मध्य प्रदेश में 'वोटर लिस्ट' का विस्फोट—39 लाख नाम कटे, CM और मंत्रियों की सीटों पर सिर्फ 17% की वापसी, क्या खतरे में है भाजपा का गणित?
भोपाल, दिनांक: 22 जनवरी 2026 — मध्य प्रदेश की सियासत में इन दिनों एक नई बेचैनी देखने को मिल रही है। राज्य में चल रहे मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) अभियान के दौरान जो आंकड़े निकलकर सामने आए हैं, उन्होंने सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (BJP) और उसके रणनीतिकारों की नींद उड़ा दी है। चुनाव आयोग की इस कवायद में प्रदेश भर से करीब 39.6 लाख मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से कट गए हैं। लेकिन चिंता की बात यह नहीं है कि नाम कटे हैं, बल्कि चिंता का विषय यह है कि इनमें से केवल 26% वोटर ही अपना नाम दोबारा जुड़वा पाए हैं।
सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव (Dr. Mohan Yadav) और उनके कैबिनेट के कद्दावर मंत्रियों की विधानसभा सीटों पर भी हालात बेहद खराब हैं। कटे हुए वोटों के मुकाबले नए आवेदन आने की रफ्तार इतनी धीमी है कि पार्टी संगठन को अब अपने अभेद्य किलों में सेंधमारी का डर सताने लगा है।
सीएम और मंत्रियों की सीटों का हाल: आंकड़ों ने खोली पोल
आमतौर पर माना जाता है कि मुख्यमंत्री और मंत्रियों की सीटों पर संगठन सबसे ज्यादा सक्रिय रहता है, लेकिन एसआईआर के आंकड़े कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं।
- उज्जैन दक्षिण (CM मोहन यादव): मुख्यमंत्री की अपनी सीट पर कटे हुए वोटों की तुलना में केवल 17% नए आवेदन आए हैं। यह आंकड़ा बेहद कम है और संगठन की सुस्ती को दर्शाता है।
- रीवा (डिप्टी सीएम राजेंद्र शुक्ला): विंध्य क्षेत्र के कद्दावर नेता और उपमुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ला की सीट पर भी यही हाल है। वहां रिकवरी रेट महज 16.9% रहा।
- इंदौर-1 (कैलाश विजयवर्गीय): नगरीय विकास मंत्री और भाजपा के दिग्गज नेता कैलाश विजयवर्गीय के गढ़ इंदौर-1 में स्थिति और भी खराब है। वहां केवल 11.4% लोग ही दोबारा नाम जुड़वाने के लिए आगे आए हैं।
यह उदासीनता तब है जब पार्टी ने फॉर्म-6 (नाम जोड़ने), 7 (नाम हटाने) और 8 (सुधार) के जरिए घर-घर अभियान चलाने का दावा किया था।
भाजपा के लिए 'रेड अलर्ट': बूथों का समीकरण बदला
प्रदेश संगठन के आंतरिक सर्वे और रिपोर्ट के मुताबिक, इस भारी-भरकम कटौती ने पार्टी की जमीनी रणनीति को तहस-नहस कर दिया है।
- श्रेणी बदलाव: भाजपा जिन बूथों को अपनी मजबूती के आधार पर 'ए' (Strong) और 'बी' श्रेणी में रखकर जीत पक्की मान रही थी, वहां के समीकरण बदल गए हैं। कई 'ए' श्रेणी के बूथ अब कमजोर होकर 'बी' या 'सी' में तब्दील हो गए हैं।
- महिला वोटर: सबसे बड़ी चिंता महिला वोटरों का कटना है। आंकड़ों के मुताबिक, पुरुषों की तुलना में महिलाओं के 3.77 लाख अधिक वोट कटे हैं। चूंकि 'लाडली बहना' योजना के कारण महिलाएं भाजपा का कोर वोट बैंक मानी जाती हैं, इसलिए यह नुकसान सीधा सत्ताधारी दल को होगा।
विपक्ष भी अछूता नहीं: पटवारी और कमलनाथ के गढ़ में भी सेंध
ऐसा नहीं है कि केवल भाजपा को नुकसान हुआ है। कांग्रेस के दिग्गज भी इस लहर की चपेट में हैं, लेकिन उनके लिए रिकवरी थोड़ी बेहतर दिख रही है।
- राऊ (जीतू पटवारी): पीसीसी चीफ जीतू पटवारी की सीट राऊ से 49,799 वोट कटे हैं। दिलचस्प बात यह है कि भाजपा ने यहां पिछले चुनाव में 35,522 वोटों से जीत दर्ज की थी। यानी जीत के अंतर से ज्यादा वोट कट गए हैं। नाम जुड़वाने के लिए यहां 16,072 आवेदन आए हैं।
- गंधवानी (उमंग सिंघार): नेता प्रतिपक्ष की सीट से 11,915 नाम कटे और केवल 2,278 फॉर्म जमा हुए।
- छिंदवाड़ा (कमलनाथ): पूर्व सीएम कमलनाथ के गढ़ छिंदवाड़ा से 19,330 नाम कटे, लेकिन वापसी केवल 4,847 की हुई।
ग्वालियर-चंबल में भाजपा की 'अग्निपरीक्षा'
ग्वालियर पूर्व और मुरैना जैसे क्षेत्रों में भाजपा के लिए स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण है।
- ग्वालियर पूर्व: यहां रिकॉर्ड 74,389 वोट कटे हैं, लेकिन नए नाम जोड़ने के लिए केवल 4,758 आवेदन आए। यह खाई बहुत बड़ी है।
- मुरैना: 49,156 वोट कटने के बाद सिर्फ 1,178 फॉर्म मिले। यह क्षेत्र केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और नरेंद्र सिंह तोमर के प्रभाव वाला माना जाता है, फिर भी ऐसी उदासीनता सवाल खड़े करती है।
क्या है SIR और क्यों हुई इतनी कटौती?
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) का उद्देश्य 21 साल बाद मतदाता सूची को पूरी तरह शुद्ध और अपडेट करना है। 1951 से 2004 तक यह प्रक्रिया नियमित थी, लेकिन उसके बाद रुक गई थी।
- कारण: इस बार माइग्रेशन (पलायन), दोहरी प्रविष्टियां (Duplicate Entries), मृतक मतदाता और विदेशी नागरिकों के नामों को हटाने पर जोर दिया गया है। लक्ष्य है कि कोई भी अयोग्य व्यक्ति सूची में न रहे और कोई योग्य व्यक्ति बाहर न हो।
हमारी राय (The Trending People Analysis)
मतदाता सूची का शुद्धिकरण लोकतंत्र के लिए जरूरी है, लेकिन जब प्रक्रिया में 40 लाख लोग बाहर हो जाएं और जुड़ने वाले न के बराबर हों, तो यह सिस्टम पर सवाल उठाता है। क्या इतने लोग वास्तव में बोगस थे? या प्रक्रिया इतनी जटिल थी कि आम आदमी इसमें उलझ कर रह गया?
The Trending People का विश्लेषण है कि भाजपा के लिए यह खतरे की घंटी है। सीएम और मंत्रियों की सीटों पर कम आवेदन आना कार्यकर्ताओं की निष्क्रियता का सबूत है। अगर समय रहते इन 26% आंकड़ों को नहीं सुधारा गया, तो आगामी चुनावों में हार-जीत का अंतर इन्हीं 'गायब' वोटों से तय होगा। लोकतंत्र में एक-एक वोट कीमती है, और यहाँ तो लाखों का हिसाब गड़बड़ाया हुआ है।
