दलाल स्ट्रीट पर विदेशी निवेशकों का 'यू-टर्न'—जनवरी में 3 अरब डॉलर की महा-बिकवाली, अगस्त के बाद सबसे बड़ा झटका, क्या भारत से रूठ गए हैं FPI?
नई दिल्ली/मुंबई, दिनांक: 22 जनवरी 2026 — भारतीय शेयर बाजार, जो पिछले कुछ वर्षों से विदेशी निवेशकों का पसंदीदा गंतव्य बना हुआ था, नए साल की शुरुआत में एक अजीब स्थिति का सामना कर रहा है। जनवरी 2026 के आंकड़े भारतीय नीति निर्माताओं और बाजार विश्लेषकों के माथे पर चिंता की लकीरें खींचने के लिए काफी हैं। इस महीने भारत के सूचीबद्ध शेयरों से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की बिकवाली का आंकड़ा 3 अरब अमेरिकी डॉलर के खतरनाक स्तर को पार कर गया है। यह अगस्त 2025 के बाद से किसी भी एक महीने में दर्ज की गई सबसे बड़ी निकासी है।
यह बिकवाली ऐसे समय में हो रही है जब एशिया के अन्य उभरते बाजार—जैसे दक्षिण कोरिया, ताइवान, इंडोनेशिया और थाईलैंड—विदेशी पूंजी को आकर्षित करने में सफल हो रहे हैं और वहां एफपीआई शुद्ध खरीदार (Net Buyers) बने हुए हैं। आखिर ऐसा क्या हुआ कि दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक भारत से विदेशी पैसा अचानक बाहर जा रहा है? आइए इसके पीछे के आर्थिक और भू-राजनीतिक कारणों की पड़ताल करते हैं।
क्यों हो रहा है निवेशकों का मोहभंग? तीन बड़े कारण
बाजार के दिग्गज और आर्थिक विश्लेषक इस भारी बिकवाली के पीछे मुख्य रूप से तीन बड़ी वजहों को जिम्मेदार मान रहे हैं। सबसे पहला और बड़ा कारण भारत और अमेरिका के बीच बहुप्रतीक्षित व्यापार समझौते (Trade Deal) में किसी ठोस प्रगति का न होना है। निवेशकों को उम्मीद थी कि दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार की बाधाएं दूर होंगी, लेकिन बातचीत की सुस्त रफ्तार ने उत्साह को ठंडा कर दिया है। दूसरा कारण भारतीय कंपनियों की आय वृद्धि (Earnings Growth) में आई सुस्ती है, जो बाजार के महंगे वैल्युएशन को सही ठहराने में नाकाम साबित हो रही है। तीसरा और तकनीकी कारण यह है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जुड़े शेयरों में जो वैश्विक तेजी देखी जा रही है, उसमें भारत की भागीदारी सीमित है। ताइवान और कोरिया जैसे बाजार चिप मेकिंग और एआई हार्डवेयर के दम पर विदेशी पैसा खींच रहे हैं, जबकि भारत इस दौड़ में अभी पीछे है।
इसके अलावा, आगामी आम बजट (Union Budget) से पहले किसी बड़े नीतिगत बदलाव की सीमित संभावना ने भी निवेशकों को सतर्क (Cautious) कर रखा है। बाजार को डर है कि सरकार लोकलुभावन घोषणाओं के चक्कर में राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) को बढ़ा सकती है।
तिमाही नतीजों ने बढ़ाई चिंता: मुनाफे की रफ्तार हुई धीमी
विदेशी निवेशकों की चिंता को हवा देने का काम वित्त वर्ष 2026 की तीसरी तिमाही (Q3 FY26) के शुरुआती नतीजों ने किया है। अब तक जिन 143 प्रमुख कंपनियों ने अपने नतीजे घोषित किए हैं, उनका संयुक्त शुद्ध लाभ (Net Profit) पिछले साल की समान अवधि की तुलना में सिर्फ 3.5 फीसदी बढ़ा है। यह आंकड़ा निराशाजनक है क्योंकि वित्त वर्ष 2025 की तीसरी तिमाही में यह वृद्धि 11.2 फीसदी और वित्त वर्ष 2026 की दूसरी तिमाही में 10.1 फीसदी थी। मुनाफे की यह गिरती दर बता रही है कि कंपनियों के मार्जिन पर दबाव है और मांग में नरमी आ रही है।
