Supreme Court of India ने बुधवार को भारतीय चुनाव आयोग की मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया को वैध ठहराते हुए बड़ा फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि Election Commission of India द्वारा उठाया गया यह कदम उसकी संवैधानिक और वैधानिक शक्तियों के दायरे में आता है और इसका मकसद चुनाव प्रक्रिया की शुद्धता और विश्वसनीयता बनाए रखना है।
मुख्य न्यायाधीश Surya Kant और न्यायमूर्ति Joymalya Bagchi की पीठ ने स्पष्ट किया कि SIR प्रक्रिया जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA), 1950 या उससे जुड़े नियमों का उल्लंघन नहीं करती। अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 324 और RPA की धारा 21(3) चुनाव आयोग को विशेष पुनरीक्षण प्रक्रिया चलाने का अधिकार देते हैं।
याचिकाओं में दलील दी गई थी कि यह प्रक्रिया अनुच्छेद 326 और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के खिलाफ है और इससे पात्र मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा कि मतदाता सूची की शुद्धता लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बुनियाद है और स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव केवल मतदान तक सीमित नहीं होते।
अदालत ने यह भी माना कि पिछले चार दशकों में व्यापक स्तर पर पुनरीक्षण नहीं हुआ था, जबकि शहरीकरण, प्रवासन और बड़े पैमाने पर नाम जोड़ने और हटाने से मतदाता सूची में त्रुटियों और दोहराव की संभावना बढ़ गई थी। कोर्ट ने कहा कि SIR केवल प्रशासनिक सुविधा का मामला नहीं है, बल्कि यह संवैधानिक जिम्मेदारी से जुड़ा कदम है।
सुप्रीम कोर्ट ने आनुपातिकता के मुद्दे पर भी चुनाव आयोग को राहत दी। अदालत ने कहा कि प्रक्रिया में पर्याप्त सुरक्षा उपाय मौजूद हैं और किसी भी मतदाता का नाम मनमाने तरीके से हटाने से बचाने के लिए नोटिस और सुनवाई जैसे अधिकार दिए गए हैं। कोर्ट ने माना कि सत्यापन के लिए दस्तावेजों की संरचित प्रणाली आवश्यक है और चुनाव आयोग द्वारा तय किए गए दस्तावेज मनमाने नहीं हैं।
फैसले में अदालत ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग मतदाता सूची तैयार करते समय नागरिकता से जुड़े पहलुओं की सीमित जांच कर सकता है, लेकिन अंतिम निर्णय का अधिकार सक्षम प्राधिकरण के पास रहेगा। यदि किसी व्यक्ति का नाम नागरिकता पर संदेह के आधार पर हटाया जाता है, तो मामला चार सप्ताह के भीतर संबंधित प्राधिकरण को भेजना होगा। यदि वह व्यक्ति भारतीय नागरिक पाया जाता है, तो उसका नाम फिर से मतदाता सूची में जोड़ा जाएगा।
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब मतदाता सूची की पारदर्शिता और फर्जी मतदान को लेकर लगातार राजनीतिक बहस चल रही है। चुनाव आयोग ने SIR को चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए जरूरी कदम बताया था, जबकि विपक्षी पक्षों ने इसे संभावित रूप से मतदाता अधिकारों पर असर डालने वाला कदम कहा था।
TheTrendingPeople की राय में
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला चुनाव आयोग की शक्तियों और चुनावी पारदर्शिता को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी स्पष्टता देता है। हालांकि मतदाता सूची की शुद्धता लोकतंत्र के लिए बेहद जरूरी है, लेकिन ऐसी प्रक्रियाओं के दौरान यह सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि किसी पात्र नागरिक का नाम गलत तरीके से न हटे। अदालत ने सुरक्षा उपायों और सुनवाई के अधिकार पर जोर देकर संतुलन बनाने की कोशिश की है। आने वाले समय में असली चुनौती इस प्रक्रिया के जमीनी क्रियान्वयन की होगी, क्योंकि किसी भी तरह की प्रशासनिक गलती सीधे लोकतांत्रिक अधिकारों को प्रभावित कर सकती है।