पत्रकार अजीत अंजुम पर FIR, एडिटर्स गिल्ड और मीडिया संस्थानों ने जताई तीखी आपत्ति
नई दिल्ली, 16 जुलाई — वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम पर दर्ज एफआईआर को लेकर देशभर के प्रमुख मीडिया संगठनों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया और डिजीपब न्यूज इंडिया फाउंडेशन ने इस कार्रवाई को प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला बताया है और इसे वैध पत्रकारिता को अपराध घोषित करने का प्रयास करार दिया है।
अजीत अंजुम, जिनके यूट्यूब चैनल पर 75 लाख से अधिक सब्सक्राइबर्स हैं, पर बिहार में चल रही मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया की रिपोर्टिंग करने के बाद भारतीय न्याय संहिता और 1951 के जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है।
मतदाता सूची में अनियमितताओं को उजागर करने पर दर्ज हुई FIR
शनिवार को अजीत अंजुम ने बिहार के बलिया स्थित एक मतदान केंद्र का दौरा किया था, जहां उन्होंने मतदाता सूची में फॉर्म अधूरे, बिना फोटो या बिना हस्ताक्षर के होने की बात उजागर की थी। उन्होंने इस पूरी रिपोर्ट को अपने यूट्यूब चैनल पर साझा किया।
वीडियो के वायरल होने के बाद, बूथ स्तरीय अधिकारी मोहम्मद अंसारुल हक़ की शिकायत पर अजीत अंजुम के खिलाफ आपराधिक घुसपैठ, सरकारी कार्य में बाधा, और धार्मिक भावनाएं भड़काने जैसे गंभीर आरोपों में एफआईआर दर्ज की गई।
बेगूसराय जिला प्रशासन ने दावा किया है कि अंजुम और उनके सहयोगियों ने बिना अनुमति के सरकारी प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग की थी।
एडिटर्स गिल्ड की प्रतिक्रिया: यह गंभीर और अनुचित है
एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने इस कार्रवाई को लेकर अपनी तीखी प्रतिक्रिया में कहा:
“एक वैध पत्रकारिता गतिविधि के लिए एफआईआर दर्ज करना गंभीर और अनुचित है। प्रशासन के पास किसी भी रिपोर्ट का जवाब देने के कई वैकल्पिक साधन होते हैं, लेकिन आपराधिक केस दर्ज करना उनमें से नहीं होना चाहिए।”
गिल्ड ने आशा जताई कि अजीत अंजुम सहित किसी भी पत्रकार को अपने पेशेवर कर्तव्यों के निर्वहन में बाधा नहीं दी जाएगी।
डिजीपब फाउंडेशन: स्वतंत्र मीडिया को डराने की कोशिश
डिजीपब न्यूज इंडिया फाउंडेशन, जो स्वतंत्र डिजिटल मीडिया संस्थानों का संगठन है, ने भी अजीत अंजुम के खिलाफ FIR को सीधे-सीधे मीडिया की आजादी पर हमला बताया।
“एफआईआर का मकसद न सिर्फ अजीत अंजुम को बल्कि हर उस पत्रकार को डराना है जो जमीन पर जाकर सच्चाई सामने लाने का प्रयास करता है।”
संस्था ने इस एफआईआर को अस्पष्ट, अविश्वसनीय और भय फैलाने वाला कदम करार दिया।
बिहार में मतदाता सूची पुनरीक्षण पर सवाल
24 जून को चुनाव आयोग ने बिहार में विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण अभियान की घोषणा की थी। इसके तहत 2003 की मतदाता सूची में जिनके नाम नहीं हैं, उन्हें नई पात्रता के दस्तावेज जमा कराने होंगे।
यह प्रक्रिया 7.8 करोड़ मतदाताओं में से करीब 2.9 करोड़ लोगों को प्रभावित कर रही है। विपक्षी दलों ने आशंका जताई है कि यह कदम करीब 2.5 करोड़ मतदाताओं के नाम सूची से बाहर करने का जरिया बन सकता है।
अजीत अंजुम का वीडियो इसी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाता है।
अजीत अंजुम बोले: "मैं डरने वाला नहीं"
सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए अजीत अंजुम ने कहा:
“सवालों का जवाब देने के बजाय मुझे डराने की कोशिश की जा रही है। मैं बेगूसराय में हूं, और जरूरत पड़ी तो सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ूंगा।”
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि एक मुस्लिम ब्लॉक अधिकारी को मेरे खिलाफ मोहरा बनाया जा रहा है।
पत्रकारिता बनाम सत्ता: प्रेस की स्वतंत्रता खतरे में
मीडिया संगठनों और प्रेस स्वतंत्रता समर्थकों ने इस कार्रवाई को जमीनी पत्रकारिता को दबाने का प्रयास बताया है। उनका कहना है कि इस तरह की घटनाएं लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करती हैं और जनता की आवाज को दबाने की कोशिश करती हैं।
देशभर में मांग उठ रही है कि अजीत अंजुम के खिलाफ दर्ज एफआईआर को वापस लिया जाए और पत्रकारों को भयमुक्त होकर रिपोर्टिंग करने का माहौल दिया जाए।
जब एक पत्रकार मतदाता सूची में गड़बड़ियों की पड़ताल करता है और उसके बदले एफआईआर का सामना करता है, तो सवाल सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र और मीडिया की स्वतंत्रता का होता है। ऐसी घटनाएं लोकतंत्र की नींव पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं।