"ममता दीदी, इतिहास गवाह है..."—लालू से लेकर केजरीवाल और सोरेन तक, जिसने भी ED से पंगा लिया उसे जाना पड़ा जेल; क्या बंगाल में भी दोहराया जाएगा इतिहास?
कोलकाता/नई दिल्ली, दिनांक: 23 जनवरी 2026 — भारतीय राजनीति में एक पुरानी कहावत है कि कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं, और जब ये हाथ केंद्रीय जांच एजेंसियों के रूप में आगे बढ़ते हैं, तो बड़े-बड़े सियासी दिग्गजों के किले ढह जाते हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) इन दिनों एक ऐसी ही आग से खेल रही हैं, जिसने अतीत में कई मुख्यमंत्रियों की सत्ता और साख को जलाकर राख कर दिया है। चुनावी रणनीतिकार संस्था 'आई-पैक' (I-PAC) के दफ्तर में प्रवर्तन निदेशालय (ED) की छापेमारी को लेकर ममता बनर्जी ने जिस आक्रामक अंदाज में मोर्चा खोला है, वह केवल एक राजनीतिक विरोध नहीं, बल्कि संवैधानिक संस्थाओं के साथ सीधा टकराव है।
ममता का आरोप है कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार विपक्ष को परेशान करने के लिए बेवजह ईडी और सीबीआई का इस्तेमाल कर रही है। लेकिन इतिहास के पन्ने पलटें तो तस्वीर कुछ और ही नजर आती है। चाहे बिहार के कद्दावर नेता लालू प्रसाद यादव हों, दिल्ली के अरविंद केजरीवाल या झारखंड के हेमंत सोरेन—इन सभी ने अपने-अपने समय में केंद्रीय एजेंसियों को चुनौती दी, जांच में सहयोग नहीं किया और अंततः उन्हें जेल की हवा खानी पड़ी। सवाल यह है कि क्या ममता बनर्जी भी उसी राह पर चल पड़ी हैं जिसका अंत सलाखों के पीछे होता है?
सबसे ताजा और ज्वलंत उदाहरण अरविंद केजरीवाल का है। दिल्ली शराब नीति घोटाले में ईडी ने उन्हें पूछताछ के लिए लगातार 9 समन भेजे, लेकिन वे हर बार इसे 'गैर-कानूनी' बताकर टालते रहे। नतीजा यह हुआ कि 21 मार्च 2024 को ईडी ने उनके घर पर दस्तक दी और उन्हें गिरफ्तार कर लिया। यह किसी मुख्यमंत्री के पद पर रहते हुए पहली गिरफ्तारी थी। केजरीवाल ने जेल से सरकार चलाने का रिकॉर्ड तो बनाया, लेकिन अंततः उन्हें अपनी कुर्सी आतिशी को सौंपनी पड़ी। उनकी पत्नी सुनीता केजरीवाल के राजनीति में आने की चर्चा भी रही, लेकिन सही समय पर फैसला न ले पाने की चूक ने उनकी पार्टी को संकट में डाल दिया। यह घटनाक्रम साबित करता है कि जांच से भागना समस्या का हल नहीं, बल्कि उसे और जटिल बनाना है।
इसी तरह झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का मामला भी है। जमीन घोटाले में जब मनी लॉन्ड्रिंग की जांच शुरू हुई, तो सोरेन ने भी ईडी के 10 नोटिसों को नजरअंदाज किया। वे राहत की उम्मीद में हाई कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक दौड़े, लेकिन कानून का शिकंजा कसता गया। आखिरकार 31 जनवरी 2024 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। हालांकि, सोरेन ने लालू यादव जैसी राजनीतिक चतुराई दिखाई और गिरफ्तारी से ठीक पहले अपने विश्वस्त चंपई सोरेन को सत्ता सौंप दी, जिससे सरकार बच गई। बाद में जमानत मिलने पर उन्होंने फिर से कुर्सी संभाली, लेकिन ईडी से पंगा लेने की कीमत उन्हें अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता खोकर चुकानी पड़ी।
