सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई का रौद्र रूप—"आंखें दिखानी हैं तो आगे बढ़ो, हम भी देखेंगे," जज को 'लिमिट' बताने वाले वकील की हेकड़ी निकाली
नई दिल्ली, दिनांक: 23 जनवरी 2026 — देश की सर्वोच्च अदालत, जो न्याय का मंदिर मानी जाती है, शुक्रवार को एक असामान्य और तल्ख वाकये की गवाह बनी। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने अनुशासनहीनता और न्यायिक अवमानना के एक मामले में वकील को ऐसी कड़ी फटकार लगाई, जो लंबे समय तक कानूनी गलियारों में याद रखी जाएगी। मामला एक ऐसे वकील से जुड़ा था जिसने झारखंड हाईकोर्ट के एक जज को उनकी 'हद' (Limit) बताने की जुर्रत की थी। सीजेआई सूर्यकांत ने वकील के अड़ियल रवैये को देखते हुए भरी अदालत में कहा कि अगर वह जजों को आंखें दिखाना चाहता है, तो दिखाए, हम भी यहां बैठे हैं और हम भी देखेंगे।
यह पूरा मामला वकील महेश तिवारी से जुड़ा है, जिन्होंने पिछले साल झारखंड हाईकोर्ट में एक सुनवाई के दौरान जज के साथ तीखी बहस की थी और उन्हें कथित तौर पर धमकाने वाले लहजे में बात की थी। इसके बाद हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) का नोटिस जारी किया था। इसी नोटिस के खिलाफ राहत पाने के लिए तिवारी सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे, लेकिन राहत मिलने के बजाय उन्हें शीर्ष अदालत के गुस्से का सामना करना पड़ा।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान माहौल तब गरमा गया जब बेंच ने पाया कि याचिकाकर्ता वकील का रवैया अब भी बचावकारी के बजाय आक्रामक है। सीजेआई सूर्यकांत ने वकील महेश तिवारी की अपील पर सुनवाई करते हुए तल्ख टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि ऐसा लगता है कि वकील बस सुप्रीम कोर्ट से एक आदेश चाहता है ताकि वह बाहर जाकर यह दिखा सके कि 'मेरा क्या बिगाड़ लिया'। चीफ जस्टिस ने दो टूक शब्दों में कहा कि अगर वह माफी मांगना चाहता है, तो उसे बिना शर्त और ईमानदारी से माफी मांगनी चाहिए। लेकिन अगर उसका इरादा जजों को आंखें दिखाने का है, तो वह आगे बढ़ सकता है। हम यहां बैठे हैं, और हम भी देखेंगे कि वह क्या कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड हाईकोर्ट से यह भी कहा कि अगर वकील बिना शर्त माफी मांगता है, तो अदालत सहानुभूतिपूर्ण रवैया अपना सकती है, लेकिन अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
इस पूरे विवाद की जड़ 16 अक्टूबर 2025 को झारखंड हाईकोर्ट में हुई एक घटना में है, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुआ था। उस दिन जस्टिस राजेश कुमार की कोर्ट में वकील महेश तिवारी अपनी एक क्लाइंट, जो कि एक विधवा महिला थीं, के लिए राहत मांग रहे थे। मामला बिजली विभाग के बकाये का था। महिला की बिजली लाइन 1.30 लाख रुपये के बकाये के कारण काट दी गई थी। बहस के दौरान तिवारी ने दलील दी कि उनकी क्लाइंट कनेक्शन दोबारा लगवाने के लिए तत्काल 25,000 रुपये जमा करने को तैयार है। हालांकि, जस्टिस कुमार ने एक न्यायिक मिसाल (Precedent) का हवाला दिया, जिसके अनुसार कुल बकाया राशि का 50 प्रतिशत जमा करना आवश्यक था।
मामला तब और उलझ गया जब महेश तिवारी अपनी क्लाइंट को 50,000 रुपये जमा करने पर सहमत कर चुके थे, लेकिन कोर्ट की कार्यवाही आगे बढ़ने पर जज ने वकील के तर्क पेश करने के तरीके पर कुछ टिप्पणी की। कथित तौर पर जस्टिस कुमार ने तिवारी के आचरण को लेकर कोर्ट में मौजूद झारखंड स्टेट बार काउंसिल के चेयरमैन से संज्ञान लेने को कहा। इस पर वकील तिवारी का पारा चढ़ गया। वे अपनी जगह से खड़े हुए, बेंच के करीब गए और जज की ओर उंगली से इशारा करते हुए आक्रामक हो गए। वायरल वीडियो और चश्मदीदों के मुताबिक, उन्होंने जज से कहा कि मैं अपनी तरह से बहस कर सकता हूं, आपके बताए तरीके से नहीं। कृपया इस बात का ध्यान रखें और किसी भी वकील को अपमानित करने की कोशिश न करें।
बहस यहीं नहीं रुकी। जब जज ने पलटकर कहा कि आप यह नहीं कह सकते कि कोर्ट अन्याय कर रहा है, तो वकील ने और तल्ख तेवर अपना लिए। उन्होंने जज को चुनौती देते हुए कहा कि आप लाइव रिकॉर्डिंग देखिए, मैंने ऐसा नहीं कहा। उन्होंने आगे कहा कि देश न्यायपालिका को लेकर जल रहा है, ये मेरे शब्द हैं। आप जज हैं इसलिए सब जानते हैं और हम अधिवक्ता कुछ नहीं? उन्होंने जज को चेतावनी देते हुए कहा कि सीमा पार मत कीजिए, कृपया सीमा पार मत कीजिए। मैं पिछले 40 वर्षों से प्रैक्टिस कर रहा हूं। इसके बाद वे गुस्से में अदालत कक्ष से बाहर चले गए। इसी आचरण को हाईकोर्ट ने प्रथम दृष्टया अवमानना माना था।
हमारी राय (The Trending People Analysis)
वकील और जज न्याय रूपी रथ के दो पहिए होते हैं। अगर एक पहिया दूसरे को छोटा दिखाने या डराने की कोशिश करेगा, तो न्याय की गाड़ी का पटरी से उतरना तय है। वकील महेश तिवारी का आचरण, चाहे वह आवेश में ही क्यों न हो, बार (Bar) और बेंच (Bench) की मर्यादा के खिलाफ था। एक जज को 'हद में रहने' की नसीहत देना न्यायिक प्रक्रिया का अपमान है।
The Trending People का विश्लेषण है कि सीजेआई सूर्यकांत की फटकार पूरी तरह जायज और समयोचित है। सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि अनुभव और वरिष्ठता का मतलब यह नहीं है कि आप अदालत की गरिमा को तार-तार कर दें। 40 साल की प्रैक्टिस का सम्मान होना चाहिए, लेकिन वह सम्मान विनम्रता से आता है, अहंकार से नहीं। अगर वरिष्ठ वकील ही ऐसा व्यवहार करेंगे, तो युवा वकीलों के लिए क्या उदाहरण पेश होगा? न्यायपालिका की स्वतंत्रता और सम्मान को बनाए रखना वकीलों की भी उतनी ही जिम्मेदारी है जितनी जजों की।
