहों पर सिर्फ स्वयंसेवकों के सहारे चुनाव लड़ा। दूसरी ओर, BJP-RJD जैसी पार्टियों के पास दशकों का संगठन है।
बिना मजबूत संगठन पार्टी वोट को बूथ तक नहीं पहुंचा सकी।
4. ज्यादातर उम्मीदवार नए और अपरिचित
जन सुराज का बड़ा दावा था —
“हम नए चेहरे, स्वच्छ छवि के उम्मीदवार देंगे।”
लेकिन राजनीति का जमीनी सच यह है कि:
- पहचान
- जातीय समीकरण
- स्थानीय नेटवर्क
- पैठ
सबसे महत्वपूर्ण होते हैं।
अधिकांश उम्मीदवारों के पास इनमें से कुछ भी नहीं था। नतीजतन, कई जगहों पर वोटिंग प्रतिशत जन सुराज के लिए 0.1% से भी कम रहा।
5. जातीय समीकरणों को सही तरह नहीं समझ पाना
बिहार में 90% चुनाव जातीय गणित पर टिका होता है।
PK की रणनीति “प्रदेश के विकास” पर आधारित थी—जो अच्छी थी, लेकिन जातीय समीकरणों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
उदाहरण:
- Yadav—RJD की पकड़
- कोरी/कोइरी—JD(U) का बेस
- Rajput—BJP का वोट बैंक
- Paswan—LJP का सपोर्ट
जन सुराज यह तय नहीं कर पाई कि किस जातीय समूह में अपनी जड़ें तलाशे।
इलेक्शन कमीशन: कौन कितनी सीटों पर आगे?
1 बजे तक की स्थिति:
- BJP – 91
- JD(U) – 81
- RJD – 26
- LJPRV – 21
- INC – 4
- HAMS – 5
- AIMIM – 5
- CPI(ML)L – 4
इन नतीजों से यह भी दिखता है कि जन सुराज किसी भी लेवल पर मुकाबले का हिस्सा नहीं बन पाई।
विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया: क्या PK का राजनीतिक मॉडल विफल हो गया?
कई विश्लेषकों का मानना है कि बिहार में “तकनीकी राजनीति” (data-based politics) उतनी कारगर नहीं होती जितनी “भावनात्मक राजनीति”।
एक वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार ने कहा:
“PK जनाकांक्षा समझते हैं, लेकिन जमीनी राजनीति की कठोरता उनसे छूट गई।”
वहीं कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि:
- PK ने लंबा गेम खेलने की योजना बनाई है
- 2025 केवल पहला चरण था
- 2030 में पार्टी बेहतर वापसी कर सकती है
लेकिन 2025 के आंकड़े बताते हैं कि रास्ता बेहद मुश्किल होने वाला है।
जन सुराज का सामाजिक-राजनीतिक असर: क्या अब भी कुछ बचा है?
भले ही पार्टी चुनावी नतीजों में फेल हो गई हो, लेकिन:
✔ ग्रामीण इलाकों में पार्टी की चर्चा बढ़ी
✔ युवाओं में PK की छवि साफ-सुथरी नेता की बनी
✔ संगठन का एक न्यूनतम ढांचा खड़ा हुआ
✔ बिहार में "विकास आधारित" राजनीति की बात को बल मिला
यदि PK इन बिंदुओं को मजबूत कर पाते हैं और 2–3 वर्षों तक लगातार जमीन पर काम करते हैं, तो भविष्य में उन्हें लाभ हो सकता है।
निष्कर्ष — क्या जन सुराज NOTA से भी नीचे?
अब तक मिले संकेत साफ बताते हैं:
- पार्टी का वोट शेयर बेहद कम है
- कई सीटों पर उम्मीदवार को 500 से भी कम वोट मिले
- NOTA (1.83%) भी इससे ऊपर दिख रहा है
इससे यह साफ होता है कि जन सुराज की पहली चुनावी परीक्षा बेहद निराशाजनक रही है।
लेकिन राजनीति में शुरुआत हमेशा कठिन होती है।
PK की राजनीतिक यात्रा अभी लंबी है और यह हार उनके लिए एक बड़ा सबक भी साबित हो सकती है।
TheTrendingPeople.com की राय में
जन सुराज का खराब प्रदर्शन यह बताता है कि बिहार की राजनीति में सिर्फ रणनीति, शोध और हाई-टेक कैंपेन काफी नहीं होते।
जमीनी नेटवर्क, जातीय समीकरण और मजबूत नेतृत्व—ये तीन चीजें सफलता की कुंजी हैं।
PK अगर ये तीनों मजबूत कर लें, तो आने वाले वर्षों में जन सुराज एक असरदार राजनीतिक शक्ति बन सकती है—लेकिन 2025 का चुनाव उनके लिए एक कड़वा सच लेकर आया है।
