समंदर में अमेरिका की बादशाहत को चुनौती—चीन बना रहा 1.2 लाख टन का 'परमाणु दैत्य', फुजियान की नाकामी के बाद ड्रैगन का नया 'सुपर प्लान'फाइल फोटो/Reuters
बीजिंग/नई दिल्ली, दिनांक: 20 जनवरी 2026 — हिंद-प्रशांत क्षेत्र (Indo-Pacific) में अपनी दादागिरी कायम करने के लिए चीन एक ऐसी योजना पर काम कर रहा है, जो दुनिया की सबसे शक्तिशाली नौसेना यानी अमेरिकी नेवी (US Navy) की नींद उड़ा सकती है। दुनिया भर में अपनी सैन्य ताकत का लोहा मनवाने के लिए चीन अरबों डॉलर पानी की तरह बहा रहा है। कुछ महीने पहले जब चीन ने अपना तीसरा और सबसे आधुनिक एयरक्राफ्ट कैरियर 'फुजियान' (Fujian) लॉन्च किया था, तो उसे चीनी नौसेना (PLAN) का गौरव बताया गया था। लेकिन अब तकनीकी आकलनों में फुजियान के डिजाइन में गंभीर खामियां सामने आई हैं।
इन खामियों से सबक लेते हुए बीजिंग ने अब एक और भी बड़े और खतरनाक प्रोजेक्ट पर काम शुरू कर दिया है। रिपोर्ट्स का दावा है कि चीन अब अमेरिका के 'यूएसएस गेराल्ड आर. फोर्ड' (USS Gerald R. Ford) से भी बड़ा और ताकतवर न्यूक्लियर पावर्ड एयरक्राफ्ट कैरियर (Type-004) विकसित कर रहा है। 1,20,000 टन वजनी यह पोत जब समंदर में उतरेगा, तो शक्ति संतुलन का कांटा चीन की तरफ झुक सकता है।
फुजियान: जिसे 'गौरव' समझा, वो निकला 'कमजोर कड़ी'
नवंबर 2025 में सेवा में शामिल हुआ 80,000 टन का फुजियान कैरियर चीन का पहला स्वदेशी डिजाइन वाला पोत था, जिसमें इलेक्ट्रोमैग्नेटिक कैटापल्ट्स (EMALS) लगे थे। लेकिन हालिया रिपोर्टों ने इसकी कलई खोल दी है। सैन्य विशेषज्ञों के अनुसार, फुजियान में ऑपरेशनल स्तर पर कई दिक्कतें आ रही हैं:
- डेक लेआउट की गलती: अमेरिकी सुपरकैरियर्स में कंट्रोल टॉवर या 'आइलैंड' पीछे की तरफ होता है, लेकिन फुजियान में यह डेक के बीचोंबीच है। इससे विमानों की पार्किंग और आवाजाही (Taxiing) के लिए जगह कम हो गई है।
- कैटापल्ट का पेंच: इसके लॉन्च सिस्टम में भी डिजाइन की कमी है। एक कैटापल्ट लैंडिंग जोन में हस्तक्षेप करता है, जिसका मतलब है कि जिस वक्त विमान उतर रहा हो, उस वक्त उड़ान नहीं भरी जा सकती। यह युद्ध के समय एक बड़ी बाधा है।
- चोक पॉइंट: एक अन्य कैटापल्ट विमान लिफ्ट के बेहद करीब है, जिससे डेक पर जाम (Choke Point) की स्थिति बन जाती है।
नतीजतन, फुजियान की 'सॉर्टी जनरेशन रेट' (उड़ान भरने की दर) अमेरिकी निमित्ज क्लास (Nimitz Class) कैरियर का केवल 60 प्रतिशत ही है।
पारंपरिक ईंधन बना रोड़ा, अब 'न्यूक्लियर' है समाधान
फुजियान की इन खामियों की जड़ उसका पारंपरिक ईंधन (Conventional Fuel) सिस्टम है। डीजल या तेल से चलने वाले जहाज को धुएं के लिए बड़े 'एग्जॉस्ट फनल' (चिमनी) की जरूरत होती है, जो डेक पर काफी जगह घेरते हैं। इसी वजह से डिजाइनरों को आइलैंड को बीच में रखना पड़ा।
चीन ने समझ लिया है कि अगर उसे अमेरिका को पछाड़ना है, तो उसे परमाणु ऊर्जा (Nuclear Power) की ओर जाना होगा। परमाणु रिएक्टरों को चिमनी की जरूरत नहीं होती, जिससे डेक का लेआउट खुला और बड़ा बनाया जा सकता है।
Type-004: अमेरिका के 'बाप' की तैयारी?
