होली से पहले बाजार में प्राकृतिक रंगों की धूम, नागपुर का इको-फ्रेंडली गुलाल चर्चा में
होली का त्योहार करीब आते ही देशभर के रंग बाजारों में रौनक बढ़ गई है। इस बार खास चर्चा नागपुर के इको-फ्रेंडली गुलाल की हो रही है, जिसे प्राकृतिक सामग्री से तैयार किया जाता है और जो त्वचा व पर्यावरण दोनों के लिए सुरक्षित माना जा रहा है। विदर्भ के अलावा मध्य भारत के कई शहरों में इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है। केमिकल युक्त रंगों से होने वाले नुकसान को लेकर बढ़ती जागरूकता ने प्राकृतिक गुलाल को बाजार में मजबूत विकल्प बना दिया है।
पुश्तैनी विरासत से जुड़ा व्यवसाय
नागपुर के आदमने परिवार की तीसरी पीढ़ी इस पारंपरिक गुलाल निर्माण को आगे बढ़ा रही है। परिवार का कहना है कि यह कारोबार उनके दादाजी ने शुरू किया था और आज भी उसी पारंपरिक प्रक्रिया के साथ आधुनिक जरूरतों को ध्यान में रखकर उत्पादन किया जा रहा है।
रोशन आदमने ने बताया कि गुलाल बनाने में अरारोट को मुख्य आधार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। इसमें खाद्य ग्रेड और सुरक्षित रंगों का मिश्रण किया जाता है और किसी भी तरह के हानिकारक केमिकल का उपयोग नहीं किया जाता। पानी और रंग मिलाकर मिश्रण तैयार किया जाता है, जिसे धूप में सुखाने के बाद मशीन से छानकर पैक किया जाता है। इस प्रक्रिया से हरा, नीला, लाल और पीला समेत कई आकर्षक रंग तैयार किए जाते हैं।
उत्पादन प्रक्रिया और गुणवत्ता पर जोर
निर्माताओं के अनुसार प्राकृतिक गुलाल तैयार करने में गुणवत्ता और सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाती है। पारंपरिक विधि से बने रंग हल्के होते हैं, त्वचा पर आसानी से उतर जाते हैं और पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाते। विशेषज्ञों का मानना है कि खाद्य-ग्रेड रंगों का उपयोग त्वचा एलर्जी और आंखों में जलन जैसी समस्याओं को कम कर सकता है।
स्थानीय व्यापारियों का कहना है कि त्योहार के समय ग्राहक अब उत्पाद की गुणवत्ता और सामग्री के बारे में पहले से अधिक जानकारी मांगते हैं। यही कारण है कि प्राकृतिक रंगों का बाजार लगातार बढ़ रहा है।
मांग में बढ़ोतरी के पीछे कारण
प्राकृतिक गुलाल की बढ़ती लोकप्रियता के पीछे कई कारण हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञ लंबे समय से रासायनिक रंगों से होने वाले त्वचा संक्रमण और एलर्जी के प्रति चेतावनी देते रहे हैं। इसके अलावा पर्यावरण संरक्षण को लेकर जागरूकता भी बढ़ी है, जिससे लोग सुरक्षित विकल्प की ओर रुख कर रहे हैं।
रोशन आदमने ने बताया कि उनका गुलाल विदर्भ के अलावा छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के अन्य हिस्सों में भी भेजा जाता है। दूसरे राज्यों से मांग आने पर सप्लाई का दायरा बढ़ाया जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि इस वर्ष बाजार में गुलाल की कीमत अपेक्षाकृत कम है, जिससे ग्राहकों को राहत मिली है और खरीदारी बढ़ी है।
बाजार और विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया
व्यापारियों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में इको-फ्रेंडली उत्पादों की मांग में निरंतर वृद्धि देखी गई है। त्योहारों के दौरान यह रुझान और स्पष्ट दिखाई देता है। शिक्षा संस्थानों और सामाजिक संगठनों द्वारा भी सुरक्षित होली मनाने के संदेश ने प्राकृतिक रंगों को लोकप्रिय बनाने में भूमिका निभाई है।
पर्यावरण विशेषज्ञ मानते हैं कि प्राकृतिक गुलाल छोटे उद्यमों के लिए अवसर भी पैदा कर रहा है। इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार बढ़ता है और पारंपरिक उद्योगों को नई पहचान मिलती है।
त्योहार, परंपरा और टिकाऊ विकल्प
होली भारतीय संस्कृति का रंगों से जुड़ा प्रमुख त्योहार है और बदलते समय के साथ इसे मनाने के तरीके भी विकसित हो रहे हैं। इको-फ्रेंडली गुलाल पारंपरिक उत्सव को बनाए रखते हुए स्वास्थ्य और पर्यावरण की सुरक्षा सुनिश्चित करने का प्रयास माना जा रहा है।
नागपुर का प्राकृतिक गुलाल इस बदलाव का उदाहरण बनकर उभरा है, जहां पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक जागरूकता का संयोजन दिखाई देता है। बाजार में रंग-बिरंगे प्राकृतिक गुलाल के ढेर यह संकेत दे रहे हैं कि उपभोक्ता अब सुरक्षित और टिकाऊ विकल्प को प्राथमिकता दे रहे हैं।
संपादकीय विश्लेषण
नागपुर का इको-फ्रेंडली गुलाल त्योहारों के बाजार में बदलती उपभोक्ता सोच का संकेत देता है। स्वास्थ्य और पर्यावरण के प्रति बढ़ती जागरूकता पारंपरिक उद्योगों को नई दिशा दे रही है। छोटे स्तर के निर्माताओं के लिए यह अवसर है कि वे गुणवत्ता और पारदर्शिता के जरिए व्यापक बाजार तक पहुंच बनाएं।
यदि प्राकृतिक उत्पादों को प्रोत्साहन और वितरण नेटवर्क का समर्थन मिलता है, तो यह मॉडल देश के अन्य क्षेत्रों में भी अपनाया जा सकता है। सुरक्षित रंगों की ओर बढ़ता रुझान बताता है कि त्योहारों की खुशी अब टिकाऊ विकल्पों के साथ जुड़ती जा रही है, जो समाज और पर्यावरण दोनों के लिए सकारात्मक संकेत है।
