बिहार में 'सौदा' बनी लाश—जमीन की रजिस्ट्री के लिए 3 दिन फ्रीजर में कैद रहा किसान का शव, पंचायत के फरमान ने मानवता को किया शर्मसार
सीतामढ़ी/पटना, दिनांक: 23 जनवरी 2026 — बिहार के सीतामढ़ी (Sitamarhi) जिले से एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसने न केवल इंसानियत को झकझोर कर रख दिया है, बल्कि समाज और प्रशासन के चेहरे पर एक बदनुमा दाग भी लगा दिया है। यहां एक किसान की मौत के बाद उसके शव का अंतिम संस्कार सम्मानपूर्वक करने के बजाय, उसे सौदेबाजी का मोहरा बना दिया गया। करंट लगने से जान गंवाने वाले 55 वर्षीय किसान का शव तीन दिनों तक डीप फ्रीजर (Deep Freezer) में सिर्फ इसलिए रखा गया, क्योंकि गांव की पंचायत ने एक तुगलकी फरमान सुनाया था।
शर्त यह थी कि जब तक मुआवजे में तय की गई जमीन की रजिस्ट्री मृतक के परिवार के नाम नहीं हो जाती, तब तक शव का अंतिम संस्कार नहीं किया जाएगा। जमीन के कागज हाथ में आने के बाद ही मृतक को मिट्टी नसीब हुई। यह घटना बताती है कि आज के दौर में इंसानी संवेदनाओं से ज्यादा कीमती जमीन का एक टुकड़ा हो गया है।
20 जनवरी की वो मनहूस घड़ी: कैसे गई जान?
मामला सीतामढ़ी जिले के सुरसंड थाना क्षेत्र के मलाही गांव का है।
- घटना: 20 जनवरी को गांव के रहने वाले किसान नईम अंसारी (55) अपने खेत में गेहूं की फसल की पटवन (सिंचाई) कर रहे थे।
- लापरवाही: इसी दौरान बगल के खेत में लगे नंगे बिजली के तार की चपेट में आने से उनकी मौके पर ही दर्दनाक मौत हो गई। बताया जाता है कि यह तार खेत के मालिक रत्नेश सिंह ने मवेशियों (नीलगाय/आवारा पशुओं) से अपनी फसल बचाने के लिए अवैध रूप से लगाया था। सुरक्षा मानकों की अनदेखी एक हंसते-खेलते परिवार के मुखिया की जान ले बैठी।
पंचायत का फैसला: "पहले जमीन, फिर कफन"
मौत की खबर फैलते ही गांव में कोहराम मच गया। इसके बाद जो हुआ, वह कानून के राज की धज्जियां उड़ाने वाला था। पुलिस को सूचना देने के बजाय गांव में पंचायत (Panchayat) बैठी। पंचों और ग्रामीणों ने मिलकर आरोपी खेत मालिक और पीड़ित परिवार के बीच समझौता कराने का जिम्मा उठाया।
- मुआवजा: पंचायत ने फैसला सुनाया कि खेत मालिक रत्नेश सिंह अपनी गलती के प्रायश्चित और मुआवजे के तौर पर मृतक के परिजनों को चार कट्ठा (4 Kattha) जमीन देंगे।
- शर्त: दोनों पक्ष इस पर सहमत हो गए, लेकिन अविश्वास की खाई इतनी गहरी थी कि एक शर्त रखी गई— "जब तक जमीन की रजिस्ट्री के कागजात नहीं मिल जाते, तब तक शव का अंतिम संस्कार नहीं होगा।"
इस फैसले को अमलीजामा पहनाने के लिए सुरसंड बाजार से किराए पर एक डीप फ्रीजर मंगवाया गया और नईम अंसारी के शव को उसमें रखकर तीन दिनों तक 'बंधक' बना लिया गया।
3 दिन का इंतजार और रजिस्ट्री का 'नाटक'
20 जनवरी से लेकर 22 जनवरी तक शव फ्रीजर में ही पड़ा रहा। परिजन और ग्रामीण रजिस्ट्री ऑफिस खुलने का इंतजार करते रहे।
- रजिस्ट्री: 22 जनवरी को परिहार निबंधन कार्यालय (Registry Office) खुलते ही खेत मालिक ने मुआवजे की चार कट्ठा जमीन मृतक के परिजनों के नाम कर दी।
- अंतिम संस्कार: जैसे ही रजिस्ट्री के कागजात गांव पहुंचे, तब जाकर शव को फ्रीजर से बाहर निकाला गया और नईम अंसारी को सुपुर्द-ए-खाक किया गया। एक तरफ मौत का मातम था, तो दूसरी तरफ जमीन मिलने की तसल्ली।
ग्रामीणों की दलील: हालांकि, कुछ ग्रामीणों ने इस अमानवीय कृत्य को ढकने के लिए एक अलग तर्क दिया। उनका कहना था कि मृतक के चार बेटे बाहर (परदेस) रहते हैं, इसलिए उनके आने तक शव को सुरक्षित रखने के लिए फ्रीजर मंगवाया गया था। लेकिन दबी जुबान में सब जानते थे कि असली वजह जमीन का कागज था।
पुलिस का रोल: 'बैरंग लौटी खाकी'
इस पूरे घटनाक्रम में पुलिस की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। सूचना मिलने पर सुरसंड थाना की पुलिस मौके पर पहुंची जरूर थी और शव को कब्जे में लेने की कोशिश भी की थी।
- समझौता: लेकिन परिजनों ने आपसी समझौते (Compromise) का हवाला देते हुए पोस्टमार्टम कराने से साफ इनकार कर दिया।
- कानूनी पेंच: पुलिस का कहना है कि चूंकि किसी भी पक्ष की ओर से कोई लिखित आवेदन (Written Complaint) नहीं दिया गया, इसलिए वे कार्रवाई करने में असमर्थ थे और उन्हें बैरंग लौटना पड़ा।
हमारी राय (The Trending People Analysis)
सीतामढ़ी की यह घटना समाज के गिरते नैतिक स्तर का एक डरावना उदाहरण है। एक लाश को जमीन की गारंटी (Collateral) के तौर पर रखना हमारी संवेदनाओं के मरने का सबूत है। पंचायतें सामाजिक न्याय के लिए होती हैं, लेकिन यहां उन्होंने कानून को अपने हाथ में लेकर 'शव के सौदे' को वैधता प्रदान की।
The Trending People का विश्लेषण है कि अवैध बिजली के तार से मौत होना एक गैर-इरादतन हत्या (Negligence) का मामला है, जिसे पुलिस को दर्ज करना चाहिए था। समझौते की आड़ में अपराध को छिपाना गलत है। वहीं, प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि भविष्य में कोई पंचायत ऐसा अमानवीय फरमान न सुना सके। अगर समाज का भरोसा सिस्टम से उठ जाएगा, तो हर फैसला 'लाश' को रखकर ही होगा, जो किसी भी सभ्य समाज के लिए कलंक है।