एक्सपर्ट व्यू: महंगा बाजार और कमजोर रुपया
मार्सेलस इन्वेस्टमेंट मैनेजर्स के संस्थापक सौरभ मुखर्जी का विश्लेषण इस स्थिति को और स्पष्ट करता है। उनका मानना है कि एफपीआई की चिंता का मुख्य कारण पिछले दो वर्षों से आय वृद्धि का मामूली रहना है। डॉलर के संदर्भ में देखें तो भारत की आय वृद्धि बेहद सीमित रही है, जबकि बाजार एक साल के अग्रिम लाभ (Forward Earnings) के लगभग 20 गुना के महंगे स्तर पर कारोबार कर रहा है। जब ग्रोथ नहीं होती और वैल्युएशन महंगा होता है, तो स्मार्ट पैसा बाहर निकलने लगता है।
इसके साथ ही, मुद्रा बाजार की हलचल ने भी आग में घी का काम किया है। पिछले एक साल में भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले करीब 5 फीसदी कमजोर हुआ है। विदेशी निवेशकों के लिए कमजोर करेंसी का मतलब है कि उनके डॉलर रिटर्न में कमी आना, जो उन्हें बिकवाली के लिए प्रेरित करता है।
घरेलू निवेशकों ने संभाला मोर्चा: डीआईआई की ताकत
इस पूरे प्रकरण में राहत की बात यह है कि विदेशी बिकवाली के बावजूद बाजार क्रैश नहीं हुआ। इसका श्रेय घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) और आम भारतीय निवेशकों को जाता है। घरेलू इक्विटी निवेश में आई मजबूती ने विदेशी निवेशकों को बाहर निकलने का पर्याप्त अवसर (Exit Route) दिया और कीमतों में ज्यादा व्यवधान नहीं आने दिया। अगर यही बिकवाली 5 साल पहले आती, तो बाजार धड़ाम हो जाता।
ट्रंप टैरिफ का डर: बाजार अभी भी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों को लेकर सशंकित है। अप्रैल 2025 में घोषित टैरिफ पर 90 दिनों का विराम कुछ समय के लिए राहत लाया था, जिसके चलते मार्च से जून के बीच एफपीआई ने खरीदारी की थी। लेकिन अब फिर से भारत पर 50 फीसदी टैरिफ के खतरे और व्यापारिक टकराव की आशंका ने निवेशकों को जोखिम कम करने के लिए प्रेरित किया है। यही वजह है कि अगस्त 2025 के बाद के छह महीनों में से चार महीनों में एफपीआई शुद्ध बिकवाल रहे हैं।
हमारी राय (The Trending People Analysis)
जनवरी 2026 की यह एफपीआई निकासी भारतीय बाजार के लिए एक 'रियलिटी चेक' है। हम केवल 'इंडिया स्टोरी' के भरोसे नहीं रह सकते; कंपनियों को धरातल पर मुनाफा कमाकर दिखाना होगा। 3.5% की प्रॉफिट ग्रोथ एक अलार्म है जिसे इग्नोर नहीं किया जा सकता।
The Trending People का विश्लेषण है कि विदेशी निवेशक अब 'वैल्यू' तलाश रहे हैं। अगर बजट में सरकार ने कैपेक्स (Capex) और मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने वाले ठोस कदम उठाए, तो यह पैसा वापस भी आ सकता है। लेकिन फिलहाल, एआई की दौड़ में पिछड़ना और सुस्त आय वृद्धि भारत के प्रीमियम वैल्युएशन पर सवाल खड़े कर रही है। घरेलू निवेशकों का पैसा बाजार को कब तक थामे रखेगा, यह देखना दिलचस्प होगा, लेकिन लंबी अवधि की तेजी के लिए विदेशी पूंजी का लौटना अनिवार्य है।
