मानव-पशु संघर्ष: आवारा और जंगली जानवरों के आतंक से बदल रहा भारत का कृषि भूगोल, पढ़ें चौंकाने वाली रिपोर्ट
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शेरू, नई दिल्ली (विशेष रिपोर्ट): पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण की बहसों के बीच एक ऐसा खामोश संकट जन्म ले चुका है, जिसने सीधे तौर पर देश की खाद्य सुरक्षा और किसानों की आजीविका पर प्रहार किया है। बढ़ता मानव-पशु संघर्ष अब सिर्फ एक पर्यावरणीय या वन विभाग तक सीमित मुद्दा नहीं रह गया है; बल्कि इसने भारत के 'कृषि भूगोल' (Agricultural Geography) को पूरी तरह से बदलना शुरू कर दिया है।
प्रमुख थिंक टैंक 'सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट' (CSE) द्वारा हाल ही में जारी रिपोर्ट 'स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरनमेंट 2026 इन फिगर्स' ने इस संदर्भ में बेहद चौंकाने वाली और डराने वाली जमीनी हकीकत सामने रखी है। रिपोर्ट के अनुसार, जंगली और आवारा जानवरों के आतंक से तंग आकर दिल्ली, एनसीआर सहित पूरे उत्तर भारत के किसान अब परंपरागत और मुनाफे वाली खेती छोड़ने को मजबूर हो गए हैं। किसान अब ऐसे "वैकल्पिक फसल पैटर्न" की ओर बढ़ रहे हैं, जिन्हें जानवर कम नुकसान पहुंचाते हैं, भले ही उनमें मुनाफा नाममात्र का हो।
दैनिक जागरण और अमर उजाला जैसे प्रमुख समाचार पत्रों ने भी समय-समय पर अपनी ग्राउंड रिपोर्ट्स में किसानों के इस दर्द को प्रमुखता से उठाया है, लेकिन सीएसई की यह विस्तृत रिपोर्ट इस समस्या के राष्ट्रीय स्तर के आंकड़ों को पहली बार एक साथ पिरोकर पेश करती है।
घटना की पृष्ठभूमि और मुख्य कारण
पिछले एक दशक में वनों की कटाई, प्राकृतिक आवासों का अतिक्रमण और जलवायु परिवर्तन के कारण वन्यजीवों का रुख रिहायशी और कृषि इलाकों की तरफ तेजी से हुआ है। वहीं, गोवंश संरक्षण के कड़े कानूनों और 'अन्ना प्रथा' के चलते छुट्टा पशुओं की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई है। अमर उजाला की हालिया कृषि समीक्षाओं में भी यह बात सामने आई थी कि किसान रात-रात भर जागकर खेत की रखवाली करने को मजबूर हैं, फिर भी झुंड के झुंड जानवर मिनटों में पूरी फसल सफाचट कर जाते हैं। इसी हताशा ने किसानों को अपनी सदियों पुरानी कृषि पद्धति बदलने पर मजबूर कर दिया है।
1. हिमाचल और उत्तराखंड: नकदी फसलों से तौबा, बंजर या घास उगाने की मजबूरी
पहाड़ी राज्यों में खेती हमेशा से चुनौतीपूर्ण रही है, लेकिन अब यह एक दुःस्वप्न बन चुकी है।
- सब्जियां और मटर की खेती बंद: हिमाचल प्रदेश में वन विभाग के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, बंदरों और जंगली सूअरों के कारण सालाना लगभग 500 करोड़ रुपये की फसलों का सीधा नुकसान किसानों को उठाना पड़ रहा है। इस भारी आर्थिक चोट से बचने के लिए शिमला, सोलन और सिरमौर जैसे कृषि-प्रधान जिलों के किसानों ने अपनी पारंपरिक नकदी फसलें (जैसे टमाटर, शिमला मिर्च, और मटर) लगाना लगभग बंद कर दिया है।
- अदरक और लहसुन की तरफ झुकाव: बंदरों और सूअरों के आतंक से बचने के लिए पहाड़ों में अब बड़े पैमाने पर अदरक, हल्दी और लहसुन जैसी तीखी और जमींदोज (ज़मीन के नीचे उगने वाली) फसलों का पैटर्न अपनाया जा रहा है। इन फसलों को जानवर नहीं खाते। स्थिति इतनी भयावह है कि दैनिक जागरण की एक स्थानीय रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तराखंड के पौड़ी और अल्मोड़ा के कई इलाकों में तो किसानों ने खेती ही छोड़ दी है या सिर्फ पशुओं के चारे (घास) की खेती शुरू कर दी है, ताकि कम से कम नुकसान न झेलना पड़े।
2. उत्तर प्रदेश और बिहार: दलहन और हरी सब्जियों से दूरी
हिंदी पट्टी के सबसे बड़े कृषि राज्यों, उत्तर प्रदेश और बिहार के मैदानी इलाकों में समस्या का स्वरूप थोड़ा अलग लेकिन उतना ही विनाशकारी है। यहाँ मुख्य दुश्मन नीलगाय (घोज) और छुट्टा गोवंश हैं।
- दालों और सब्जियों की बलि: नीलगाय और आवारा पशुओं से अपनी उपज को बचाने के लिए किसानों ने प्रोटीन से भरपूर दालों और हरी सब्जियों की खेती बहुत कम कर दी है।
