क्या अमेरिका ने बदल लिया है अपना 'चश्मा'? भारत अब रणनीतिक साझेदार नहीं, 'आर्थिक प्रतिद्वंद्वी' है—रूसी तेल के बहाने नई घेराबंदी का सच
नई दिल्ली/वाशिंगटन, दिनांक: 30 जनवरी 2026 — भारत और अमेरिका के रिश्तों में आई हालिया तल्खी ने कूटनीतिक गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है। सतह पर यह मामला 'रूसी तेल' (Russian Oil) की खरीद और व्यापार संतुलन का दिखता है, लेकिन गहराई में जाने पर एक बड़ा और चिंताजनक भू-राजनीतिक बदलाव (Geopolitical Change) नजर आता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन द्वारा भारतीय निर्यात पर लगाए गए भारी-भरकम टैरिफ और तीखी बयानबाजी को केवल एक व्यापारिक विवाद मानना भूल होगी। सामरिक मामलों के जानकार और वरिष्ठ विश्लेषकों का मानना है कि वाशिंगटन ने नई दिल्ली को देखने का अपना नजरिया बदल लिया है। जिस भारत को वह कल तक एशिया में चीन के खिलाफ अपना सबसे बड़ा 'रणनीतिक साझेदार' (Strategic Partner) बताता था, आज उसी भारत को वह एक संभावित 'आर्थिक प्रतिद्वंद्वी' के रूप में देख रहा है—एक ऐसा प्रतिद्वंद्वी जिसे समय रहते 'कंट्रोल' करना जरूरी समझा जा रहा है।
इस बदलते परिदृश्य की सबसे सटीक व्याख्या सामरिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी (Brahma Chellaney) ने की है। उन्होंने अमेरिकी ट्रेड रिप्रजेंटेटिव (USTR) जेमिसन ग्रीर के उस हालिया बयान का हवाला दिया, जिसमें ग्रीर ने कहा था कि रूसी तेल की खरीद कम करने के मामले में भारत को अभी लंबा सफर तय करना है। चेलानी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर लिखा कि इस बयान का सीधा और स्पष्ट मतलब यह है कि अमेरिका भारतीय निर्यात पर लगाए गए 50% टैरिफ और 25% की पेनल्टी को अभी हटाने वाला नहीं है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या मुद्दा वाकई रूसी तेल है? अगर रूसी तेल ही अमेरिका की नाराजगी की असली वजह होती, तो उसका डंडा सबसे पहले चीन पर चलना चाहिए था, जो आज भी रूसी तेल का दुनिया में सबसे बड़ा खरीदार है। या फिर अमेरिका को यूरोपीय यूनियन (EU) के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए थी, जो ऊर्जा के लिए रूस पर दूसरा सबसे बड़ा निर्भर गुट है।
हकीकत यह है कि अमेरिका ने चीन और यूरोप के साथ ऐसा कोई सख्त कदम नहीं उठाया। इसके बजाय, ट्रंप प्रशासन ने यूरोप को एक बेहद आरामदायक 'ट्रांजिशन पीरियड' दिया है। उन्हें कहा गया है कि वे 2028 की शुरुआत तक धीरे-धीरे रूसी गैस का आयात बंद करें। यह दोहरा मापदंड अमेरिकी मंशा की पोल खोलता है। यूरोप को अपनी ऊर्जा जरूरतों को व्यवस्थित करने के लिए 2 से 3 साल का वक्त दिया जाना और भारत पर रातों-रात 50% का टैरिफ थोप देना—यह भेदभाव स्पष्ट करता है कि वाशिंगटन की प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं। ब्रह्मा चेलानी का मानना है कि ये टैरिफ एक 'राजनीतिक संकेत' (Political Signal) हैं। वाशिंगटन अब उभरते हुए भारत को एक सहयोगी के रूप में नहीं, बल्कि एक चुनौती के रूप में देख रहा है।
पिछले दो दशकों का इतिहास देखें तो चाहे वह जॉर्ज बुश का प्रशासन हो, बराक ओबामा का हो या जो बाइडन का, सभी ने भारत को चीन के खिलाफ एक आवश्यक 'काउंटरवेट' (Counterweight) के रूप में देखा और भारत के उदय में मदद की। परमाणु समझौते से लेकर रक्षा साझेदारी तक, अमेरिका भारत के साथ खड़ा दिखा। लेकिन अब ऐसा लगता है कि अमेरिका को यह महसूस होने लगा है कि भारत कुछ ज्यादा ही तेजी से और अपनी शर्तों पर आगे बढ़ रहा है। भारत की 'आत्मनिर्भरता' की नीति, अपनी मुद्रा में व्यापार करने की कोशिशें और गुटनिरपेक्षता की आधुनिक व्याख्या अमेरिका को खटकने लगी है। इतिहास गवाह है कि अमेरिका कभी भी किसी दूसरी शक्ति को अपने बराबर खड़ा होना पसंद नहीं करता। 1980 के दशक में जब जापान की अर्थव्यवस्था अमेरिका को चुनौती देने लगी थी, तो अमेरिका ने उसके खिलाफ भी व्यापार युद्ध छेड़ दिया था। 2000 के दशक में चीन के साथ भी यही हुआ। और अब, शायद भारत की बारी है।
भारत की स्वतंत्र विदेश नीति, जिसमें वह रूस और अमेरिका दोनों के साथ संतुलन बनाकर चलता है, वाशिंगटन के 'जीरो सम गेम' (Zero Sum Game) में फिट नहीं बैठती। अमेरिका चाहता है कि भारत पूरी तरह उसके खेमे में रहे और उसके आदेशों का पालन करे, ठीक वैसे ही जैसे उसके कई यूरोपीय और एशियाई सहयोगी करते हैं। लेकिन भारत का कद और उसकी वैश्विक महत्वाकांक्षाएं उसे किसी का पिछलग्गू बनने से रोकती हैं। रूसी तेल का मुद्दा तो बस एक बहाना है, असली डर भारत की बढ़ती आर्थिक ताकत और ग्लोबल साउथ (Global South) में उसकी आवाज बनने की क्षमता से है।
हमारी राय (The Trending People Analysis)
भारत और अमेरिका के रिश्ते एक नाजुक मोड़ पर हैं। टैरिफ वार यह बताता है कि दोस्ती अब 'शर्तों' के साथ ही चलेगी। अमेरिका का यह व्यवहार उसकी असुरक्षा को दर्शाता है। एक तरफ उसे चीन को रोकने के लिए भारत की जरूरत है, तो दूसरी तरफ वह भारत को इतना बड़ा भी नहीं होने देना चाहता कि वह खुद अमेरिका के लिए चुनौती बन जाए।
The Trending People का विश्लेषण है कि भारत को इस दबाव के आगे झुकने के बजाय अपनी आर्थिक कूटनीति को और धारदार बनाना होगा। हमें नए बाजार तलाशने होंगे और घरेलू विनिर्माण को इतना मजबूत करना होगा कि टैरिफ का असर कम हो सके। यह एक 'टेस्ट' है कि क्या भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) को बरकरार रख पाता है। अमेरिका को भी यह समझना होगा कि भारत जापान या यूरोप नहीं है; यह एक सभ्यतागत राष्ट्र है जो सम्मान के साथ ही साझेदारी निभा सकता है, दबाव में नहीं।
