होली का पर्व पूरे भारत में धूमधाम से मनाया जाता है, लेकिन पश्चिम बंगाल में इसे एक अनूठे अंदाज में मनाया जाता है। यहां इसे "दोल उत्सव" या "दोल जात्रा" कहा जाता है, जो न केवल रंगों का उत्सव है, बल्कि राधा-कृष्ण के प्रेम और बसंत के स्वागत का भी प्रतीक है।
पश्चिम बंगाल में दोल उत्सव क्यों खास है?
भारत के अन्य राज्यों में होली होलिका दहन के अगले दिन मनाई जाती है, लेकिन पश्चिम बंगाल में इसे होलिका दहन के दिन ही मनाने की परंपरा है। बंगाल में यह पर्व भक्त प्रह्लाद और हिरण्यकश्यप की कथा से अधिक राधा-कृष्ण की प्रेम लीलाओं से जुड़ा हुआ है।
दोल उत्सव के पीछे की पौराणिक कथा
पौराणिक मान्यता के अनुसार, श्रीकृष्ण ने राधा के प्रति अपने प्रेम को प्रकट करने के लिए उनके चेहरे पर फाग (गुलाल) मल दिया था। उस समय राधा अपनी सखियों के साथ झूला झूल रही थीं। बांग्ला में "दोल" का अर्थ झूला होता है, और यहीं से "दोल जात्रा" की परंपरा शुरू हुई। इसके बाद सखियों ने राधा-कृष्ण को डोली में बिठाकर पूरे गांव में घुमाया, जिससे यह उत्सव धीरे-धीरे एक परंपरा बन गया।
बसंत का स्वागत और फसल कटाई का जश्न
बंगाल में दोल उत्सव केवल पौराणिक कथाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बसंत ऋतु के आगमन और रबी की फसल कटने का भी उत्सव है। इसीलिए इसे बंगाल के "बसंतोत्सव" के रूप में भी मनाया जाता है।
बंगाल में दोल उत्सव के विभिन्न रूप
1. शांतिनिकेतन की होली: वसंतोत्सव का रंगीन नजारा
बीरभूम जिले के शांतिनिकेतन में कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा स्थापित विश्व भारती विश्वविद्यालय दोल उत्सव को खास बनाता है। यहां यह उत्सव "वसंतोत्सव" के रूप में मनाया जाता है।
- इस दिन छात्र-छात्राएं पीले रंग के पारंपरिक वस्त्र पहनते हैं।
- होली के गीत गाते हुए पूरे परिसर में रंगों से खेलते हैं।
- सांस्कृतिक कार्यक्रमों और नृत्य-गायन का आयोजन किया जाता है।
2. जोड़ासांको ठाकुरबाड़ी में दोल उत्सव
कोलकाता स्थित "रवींद्र भारती विश्वविद्यालय" में भी शांतिनिकेतन की तर्ज पर दोल उत्सव मनाया जाता है। अंतर यह है कि यहां यह होली के दो-तीन दिन पहले से ही शुरू हो जाता है।
- यहां वर्ष 1962 में पहली बार बसंतोत्सव और दोल उत्सव मनाने की परंपरा शुरू हुई थी।
- इस दौरान नाटक, संगीत और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।
3. बांकुड़ा का गोकुलचंद मंदिर और विष्णुपुर का गुप्त वृंदावन
- गोकुलनगर स्थित गोकुलचंद मंदिर में दोल के दिन भगवान कृष्ण की मूर्ति को विशेष पूजा के लिए रखा जाता है।
- सालभर यह प्रतिमा विष्णुपुर के मल्ला राजाओं के महल (मल्लाराजबाड़ी) में रहती है।
- दोल उत्सव के बाद पुलिस सुरक्षा में इस मूर्ति को फिर से महल पहुंचा दिया जाता है।
4. शांतिपुर के श्यामचंद मंदिर में दोल उत्सव
नदिया जिले के श्यामचंद मंदिर में दोल उत्सव के अवसर पर एक दिवसीय विशाल मेले का आयोजन किया जाता है।
- यहां यह उत्सव पूर्णिमा से रामनवमी तक चलता है।
- श्रद्धालु इस दौरान भजन-कीर्तन और विशेष पूजन अनुष्ठान करते हैं।
दोल उत्सव 2025: कब और कैसे मनाया जाएगा?
दोल उत्सव 2025 में 13 मार्च को मनाया जाएगा, जबकि भारत के अन्य हिस्सों में होली 14 मार्च को खेली जाएगी।
- बंगाल में इस दिन सुबह से ही राधा-कृष्ण की शोभायात्राएं निकाली जाती हैं।
- श्रद्धालु मंदिरों में विशेष पूजा करते हैं और गुलाल उड़ाकर उत्सव का आनंद लेते हैं।
- शाम को संकीर्तन और भजन गाते हुए दोल यात्रा निकाली जाती है।
निष्कर्ष
पश्चिम बंगाल का दोल उत्सव केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि राधा-कृष्ण के प्रेम, बसंत ऋतु के आगमन और कृषि समृद्धि का उत्सव है। शांतिनिकेतन से लेकर जोड़ासांको और बांकुड़ा तक, बंगाल के हर कोने में इसे अनूठे अंदाज में मनाया जाता है।
यदि आप होली के इस रंगीन रूप को करीब से देखना चाहते हैं, तो इस बार शांतिनिकेतन या विष्णुपुर का रुख जरूर करें और दोल उत्सव की भव्यता का आनंद लें!
📢 Disclaimer:
यह लेख केवल जानकारी देने के उद्देश्य से लिखा गया है