पाकिस्तान में सियासी भूचाल—ट्रंप के 'बोर्ड ऑफ पीस' में शामिल होकर घिरे शहबाज और आर्मी चीफ, पूर्व राजदूत ने पूछा "क्या अब इजरायल भी दोस्त है?
इस्लामाबाद/दावोस, दिनांक: 23 जनवरी 2026 — पाकिस्तान की लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था और अस्थिर राजनीति के बीच एक नए फैसले ने देश के भीतर बवंडर खड़ा कर दिया है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और आर्मी चीफ जनरल आसिम मुनीर की सरकार ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विवादास्पद 'बोर्ड ऑफ पीस' (Board of Peace) में शामिल होने का फैसला किया है, जिसे लेकर देश के भीतर से ही तीखे विरोध के स्वर उठने लगे हैं। जहां सरकार इसे गाजा में शांति की कोशिश और कूटनीतिक जीत बता रही है, वहीं पूर्व राजनयिकों, पत्रकारों, वकीलों और बुद्धिजीवियों ने इसे 'ट्रंप की खुशामद' और फिलिस्तीन के साथ गद्दारी करार दिया है। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय का तर्क है कि वे शांति प्रक्रिया का हिस्सा बनना चाहते हैं, लेकिन आलोचकों का मानना है कि यह कदम पाकिस्तान की विदेश नीति के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।
इस फैसले पर सबसे तीखा और तार्किक हमला अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की पूर्व राजदूत रहीं मलीहा लोधी ने किया है। लोधी ने इस फैसले को रणनीतिक और नैतिक रूप से बेहद गलत बताया है। उन्होंने सवाल उठाया कि 'बोर्ड ऑफ पीस' ट्रंप का एक निजी प्रोजेक्ट है, जिसे वे संयुक्त राष्ट्र (UN) के समानांतर या विकल्प के तौर पर पेश कर रहे हैं। मलीहा लोधी ने सरकार की नीयत पर सवाल उठाते हुए पूछा कि क्या ट्रंप को खुश करना अब सिद्धांतों पर टिके रहने से ज्यादा अहम हो गया है? उनका सबसे बड़ा और चुभने वाला तर्क इजरायल को लेकर था। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान एक ऐसे बोर्ड में शामिल हो रहा है, जिसमें इजरायल भी एक प्रमुख सदस्य है, जबकि पाकिस्तान ने अब तक इजरायल को एक देश के रूप में मान्यता भी नहीं दी है। गाजा पर जारी इजरायली हमलों की खबरों को साझा करते हुए उन्होंने तंज कसा कि क्या यही वह शांति है, जिसे यह बोर्ड बढ़ावा देगा?
विरोध की आग केवल राजनयिकों तक सीमित नहीं रही, बल्कि राजनीतिक गलियारों में भी फैल गई है। पाकिस्तान के पूर्व कानून मंत्री और पीटीआई नेता बाबर अवान ने बेहद तल्ख भाषा का इस्तेमाल करते हुए सरकार पर हमला बोला है। उन्होंने शहबाज शरीफ सरकार पर सीधा निशाना साधते हुए लिखा कि ट्रंप को खुश करने के लिए युद्ध अपराधों के आरोपी बेंजामिन नेतन्याहू के साथ मंच साझा करना फिलिस्तीनी मुद्दे और मुस्लिम उम्माह के साथ खुली गद्दारी है। अवान ने तंज कसते हुए कहा कि शहबाज शरीफ की 'बूट-पॉलिश' की पुरानी आदत ने पाकिस्तान को आज इस मुकाम पर पहुंचा दिया है जहां वह अपने दोस्तों और दुश्मनों में फर्क नहीं कर पा रहा है। उनका कहना था कि यह शांति की नहीं, बल्कि सरेंडर की भाषा है।
वरिष्ठ पाकिस्तानी पत्रकार बकीर सज्जाद ने भी इस फैसले की आलोचना करते हुए इसे मुस्लिम दुनिया की सबसे बड़ी 'पाखंडी राजनीति' बताया। वहीं, पूर्व सीनेटर और मानवाधिकार वकील मुस्तफा नवाज खोखर ने लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की अनदेखी पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि इतना बड़ा विदेश नीति का फैसला बिना संसद में बहस कराए और बिना जनता को विश्वास में लिए कैसे लिया जा सकता है? यह लोकतंत्र का अपमान है। खोखर ने 'बोर्ड ऑफ पीस' को एक औपनिवेशिक प्रोजेक्ट करार दिया और कहा कि यह संयुक्त राष्ट्र के ढांचे को कमजोर करने की साजिश है, जिसमें ट्रंप को असाधारण और एकतरफा ताकत मिलेगी। उन्होंने यह भी खुलासा किया कि इस बोर्ड की स्थायी सदस्यता के लिए 1 अरब डॉलर की फीस है, जो इसे शांति का मंच नहीं, बल्कि 'अमीरों का क्लब' बनाती है।
इस बीच, प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, आर्मी चीफ आसिम मुनीर और विदेश मंत्री इशाक डार दावोस पहुंच चुके हैं और वहां से साइनिंग सेरेमनी की तस्वीरें सामने आ रही हैं। इन तस्वीरों ने पाकिस्तान की जनता के गुस्से को और भड़का दिया है। सोशल मीडिया पर #ShameOnGovt और #PalestineBetrayed जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं। कई यूजर्स ने सरकार को लानत भेजते हुए लिखा है कि क्या नेतन्याहू जैसे नेताओं के साथ हाथ मिलाना पाकिस्तान की नैतिकता से मेल खाता है? एक पूर्व सैनिक ने लिखा कि जिस फौज को हम अपना रक्षक मानते थे, वह आज चंद डॉलरों के लिए अपने उसूल बेच रही है।
हमारी राय (The Trending People Analysis)
पाकिस्तान का यह कदम उसकी विदेश नीति की दिशाहीनता और आर्थिक मजबूरियों का प्रतीक है। ट्रंप के 'बोर्ड ऑफ पीस' में शामिल होना यह दर्शाता है कि पाकिस्तान अब 'सिद्धांतों' के बजाय 'सर्वाइवल' की कूटनीति कर रहा है।
The Trending People का विश्लेषण है कि शहबाज शरीफ सरकार ने यह जुआ ट्रंप के साथ रिश्ते सुधारने और शायद कुछ आर्थिक मदद पाने के लिए खेला है, लेकिन इसकी कीमत उसे घरेलू मोर्चे पर चुकानी पड़ सकती है। फिलिस्तीन का मुद्दा पाकिस्तान में भावनात्मक रूप से बहुत गहरा है। ऐसे में इजरायल के साथ परोक्ष रूप से भी जुड़ना कट्टरपंथी ताकतों और विपक्ष को सरकार के खिलाफ एक बड़ा हथियार दे देगा। यह फैसला अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान को भले ही ट्रंप के करीब ले जाए, लेकिन अपने ही घर में सरकार की वैधता (Legitimacy) को कमजोर कर देगा।
