यूजीसी नियमों पर सुप्रीम कोर्ट का 'ब्रेक'—अब गूंज रहा सवाल, किसने की ड्राफ्ट से 'छेड़छाड़'? दिग्विजय बोले "हमने नहीं कहा", करण भूषण ने भी झाड़ा पल्ला
नई दिल्ली, दिनांक: 30 जनवरी 2026 — देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए लाए गए यूजीसी के नए नियमों पर मचा घमासान अब सुप्रीम कोर्ट की दहलीज से होते हुए एक बड़े राजनीतिक और प्रशासनिक विवाद में बदल गया है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए त्वरित सुनवाई करते हुए यूजीसी के 'इक्विटी रेगुलेशंस 2026' पर तत्काल प्रभाव से रोक (Stay) लगा दी है। कोर्ट की यह टिप्पणी कि "ये नियम अस्पष्ट (Vague) हैं और इनके दुरुपयोग की प्रबल आशंका है," सरकार और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के लिए एक बड़ा झटका है। कोर्ट ने केंद्र को निर्देश दिया है कि फिलहाल 2012 के पुराने नियम ही लागू रहेंगे और नियमों को दोबारा ड्राफ्ट करने के लिए विशेषज्ञों की एक कमेटी बनाई जाए।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर यूजीसी के नियमों में वह विवादास्पद बदलाव किसने किया, जिस पर पूरे देश में बवाल मच गया? छात्रों से लेकर राजनीतिक नेताओं तक, हर कोई यह जानना चाहता है कि फरवरी 2025 में जारी ड्राफ्ट और जनवरी 2026 में जारी अंतिम नियमों के बीच जमीन-आसमान का अंतर कैसे आ गया। विशेष रूप से फर्जी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों पर सजा के प्रावधान को हटाने का फैसला किसका था? अब गेंद शिक्षा मंत्रालय और यूजीसी के पाले में है, लेकिन इस बीच संसदीय समिति के सदस्यों की सफाई ने मामले को और पेचीदा बना दिया है।
इस विवाद की जड़ में वह बदलाव है जिसने सामान्य वर्ग के छात्रों और शिक्षकों के मन में डर पैदा कर दिया है। दरअसल, फरवरी 2025 में जारी ड्राफ्ट में स्पष्ट प्रावधान था कि यदि कोई छात्र जातिगत भेदभाव की झूठी शिकायत करता है, तो उस पर जुर्माना या अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। यह प्रावधान 'चेक एंड बैलेंस' के लिए जरूरी था ताकि कानून का हथियार के रूप में दुरुपयोग न हो। लेकिन जनवरी 2026 में जब अंतिम नियम अधिसूचित हुए, तो यह प्रावधान पूरी तरह गायब था। इसके साथ ही भेदभाव की परिभाषा को केवल एससी, एसटी और ओबीसी तक सीमित कर दिया गया। इस बदलाव ने कैंपसों में विरोध की आग भड़का दी, सोशल मीडिया पर #RollbackUGC ट्रेंड हुआ और कई जगहों पर भाजपा नेताओं के इस्तीफे तक की नौबत आ गई।
अब इस मामले में राजनीति भी तेज हो गई है। कांग्रेस सांसद और शिक्षा पर बनी संसदीय स्थायी समिति के चेयरमैन दिग्विजय सिंह ने फेसबुक पर एक विस्तृत सफाई जारी की है। उन्होंने दावा किया कि उनकी अध्यक्षता वाली समिति ने कभी भी फर्जी शिकायत पर सजा हटाने की सिफारिश नहीं की थी। दिग्विजय सिंह ने खुलासा किया कि समिति ने दो महत्वपूर्ण सुझाव दिए थे। पहला यह कि भेदभाव की परिभाषा में स्पष्ट उदाहरण और एक विस्तृत सूची शामिल की जाए ताकि कोई भ्रम न रहे। दूसरा, इक्विटी कमेटियों में एससी/एसटी/ओबीसी की 50% से अधिक भागीदारी सुनिश्चित की जाए। उनका आरोप है कि यूजीसी ने इन सुझावों को तो नहीं माना, लेकिन अपनी तरफ से ऐसे बदलाव कर दिए जिनसे विवाद पैदा हो गया। सिंह का कहना है कि फर्जी केस का डर यूजीसी के इसी एकतरफा फैसले से पैदा हुआ है। उन्होंने अब यूजीसी और शिक्षा मंत्रालय पर जिम्मेदारी डालते हुए स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है।
