खाशाबा जाधव को पद्म विभूषण देने पर हाई कोर्ट सख्त
नेशनल डेस्क। बंबई हाई कोर्ट ने भारत के खेल इतिहास के गुमनाम नायक खाशाबा दादासाहेब जाधव को मरणोपरांत पद्म विभूषण देने के मामले में केंद्र सरकार को कड़ी हिदायत दी है। अदालत ने साफ कहा है कि इस मुद्दे पर 4 मई तक अंतिम निर्णय लिया जाए। अदालत के इस रुख के बाद यह उम्मीद मजबूत हुई है कि 1952 में देश का नाम रोशन करने वाले इस महान पहलवान को आखिरकार उचित सम्मान मिल सकता है।
अदालत की टिप्पणी और सख्त निर्देश
न्यायमूर्ति माधव जामदार और न्यायमूर्ति प्रवीण पाटिल की पीठ ने ‘कुश्तीवीर खाशाबा जाधव फाउंडेशन’ की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र को स्पष्ट निर्देश दिए। अदालत ने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि जाधव स्वतंत्र भारत के पहले ऐसे खिलाड़ी थे जिन्होंने व्यक्तिगत स्पर्धा में ओलंपिक पदक जीता।
पीठ ने गृह मंत्रालय के पद्म पुरस्कार प्रकोष्ठ को निर्देश दिया कि पुराने आवेदनों की समीक्षा की जाए और वर्तमान परिस्थितियों के आधार पर नया फैसला लिया जाए। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि इतने बड़े योगदान के बावजूद उन्हें उचित मान्यता नहीं मिलना गंभीर मुद्दा है।
कौन थे खाशाबा जाधव?
1952 हेलसिंकी ओलंपिक में जाधव ने कुश्ती की बेंटमवेट श्रेणी में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रच दिया था। वे स्वतंत्र भारत के पहले व्यक्तिगत ओलंपिक पदक विजेता बने। सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने देश का गौरव बढ़ाया।
हालांकि, उनके योगदान के मुकाबले उन्हें लंबे समय तक वह सम्मान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे। 1984 में उनका निधन हो गया और 2001 में उन्हें मरणोपरांत अर्जुन पुरस्कार दिया गया, जिसे कई लोगों ने अपर्याप्त माना।
बेटे की लड़ाई और अदालत तक पहुंचा मामला
जाधव के बेटे रणजीत जाधव ने अपने पिता को सम्मान दिलाने के लिए ‘कुश्तीवीर खाशाबा जाधव फाउंडेशन’ की स्थापना की। याचिका में कहा गया कि परिवार ने कई बार केंद्र सरकार को आवेदन दिए, लेकिन हर बार उन्हें नजरअंदाज किया गया।
आखिरकार न्याय पाने के लिए अदालत का रुख किया गया। अब हाई कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 5 मई को तय की है।
आगे क्या?
अब सभी की निगाहें 4 मई पर टिकी हैं, जब केंद्र सरकार को अपना अंतिम निर्णय देना है। यदि सरकार सकारात्मक फैसला लेती है, तो यह न केवल जाधव के सम्मान की बहाली होगी बल्कि भारतीय खेल इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय को न्याय भी मिलेगा।
हमारी राय में
खाशाबा जाधव जैसे खिलाड़ियों को सम्मान देना केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं, बल्कि देश के खेल इतिहास और संघर्ष की पहचान है। दशकों तक उपेक्षित रहने के बाद यदि उन्हें पद्म विभूषण मिलता है, तो यह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनेगा। सरकार के सामने अब एक ऐतिहासिक अवसर है कि वह इस चूक को सुधारते हुए सही संदेश दे।