बघेलखंड की रसोई का देसी सुपरफूड: कोमढ़ा की बरी, जो स्वाद के साथ सेहत भी संजोए
सर्दियों की शुरुआत होते ही बघेलखंड की रसोई में एक अलग ही खुशबू फैलने लगती है। यह खुशबू न तो किसी मसाले की होती है और न ही किसी मिठाई की, बल्कि यह खुशबू है कोमढ़ा यानी सफेद कद्दू की बरी की। बघेलखंड में यह सिर्फ एक पारंपरिक व्यंजन नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही एक ऐसी खाद्य परंपरा है, जिसमें स्वाद, पोषण और संरक्षण—तीनों का संतुलन देखने को मिलता है।
आज जब “सुपरफूड” शब्द आधुनिक खान-पान का हिस्सा बन चुका है, तब बघेलखंड की कोमढ़ा की बरी को लोग देसी सुपरफूड कहने लगे हैं। वजह साफ है—यह बिना किसी रसायन या प्रिज़र्वेटिव के सालों तक सुरक्षित रहती है और जरूरत पड़ने पर साधारण भोजन को भी पौष्टिक बना देती है।
ठंड के मौसम से जुड़ी परंपरा
बघेलखंड क्षेत्र में सर्दियों को सिर्फ मौसम नहीं, बल्कि तैयारी का समय माना जाता है। इस दौरान शरीर को अतिरिक्त ऊर्जा और गर्माहट की जरूरत होती है। ऐसे में कोमढ़ा की बरी बनाना यहां लगभग हर घर की नियमित परंपरा है।
स्थानीय लोग बताते हैं कि नवंबर से जनवरी के बीच, जब धूप तेज और हवा शुष्क होती है, तभी बरी सुखाने का सबसे अच्छा समय माना जाता है। यही वजह है कि इस मौसम में छतों और आंगनों में सूखती बरी आम दृश्य बन जाती है।
क्यों खास है कोमढ़ा की बरी
कोमढ़ा की बरी का महत्व सिर्फ स्वाद तक सीमित नहीं है। यह अपने आप में एक संपूर्ण आहार मानी जाती है।
- कोमढ़ा (सफेद कद्दू) में मौजूद फाइबर पाचन को दुरुस्त रखने में मदद करता है।
- उड़द की दाल उच्च गुणवत्ता वाला प्रोटीन देती है, जो शरीर को ताकत और ऊर्जा प्रदान करता है।
- अदरक, जीरा और हींग जैसे मसाले सर्दी-खांसी से बचाव और इम्युनिटी बढ़ाने में सहायक माने जाते हैं।
इसी कारण बघेलखंड के बुजुर्ग इसे आज भी “ठंड का टॉनिक” कहते हैं।
हर घर में बसती परंपरा
स्थानीय निवासी ज्योति तिवारी बताती हैं कि बघेलखंड में नए साल के शुरुआती महीनों में शायद ही कोई ऐसा घर हो, जहां कोमढ़ा की बरी न बनती हो।
उनके अनुसार, “यह बरी पूरे साल काम आती है। अचानक मेहमान आ जाएं या जल्दी में कुछ पौष्टिक बनाना हो, तो दाल, कढ़ी या सब्जी में दो-तीन बरी डाल दीजिए, स्वाद अपने आप बढ़ जाता है।”
यही वजह है कि कोमढ़ा की बरी सिर्फ खाने की चीज नहीं, बल्कि समय की बचत और घरेलू समझदारी का प्रतीक भी है।
घर पर बनाने की आसान विधि
कोमढ़ा की बरी बनाने की प्रक्रिया बेहद सरल है, लेकिन इसमें धैर्य और सफाई का खास ध्यान रखा जाता है।
सबसे पहले उड़द की दाल को 5–6 घंटे या पूरी रात भिगो दिया जाता है। दूसरी ओर सफेद कद्दू को कद्दूकस कर उसका अतिरिक्त पानी निचोड़ लिया जाता है।
भीगी हुई दाल को पीसकर उसमें कद्दूकस किया हुआ कोमढ़ा मिलाया जाता है। फिर अदरक, हरी मिर्च, जीरा, नमक, हींग और हल्के देसी मसाले डालकर मिश्रण को अच्छी तरह फेंटा जाता है।
इसके बाद इस मिश्रण से छोटी-छोटी बरी बनाकर साफ कपड़े या थाली पर धूप में सुखाया जाता है। पूरी तरह सूखने के बाद इन्हें एयरटाइट डिब्बों में भरकर रख लिया जाता है।
लंबी शेल्फ लाइफ, बिना रसायन
कोमढ़ा की बरी की सबसे बड़ी खासियत इसकी लंबी शेल्फ लाइफ है। सही तरीके से सुखाई गई बरी दो से तीन साल तक खराब नहीं होती।
आज जब पैकेट वाले खाद्य पदार्थों में प्रिज़र्वेटिव आम हो गए हैं, तब यह देसी बरी बिना किसी रसायन के सुरक्षित रहना एक बड़ा उदाहरण पेश करती है।
बदलते समय में देसी स्वाद की वापसी
दिलचस्प बात यह है कि अब कोमढ़ा की बरी सिर्फ गांवों तक सीमित नहीं रही। शहरों में रहने वाले युवा भी इसे सेहतमंद विकल्प के रूप में अपनाने लगे हैं।
पोषण विशेषज्ञ मानते हैं कि पारंपरिक व्यंजन, अगर संतुलित मात्रा में खाए जाएं, तो आधुनिक डाइट से कहीं बेहतर साबित हो सकते हैं। कोमढ़ा की बरी इसका जीवंत उदाहरण है।
स्वाद, सेहत और संस्कृति का मेल
दाल हो, कढ़ी हो या सब्जी—कोमढ़ा की बरी हर व्यंजन में अलग पहचान बना लेती है। यह न केवल खाने का स्वाद बढ़ाती है, बल्कि हर निवाले में बघेलखंड की संस्कृति और स्मृतियों को भी जोड़ देती है।
शायद यही वजह है कि यह बरी आज भी लोगों को उनके बचपन, गांव और परिवार की याद दिला देती है।
हमारी राय
कोमढ़ा की बरी यह साबित करती है कि सेहतमंद खाना हमेशा महंगा या विदेशी नहीं होता। बघेलखंड की यह परंपरा स्वाद, पोषण और टिकाऊ जीवनशैली—तीनों का संतुलन सिखाती है। बदलते खान-पान के दौर में ऐसी देसी विरासतों को सहेजना न केवल जरूरी है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक सीख है।