दूसरी ओर, सत्ताधारी दल भाजपा के सांसद करण भूषण सिंह ने भी इस विवाद से अपना पल्ला झाड़ लिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे समिति की उस बैठक में उपस्थित नहीं थे और न ही उन्होंने ऐसे किसी दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए हैं जो समाज में विभाजन पैदा करे। करण भूषण ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर लिखा कि संसदीय समिति का इन विवादास्पद नियमों के निर्माण में कोई योगदान नहीं है। उन्होंने यूजीसी को नसीहत देते हुए कहा कि जनभावना का सम्मान करते हुए सुधार करना चाहिए ताकि जातिगत वैमनस्यता न फैले। उनका बयान यह दर्शाता है कि भाजपा भी इस मुद्दे पर बैकफुट पर है और खुद को इस निर्णय से अलग दिखाना चाहती है।
अब यक्ष प्रश्न यह है कि अगर संसदीय समिति ने सिफारिश नहीं की, तो छेड़छाड़ कहां हुई? दिग्विजय सिंह की समिति, जिसमें करीब 30-31 सांसद थे और जिसमें भाजपा के 16 सदस्य (जैसे रविशंकर प्रसाद, अनुराग ठाकुर, पीयूष गोयल) शामिल थे, ने सर्वसम्मति से रिपोर्ट दी थी। उस रिपोर्ट में ओबीसी को शामिल करने और दिव्यांगता को आधार बनाने जैसी बातें थीं, लेकिन दंडात्मक प्रावधान हटाने की बात नहीं थी। यह बदलाव स्पष्ट रूप से यूजीसी या शिक्षा मंत्रालय के स्तर पर अंतिम ड्राफ्टिंग के दौरान हुआ है। यह विवाद अब केवल नियमों का नहीं, बल्कि 'सामाजिक न्याय' बनाम 'दुरुपयोग की आशंका' का बन गया है। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से उम्मीद जगी है कि अब एक संतुलित समाधान निकलेगा, लेकिन तब तक सरकार को छात्रों का भरोसा बहाल करने के लिए कड़े सवालों का जवाब देना होगा।
हमारी राय (The Trending People Analysis)
सुप्रीम कोर्ट द्वारा यूजीसी के नियमों पर रोक लगाना भारतीय न्यायपालिका की सतर्कता का प्रमाण है। कोर्ट ने सही पहचाना कि अस्पष्ट कानून न्याय नहीं, बल्कि अन्याय का कारण बनते हैं। 'फर्जी शिकायत' पर सजा का प्रावधान हटना किसी भी कानून के नैसर्गिक न्याय (Natural Justice) के सिद्धांत के खिलाफ है।
The Trending People का विश्लेषण है कि यह पूरा प्रकरण नौकरशाही की मनमानी और राजनीतिक निरीक्षण (Political Oversight) की कमी का नतीजा है। जब संसदीय समिति सर्वसम्मति से कोई राय देती है, तो एक स्वायत्त संस्था (UGC) उसे दरकिनार कर अपने नियम कैसे थोप सकती है? सरकार को यह जांच करानी चाहिए कि किसके आदेश पर 'सजा के प्रावधान' को हटाया गया। शिक्षा के मंदिर को जातिगत युद्ध का अखाड़ा बनने से रोकना सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। अब समय है कि एक ऐसी विशेषज्ञ समिति बने जो सभी पक्षों—छात्रों, शिक्षकों और समाज—की बात सुनकर एक समावेशी नियम बनाए।