इतिहास के झरोखे में और पीछे जाएं तो बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव का नाम आता है। 1997 में जब चारा घोटाले की जांच सीबीआई ने शुरू की, तो आरजेडी समर्थकों ने हुड़दंग मचाकर जांच रोकने की कोशिश की। नौबत यहां तक आ गई कि गिरफ्तारी के लिए सेना बुलाने की बात होने लगी। लेकिन कानून ने अपना काम किया और 30 जुलाई 1997 को लालू यादव को गिरफ्तार कर लिया गया। उन्होंने समझदारी दिखाते हुए अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना दिया, जिससे उनकी पार्टी सत्ता में बनी रही, लेकिन 'जेल यात्रा' से वे भी नहीं बच सके। यह आजादी के बाद किसी सीएम की गिरफ्तारी की पहली बड़ी घटना थी।
अब बात करते हैं ममता बनर्जी की, जो न सिर्फ ईडी बल्कि सीबीआई से भी सीधे टकरा चुकी हैं। जनवरी 2026 में जब ईडी ने कोयला घोटाले की जांच के सिलसिले में टीएमसी के लिए काम करने वाली कंपनी आई-पैक के दफ्तर पर छापा मारा, तो ममता खुद पुलिस बल के साथ वहां पहुंच गईं। आरोप है कि उन्होंने और उनके अधिकारियों ने ईडी के काम में बाधा डाली, फाइलें छीनीं और कंपनी के मालिक का मोबाइल अपने साथ ले गईं। यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट की दहलीज पर है। कोर्ट ने इसे गंभीर मुद्दा माना है और चेतावनी दी है कि अगर ऐसे मामलों को नहीं सुलझाया गया तो अन्य राज्यों में भी 'कानूनहीनता' (Lawlessness) की स्थिति पैदा हो सकती है।
इससे पहले फरवरी 2019 में भी ममता ने सीबीआई के खिलाफ कोलकाता में धरना दिया था, जब टीम पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार से पूछताछ करने पहुंची थी। ममता का यह रवैया उन्हें एक जुझारू नेता तो बनाता है, लेकिन संवैधानिक मर्यादाओं के खिलाफ भी खड़ा करता है। 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जांच को लेकर राज्य सरकार की सहमति वापस लेने के फैसले के खिलाफ भी टिप्पणी की थी। बंगाल में विधानसभा चुनाव सिर पर हैं (मात्र 2 महीने दूर), और भाजपा पूरी ताकत झोंक रही है। ऐसे में केंद्रीय एजेंसियों से सीधा टकराव ममता के लिए 'राजनीतिक शहादत' का मौका हो सकता है या फिर उनके पतन का कारण।
हमारी राय (The Trending People Analysis)
ममता बनर्जी एक स्ट्रीट फाइटर हैं, लेकिन एजेंसियों के काम में शारीरिक रूप से बाधा डालना एक खतरनाक मिसाल है। लालू, केजरीवाल और सोरेन के उदाहरण बताते हैं कि जब राजनीति और कानून की टक्कर होती है, तो जीत अक्सर कानून की ही होती है।
The Trending People का विश्लेषण है कि ममता का यह कदम हताशा का संकेत भी हो सकता है। अगर सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ सख्त रुख अपनाया, तो बंगाल में राष्ट्रपति शासन या बड़ी कानूनी कार्रवाई के रास्ते खुल सकते हैं। लोकतंत्र में जांच का सामना करना ही निर्दोष साबित होने का सबसे अच्छा तरीका है, न कि जांच अधिकारियों से फाइलें छीनना। ममता को इतिहास से सबक लेना चाहिए, वरना बंगाल की राजनीति का अगला अध्याय तिहाड़ या अलीपुर जेल से लिखा जा सकता है।