- कड़वी और कंटीली फसलों को प्राथमिकता: अब किसान केवल गन्ना या कड़वे स्वाद वाली फसलें उगाने को प्राथमिकता दे रहे हैं। पश्चिमी यूपी के कुछ हिस्सों में (जैसे बिजनौर, मुजफ्फरनगर) किसानों ने बाड़ लगाने के खर्च से बचने के लिए कंटीली झाड़ियों वाले नींबू या औषधीय पौधों (एलोवेरा, लेमनग्रास) की खेती की तरफ रुख किया है। यह एक स्पष्ट संकेत है कि कैसे बाजार की मांग के बजाय जानवरों का डर यह तय कर रहा है कि खेत में क्या उगेगा।
3. दिल्ली और एनसीआर: नीलगायों और बंदरों के डर से बदली 'राजधानी की खेती'
देश की राजधानी होने के बावजूद दिल्ली के ग्रामीण इलाकों— नजफगढ़, अलीपुर, ढांसा बॉर्डर और बवाना— में कृषि चक्र पूरी तरह से तबाह और परिवर्तित हो चुका है।
- सब्जियों के गढ़ में अब सिर्फ गेहूं-धान: एक समय था जब दिल्ली के इन गांवों से पूरी राजधानी की आजादपुर और गाजीपुर मंडियों को ताजी और जैविक सब्जियां सप्लाई होती थीं। लेकिन आज यहाँ किसानों ने सब्जियां उगाना लगभग बंद कर दिया है। नीलगायों और बंदरों के झुंडों से नरम और रसीली सब्जियों को बचाना अब इंसानी बस के बाहर हो चुका है।
- मजबूरी की खेती और मोटे अनाज का रुख: दिल्ली के किसान अब केवल गेहूं, धान और मोटे अनाज (जैसे ज्वार-बाजरा) ही उगा रहे हैं। हालांकि इन फसलों में मुनाफा सब्जियों के मुकाबले बेहद कम है, लेकिन इनकी सख्त प्रकृति के कारण जानवर इन्हें पूरी तरह तबाह नहीं कर पाते।
- फूलों की खेती पर लगा पूर्ण ब्रेक: दिल्ली के बाहरी इलाकों में पहले बड़े पैमाने पर गेंदा और गुलाब जैसे फूलों की खेती होती थी, जो शादी और त्योहारों के सीजन में भारी मुनाफा देती थी। लेकिन बंदरों द्वारा कलियों को खिलने से पहले ही तोड़ने और बर्बाद करने की आदत के कारण किसानों ने इस लाभदायक पैटर्न से भी पूरी तरह हाथ खींच लिए हैं।
क्या कहती है रिपोर्ट और विशेषज्ञ?
सीएसई की 'स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरनमेंट 2026 इन फिगर्स' रिपोर्ट के आंकड़े डराने वाले हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, पशुओं के लगातार हमलों के कारण देश के 54 प्रतिशत किसानों ने कम से कम एक हाई-वैल्यू (ज्यादा मुनाफे वाली) फसल उगाना हमेशा के लिए बंद कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिर्फ कृषि का नुकसान नहीं है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और पोषण सुरक्षा पर एक बड़ा प्रहार है। सीएसई की महानिदेशक सुनीता नारायण इस स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहती हैं:
"यह बदलाव स्पष्ट रूप से दिखाता है कि हमारी कृषि व्यवस्था आज कितनी असहाय हो चुकी है। देश का किसान अब अपनी पसंद या बाजार की मांग की फसल नहीं उगा पा रहा है, बल्कि उसकी मजबूरी वह फसल चुनना है जो जानवरों के हमलों से 'सरवाइव' (जीवित) कर सके। अगर यही स्थिति रही तो देश में सब्जियों और दालों का गंभीर संकट पैदा हो जाएगा।"
अन्य कृषि वैज्ञानिकों का भी मानना है कि यदि खेतों में विविधता घटेगी और सिर्फ एक या दो प्रकार की फसलें ही उगेंगी, तो इससे मिट्टी की उर्वरक क्षमता भी खत्म होगी और कीटों का प्रकोप भी बढ़ेगा।
हमारी राय में
hindi.thetrendingpeople.com के नजरिए से देखा जाए तो, मानव-पशु संघर्ष अब महज खेतों की मेड़ तक सीमित नहीं है; यह भारत की थाली तक पहुँच चुका है। जब किसान टमाटर, मटर और दालें उगाना बंद कर देंगे, तो इन बुनियादी चीजों की कीमतें आसमान छूने लगेंगी, जिसका सीधा असर आम आदमी की जेब और पोषण पर पड़ेगा।
सरकारों और नीति-निर्माताओं को अब सिर्फ "मुआवजा" बांटने की नीति से बाहर आना होगा। तारबाड़ के लिए भारी सब्सिडी, सौर ऊर्जा चालित फेंसिंग, वन्यजीवों के लिए जंगलों में ही पर्याप्त भोजन-पानी की व्यवस्था और छुट्टा पशुओं के लिए व्यावहारिक और वैज्ञानिक प्रबंधन की तुरंत आवश्यकता है। यदि समय रहते इस 'कृषि पलायन' को नहीं रोका गया, तो भारत का कृषि भूगोल इतना सिकुड़ जाएगा कि उसे दोबारा हरा-भरा करना किसी भी सरकार के बस की बात नहीं होगी।