साल 2025 के अंत की सैटेलाइट तस्वीरें एक डरावनी कहानी कह रही हैं। डालियान शिपयार्ड में देखी गई विशालकाय संरचनाएं इस बात का सबूत हैं कि चीन अपने चौथे विमानवाहक पोत (Type-004) पर तेजी से काम कर रहा है।
इस 'दैत्य' की संभावित खूबियां:
- वजन: इसका विस्थापन (Displacement) 1.10 से 1.20 लाख टन तक हो सकता है, जो अमेरिकी गेराल्ड आर. फोर्ड (करीब 1 लाख टन) से भी ज्यादा है।
- पावर: यह पूरी तरह से न्यूक्लियर पावर्ड होगा, जिससे इसे बार-बार ईंधन भरने की जरूरत नहीं होगी और यह असीमित समय तक समंदर में रह सकेगा।
- क्षमता: इसमें 4 इलेक्ट्रोमैग्नेटिक कैटापल्ट होने की संभावना है, जिससे विमानों को लॉन्च करने की गति अमेरिकी जहाजों के बराबर या उससे अधिक होगी।
- स्पेस: ईंधन की टंकियों की जगह अब हथियारों और विमान ईंधन के लिए इस्तेमाल होगी, जिससे इसकी मारक क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी।
भारत और अमेरिका के लिए खतरे की घंटी
चीन का यह कदम केवल दिखावा नहीं है, बल्कि एक रणनीतिक बदलाव है।
- ब्लू वाटर नेवी: फुजियान भले ही ताइवान और दक्षिण चीन सागर तक सीमित रहे, लेकिन परमाणु पोत चीन को 'ब्लू वाटर नेवी' बनाएगा। इसका मतलब है कि चीनी नौसेना हिंद महासागर (Indian Ocean) से लेकर प्रशांत महासागर तक कहीं भी, कभी भी अपनी ताकत दिखा सकेगी।
- अमेरिकी चिंता: गेराल्ड आर. फोर्ड क्लास अमेरिका की रीढ़ है। अगर चीन उससे बड़ा जहाज बना लेता है, तो अमेरिका का समुद्र पर एकछत्र राज (Maritime Supremacy) खतरे में पड़ जाएगा।
हमारी राय (The Trending People Analysis)
चीन की यह महत्वाकांक्षा दुनिया के लिए एक नया सिरदर्द है। फुजियान की विफलता को चीन ने अपनी सीख बना लिया है और अब वह तकनीकी छलांग (Technological Leap) लगाने को तैयार है।
The Trending People का विश्लेषण है कि 1.2 लाख टन का एयरक्राफ्ट कैरियर केवल एक जहाज नहीं, बल्कि 'तैरता हुआ एयरबेस' होता है। जब यह हिंद महासागर में गश्त करेगा, तो भारत की सुरक्षा चिंताओं का बढ़ना लाजमी है। भारत को भी अब अपने तीसरे एयरक्राफ्ट कैरियर और परमाणु पनडुब्बियों के प्रोजेक्ट्स में तेजी लानी होगी। यह हथियारों की होड़ अब केवल जमीन तक सीमित नहीं है, बल्कि समंदर की लहरों पर वर्चस्व की जंग शुरू हो चुकी है।
