बसंत पंचमी विशेष—सन्नाटे में डूबी सृष्टि में जब गूंजी पहली 'वीणा', ब्रह्मा जी के कमंडल से ऐसे प्रकटीं ज्ञान की देवी, जानें श्री कृष्ण से जुड़ा वो रहस्य
नई दिल्ली/प्रयागराज, दिनांक: 23 जनवरी 2026 — माघ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि भारतीय संस्कृति में केवल एक तारीख नहीं, बल्कि ज्ञान और कला के उत्सव का महापर्व है। पूरे भारत में आज बसंत पंचमी (Basant Panchami) का त्योहार बड़े ही हर्षोल्लास और श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। पीली सरसों से लहलहाते खेत और प्रकृति में आए नए बदलाव के बीच यह दिन विद्या, संगीत और कला की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती की आराधना को समर्पित है। स्कूलों से लेकर घरों तक, हर जगह 'या कुन्देन्दु तुषारहारधवला' के मंत्र गूंज रहे हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि मां सरस्वती का प्राकट्य कैसे हुआ था? आखिर क्यों भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें सबसे पहले पूजा था और यह वरदान दिया था कि आज के दिन पूरा विश्व उनकी वंदना करेगा? हमारे धर्मग्रंथों में छिपी ये कथाएं बेहद रोचक और ज्ञानवर्धक हैं।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब परमपिता ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की, तो उन्होंने देखा कि चारों ओर एक अजीब सा मौन और नीरसता छाई हुई है। उन्होंने पेड़-पौधे, नदियां, पर्वत और जीव-जंतु तो बना दिए थे, लेकिन उनमें 'ध्वनि' नहीं थी। सब कुछ शांत और निशब्द था। इस सन्नाटे को देखकर ब्रह्मा जी उदास हो गए। उन्हें लगा कि उनकी रचना अधूरी है। इसी उदासी और सन्नाटे को दूर करने के लिए ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल से जल निकालकर पृथ्वी पर छिड़का। जल की बूंदें जैसे ही धरती पर गिरीं, एक अद्भुत शक्ति का संचार हुआ और वहां एक चार भुजाओं वाली अलौकिक सुंदरी देवी प्रकट हुईं।
इन देवी का स्वरूप दिव्य था। उनके एक हाथ में वीणा थी, दूसरे में माला, तीसरे में पुस्तक और चौथे हाथ में वर मुद्रा थी। ब्रह्मा जी ने उन्हें 'सरस्वती' कहकर पुकारा और उनसे वीणा बजाने का अनुरोध किया। देवी ने जैसे ही अपनी वीणा के तारों को झंकृत किया, पूरी सृष्टि में संगीत गूंज उठा। नदियां कलकल कर बहने लगीं, हवाओं में सुर घुल गए और हर जीव को अपनी वाणी मिल गई। वह क्षण था जब मौन टूटा और संवाद शुरू हुआ। तभी से उन्हें बुद्धि और संगीत की देवी के रूप में पूजा जाने लगा और इस दिन को उनके जन्मदिन यानी बसंत पंचमी के रूप में मनाया जाने लगा।
एक अन्य प्रचलित कथा भगवान श्री कृष्ण और देवी सरस्वती के संबंध को उजागर करती है। मान्यताओं के अनुसार, जब देवी सरस्वती ने भगवान श्री कृष्ण के दिव्य रूप को देखा, तो वे उन पर मोहित हो गईं। उन्होंने श्री कृष्ण को पति रूप में पाने की इच्छा व्यक्त की। लेकिन भगवान कृष्ण तो राधा रानी के प्रति समर्पित थे। उन्होंने देवी सरस्वती की भावनाओं का सम्मान करते हुए उन्हें समझाया कि वे राधा के हैं। हालांकि, सरस्वती जी को प्रसन्न करने के लिए उन्होंने एक वरदान दिया। श्री कृष्ण ने कहा कि आज से माघ शुक्ल पंचमी को पूरा विश्व तुम्हारी विद्या और ज्ञान की देवी के रूप में पूजा करेगा। स्वयं भगवान कृष्ण ने उस दिन सबसे पहले मां सरस्वती की पूजा की और तब से यह परंपरा अनवरत चली आ रही है।
मां सरस्वती के स्वरूप और संबंधों को लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग मान्यताएं भी प्रचलित हैं, जो भारतीय संस्कृति की विविधता को दर्शाती हैं। पश्चिमी भारत में उन्हें भगवान सूर्य की पुत्री माना जाता है और उनका विवाह भगवान कार्तिकेय के साथ जोड़ा जाता है। वहीं, पूर्वी भारत में उन्हें माता पार्वती की पुत्री और भगवान गणेश व कार्तिकेय की बहन के रूप में पूजा जाता है। मान्यता है कि इस पावन कथा को सुनने मात्र से देवी सरस्वती का आशीर्वाद प्राप्त होता है और मंदबुद्धि बालक भी प्रखर बुद्धि का स्वामी बन जाता है।
बसंत पंचमी का यह पावन दिन हमें याद दिलाता है कि जीवन में धन-दौलत से भी ऊपर विद्या और संस्कारों का स्थान है। विशेष रूप से विद्यार्थियों के लिए यह दिन अत्यंत शुभ होता है। इस दिन पीले वस्त्र पहनने और पीले पकवान (जैसे मीठे चावल, केसरिया हलवा) बनाने की परंपरा है। पीला रंग सादगी, त्याग और मस्तिष्क की सक्रियता का प्रतीक माना जाता है। यह रंग सुख, शांति और नई ऊर्जा के आगमन का भी सूचक है। इसी दिन कई घरों में छोटे बच्चों का 'विद्यारंभ संस्कार' (पाटी पूजन) भी किया जाता है, ताकि उनके जीवन की शुरुआत ज्ञान की ज्योति के साथ हो और वे अज्ञानता के अंधकार से दूर रहें।
हमारी राय (The Trending People Analysis)
बसंत पंचमी केवल ऋतु परिवर्तन का उत्सव नहीं है, बल्कि यह मानव सभ्यता के उस सबसे बड़े आविष्कार का जश्न है जिसे हम 'भाषा' और 'ज्ञान' कहते हैं। मां सरस्वती की कथा हमें बताती है कि बिना वाणी और कला के जीवन कितना नीरस हो सकता है। ब्रह्मा जी ने शरीर बनाया, लेकिन सरस्वती जी ने उसमें 'चेतना' भरी।
The Trending People का विश्लेषण है कि आज के डिजिटल युग में जब हम जानकारी (Information) के सागर में गोते लगा रहे हैं, हमें 'ज्ञान' (Wisdom) और 'विवेक' की सबसे ज्यादा जरूरत है। श्री कृष्ण का सरस्वती को पूजना यह संदेश देता है कि शक्ति और भक्ति भी ज्ञान के बिना अधूरी है। हमें अपनी आने वाली पीढ़ियों को यह सिखाना होगा कि असली संपत्ति बैंक बैलेंस नहीं, बल्कि वह विद्या है जो विनय देती है। आइए, इस बसंत पंचमी पर हम अज्ञानता के कोहरे को छांटकर ज्ञान का दीप जलाएं।
