सुप्रीम कोर्ट का फैसला: वोटर लिस्ट याचिका पर सुनवाई से इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। यह याचिका 13 लोगों की ओर से विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के तहत दाखिल की गई थी।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने याचिका को “समय पूर्व” बताते हुए खारिज कर दिया।
कोर्ट ने क्या कहा?
अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता पहले ही अपीलीय न्यायाधिकरणों के पास जा चुके हैं, इसलिए इस स्तर पर सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप उचित नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की है।
पीठ ने यह भी कहा कि चुनाव प्रक्रिया में इस समय किसी तरह की बाधा नहीं डाली जा सकती।
34 लाख से ज्यादा अपील लंबित
सुनवाई के दौरान बताया गया कि 11 अप्रैल तक पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से नाम हटाने के खिलाफ 34 लाख 35 हजार से ज्यादा अपीलें दायर की गई हैं। निर्वाचन आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने बताया कि इन अपीलों का निपटारा विभिन्न न्यायाधिकरणों में किया जा रहा है।
हाईकोर्ट ने बनाए 19 ट्रिब्यूनल
कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने इस मामले की सुनवाई के लिए 19 विशेष न्यायाधिकरण बनाए हैं। इनकी अध्यक्षता पूर्व मुख्य न्यायाधीशों और वरिष्ठ न्यायाधीशों द्वारा की जा रही है।
कोर्ट ने कहा कि प्रत्येक ट्रिब्यूनल के पास एक लाख से अधिक मामलों का बोझ है, इसलिए समयसीमा तय करना व्यावहारिक नहीं होगा।
मतदान से पहले बढ़ी चिंता
पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव का पहला चरण 23 अप्रैल को होना है, ऐसे में यह मुद्दा और संवेदनशील हो गया है। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि नाम हटाने में उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि वोट देने का अधिकार केवल कानूनी नहीं, बल्कि लोकतंत्र का भावनात्मक आधार भी है। उन्होंने जोर दिया कि मतदाताओं को दो संवैधानिक संस्थाओं के बीच नहीं फंसना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि फिलहाल न्यायिक प्रक्रिया जारी रहेगी और याचिकाकर्ताओं को ट्रिब्यूनल के माध्यम से ही राहत लेनी होगी।
यह मामला भारतीय लोकतंत्र के एक अहम पहलू को सामने लाता है—मतदान का अधिकार। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला प्रक्रिया को प्राथमिकता देता है, लेकिन साथ ही यह भी जरूरी है कि अपीलों का निपटारा समय पर हो ताकि कोई भी योग्य मतदाता अपने अधिकार से वंचित न रहे। चुनाव के समय ऐसे मामलों में पारदर्शिता और तेजी दोनों जरूरी हैं, ताकि लोकतंत्र की विश्वसनीयता बनी रहे।
